सही समय पर समुचित फैसला, खाद्य सुरक्षा बनी सरकार की प्राथमिकता

सरकार को निजी कंपनियों द्वारा गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने के कदम के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर गेहूं की जमाखोरी को भी हतोत्साहित करना होगा जिससे गेहूं की पहुंच मंडी तक हो सके। सरकार का स्टाक बढ़ने से न सिर्फ खाद्य सुरक्षा मजबूत मिलेगी बल्कि मुद्रास्फीति भी कम होगी।

Sanjay PokhriyalPublish: Fri, 20 May 2022 10:28 AM (IST)Updated: Fri, 20 May 2022 10:28 AM (IST)
सही समय पर समुचित फैसला, खाद्य सुरक्षा बनी सरकार की प्राथमिकता

डा. सुरजीत सिंह। गेहूं की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने, खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने एवं पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देते हुए भारत सरकार द्वारा गेहूं निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध सही समय में लिया गया उचित निर्णय है। वैश्विक गेहूं निर्यात में मात्र पांच प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले भारत की आलोचना करने वाले जी-7 देश आने वाले समय में इस बात को अवश्य स्वीकार करेंगे। दरअसल रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमतों में 60 प्रतिशत तक उछाल आया है।

विश्व को 28 प्रतिशत गेहूं का निर्यात रूस और यूक्रेन करते थे। वैश्विक स्तर पर गेहूं की मांग बढ़ने से निजी कंपनियों ने किसानों से सीधे गेहूं खरीद कर भंडारण करना शुरू कर दिया था, जिससे बाजार में गेहूं और उससे जुड़े उत्पादों आटा, बिस्किट, ब्रेड आदि की कीमतों में बढ़ोतरी होने लगी। लिहाजा मुद्रास्फीति का ग्राफ भी बढ़ने लगा। कई निर्यातक 27,000 रुपये प्रति टन की दर से गेहूं का निर्यात कर रहे थे। बाजार में बढ़ी कीमतों का लाभ लेने के लिए किसानों ने अपने गेहूं को सरकारी मंडियों में बेचना कम कर दिया। परिणामस्वरूप सरकारी खरीद पिछले 15 वर्षो के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई। सरकार की खरीद 13 मई तक 1.8 करोड़ टन हुई थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33 प्रतिशत कम रही।

निजी कंपनियों द्वारा किए जाने वाले गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर मोदी सरकार ने यही संदेश देने की कोशिश की है कि गेहूं का निर्यात केवल सरकार से सरकार को ही होगा। सरकार ने कोरोना रोधी वैक्सीन वितरण में भी इसी रणनीति का पालन किया था। वित्त वर्ष 2022-23 में भारत सरकार द्वारा एक करोड़ टन गेहूं का निर्यात किया जाएगा। देखा जाए तो कृषि वस्तुओं के निर्यात ने आज किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वारा खोल दिए हैं। वित्त वर्ष 2021-22 में भारत ने कुल 72.15 लाख टन गेहूं का रिकार्ड निर्यात किया था। वहीं केवल अप्रैल 2022 में ही भारत ने 14.63 लाख टन गेहूं का निर्यात कर दिया है। वाणिज्य मंत्रलय के अनुसार भारत ने मोरक्को, तुर्की, इंडोनेशिया, ट्यूनीशिया, फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम, अल्जीरिया और लेबनान में अपने प्रतिनिधि भेजे हैं, जिससे नए समझौतों द्वारा कृषि व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके। जाहिर है कि अगर किसान अपने कथित नेताओं से भ्रमित न हुए होते तो आज बाजार की बढ़ती कीमतों का लाभ उन्हें अवश्य मिलता।

गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का एक अन्य कारण भीषण गर्मी एवं लू के चलते उत्पादन लक्ष्य का कम हो जाना भी है। फरवरी माह में पिछले वर्ष के 10.99 करोड़ टन के मुकाबले इस वर्ष 11.13 करोड़ टन गेहूं के उत्पादन की संभावना व्यक्त की गई थी, परंतु मार्च से लेकर अप्रैल के मध्य तक गेहूं उत्पादक राज्यों में तेजी से तापमान के बढ़ने के कारण समय से पहले ही गेहूं की कटाई करनी पड़ी। अब उत्पादन 9.5 करोड़ टन होने का ही अनुमान है। इस ग्लोबल वार्मिग के लिए भी वही जी-7 देश जिम्मेदार हैं, जो गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। ग्लोबल वार्मिग के कारण अमेरिका और आस्ट्रेलिया आदि देशों में भी गेहूं का उत्पादन कम हुआ है। वे सभी देश वही कर रहे हैं, जो भारत कर रहा है। फिर उनकी नाराजगी भारत से ही क्यों? जी-7 देशों का तर्क है कि भारत के फैसले से एशिया-अफ्रीका के देश प्रभावित होंगे। जर्मनी को आशंका है कि जो देश मक्का, चावल आदि का निर्यात करते हैं, वे भी इसी राह पर चलेंगे तो वैश्विक स्तर पर बड़ा खाद्य संकट आ सकता है।

भारत सरकार का मत है कि जरूरतमंद देशों को गेहूं का निर्यात किया जाएगा। खाद्य संकट का सामना कर रहे पड़ोसी देशों श्रीलंका और अफगानिस्तान की मदद भारत पहले से ही कर रहा है। भारत सरकार वैश्विक स्तर पर कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार से सरकार के बीच निर्यात की कड़ी विकसित करना चाहती है। सरकार द्वारा सरकार को गेहूं का निर्यात करने से यह सही हाथों में जाएगा और विदेशी सरकार भी उस अनाज को सही लोगों तक उपलब्ध करवा पाएगी। साफ है कि भारत सरकार का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों को निजी हाथों से बचाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कंपनियों के खेल को रोकना है। इस तरह सरकार इतिहास की उन गलतियों को भी नहीं दोहराना चाहती कि पहले कम कीमत पर निर्यात किया जाए और फिर उसी वस्तु की कमी होने की स्थिति में महंगे दामों पर आयात किया जाए।

वर्ष 2004-05 में हमने गेहूं का निर्यात किया। फिर स्टाक कम होने की स्थिति से बिगड़े हालात में महंगे दाम पर गेहूं का आयात किया। 2007-08 में चीनी के संदर्भ में भी यही कहानी दोहराई गई थी। रिजर्व बैंक के अनुसार 2007-08 में 30 लाख टन चीनी का निर्यात 18.5 रुपये प्रति किलो पर किया गया और 2008-09 में 25 लाख टन चीनी का आयात 30 रुपये प्रति किलो की दर पर किया गया।

यह उल्लेखनीय है कि किसी समय गेहूं के आयातक देश रहे भारत की तरफ आज पूरा विश्व देख रहा है। इससे पता चलता है कि समय के साथ हालात कितने बदले हैं? आज गेहूं उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर ही नहीं है, बल्कि निर्यातक देश के रूप में पहचान बना रहा है। सरकार को निजी कंपनियों द्वारा गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने के कदम के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर गेहूं की जमाखोरी को भी हतोत्साहित करना होगा, जिससे गेहूं की पहुंच मंडी तक हो सके। सरकार का स्टाक बढ़ने से न सिर्फ खाद्य सुरक्षा मजबूत मिलेगी, बल्कि मुद्रास्फीति भी कम होगी।

(लेखक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एवं इंडियन इकोनामिक एसोसिएशन के सदस्य हैं)

Edited By Sanjay Pokhriyal

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