केंद्र सरकार को सिविल सेवा कैडर नियमों में संशोधन की क्‍यों महसूस हुई आवश्‍यकता

केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में अखिल भारतीय सेवाओं विशेषकर प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अधिकारियों के कैडर नियमों में संशोधन का प्रस्ताव कर राज्यों से उनकी राय मांगी गई जो विवादास्पद हो गई है। जानिए इससे संबंधित तमाम संवैधानिक प्रविधान और नियम क्या दर्शाते हैं

Kanhaiya JhaPublish: Thu, 27 Jan 2022 06:19 PM (IST)Updated: Fri, 28 Jan 2022 08:27 AM (IST)
केंद्र सरकार को सिविल सेवा कैडर नियमों में संशोधन की क्‍यों महसूस हुई आवश्‍यकता

सीबीपी श्रीवास्तव । भारत का राजनीतिक ढांचा राज्यों के संघ का है जिससे इसे एकात्मक परिसंघ भी कहा जाता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 मामले में जब संविधान के बुनियादी ढांचे के सिद्धांत की व्याख्या की थी तब भारत के परिसंघीय चरित्र को उस ढांचे का एक अवयव कहा था। ऐसी स्थिति में यदि परिसंघीय अभिलक्षणों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो इससे बुनियादी ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। इस पृष्ठभूमि में भारत में सिविल सेवा की प्रकृति, उसके स्वरूप, और कैडर नियमों के साथ-साथ भारत के परिसंघीय ढांचे की विशेषताओं पर गौर करना आवश्यक है, तभी केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव की तार्किकता पर विचार किया जा सकता है।

देश की सर्वोच्च सेवा के रूप में सिविल सेवा प्रतिष्ठित रही है और अधिकांश युवाओं के लिए यह उनके जीवन का प्रधान लक्ष्य है। कारण यह कि प्राधिकार के साथ समाज सेवा करने का इससे बेहतर विकल्प नहीं है। यहां समाज सेवा का अर्थ विधि व्यवस्था बनाए रखते हुए नीतियों और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कर लोगों को विकास की मुख्यधारा में समावेशित करना है।

सिविल सेवक : साधारण शब्दों में सिविल प्रशासन के लिए उत्तरदायी अधिकारियों को सिविल सेवक कहा जाता है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम एएन सिंह 1965 मामले में किसी अधिकारी को सिविल सेवक कहे जाने के तीन आधार बताए हैं। स्वामी-सेवक संबंधों की विद्यमानता, राज्य द्वारा नियुक्ति और राज्य निधि से वेतन की प्राप्ति।

भारत में सिविल सेवा के कई स्वरूप विद्यमान हैं, जैसे, अखिल भारतीय सेवाएं (भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा), केंद्रीय सेवाएं ग्रुप ए (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त) तथा ग्रुप बी (राष्ट्रपति से अधिकृत प्राधिकारी द्वारा नियुक्त) और फिर राज्य-स्तरीय सिविल सेवाएं। इनमें से अखिल भारतीय सेवाओं के लिए कैडर का प्रविधान है। भारत का राजनीतिक ढांचा राज्यों के संघ का है जिसे हम एकात्मक अथवा संसदीय परिसंघ कहते हैं। इस कारण अखिल भारतीय सेवाएं एकात्मक चरित्र की द्योतक हैं। इसी कारण केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे अधिकारियों को कैडर नियमों के तहत विभिन्न राज्यों में तैनात किया जाता है। वर्ष 2017 में नई कैडर नीति के तहत सभी राज्यों को पांच जोनों में रखा गया है। केंद्र सरकार की आवश्यकता के अनुरूप इन अधिकारियों की राज्य की सहमति से केंद्रीय मंत्रालयों में प्रतिनियुक्ति की जाती है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा (कैडर) नियमावली 1954 के नियम 6 (1) में यह उल्लेख है कि एक कैडर अधिकारी, संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की सहमति से, केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार या किसी कंपनी, एसोसिएशन या व्यक्तियों के निकाय के तहत सेवा के लिए प्रतिनियुक्त हो सकता है, चाहे वह निगमित हो या नहीं, जो पूरी तरह से या केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में है। नियम में यह भी कहा गया है कि केंद्र और राज्य के बीच असहमति की स्थिति में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार का होगा और राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के निर्णय को लागू करना अनिवार्य होगा। केंद्र को अधिक विवेकाधीन अधिकार देने वाले प्रतिनियुक्ति के मामले में यह नियम मई 1969 में जोड़ा गया था।

नियमावली के नियम 6 में एक नए प्रविधान का प्रस्ताव किया गया है जिसके अनुसार, प्रत्येक राज्य सरकार विभिन्न स्तरों पर पात्र अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए उपलब्ध कराएगी जिनकी संख्या नियम 4(1) के तहत केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व में वर्णित है।

ऐसे प्रविधानों से केंद्र सरकार यह संकेत देना चाहती है कि नियमावली में परिवर्तन परिसंघीय ढांचे के विरुद्ध नहीं है और राज्यों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत कई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारत के परिसंघ पर दृष्टि डालना अनिवार्य है।

परिसंघ का गठन : सामान्यत: किसी परिसंघ का निर्माण उसकी इकाइयों अथवा राज्यों के बीच समझौते के आधार पर होता है। लेकिन परिसंघ की कोई सटीक परिभाषा उपलब्ध नहीं होने के कारण ऐसा ढांचा देश-विशिष्ट होता है। इस कारण सभी ऐसे देश अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को देखते हुए परिसंघ का निर्माण करते हैं। भारत का परिसंघ एक विकेंद्रीकृत और कार्यात्मक परिसंघ है, अर्थात यहां राज्यों का गठन संघ द्वारा होता है तथा वित्त और अवशिष्ट शक्तियां (उन विषयों पर विधि निर्माण की शक्ति जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है) राज्यों के बदले संघ को सौंपी गई हैं। इसी कारण ऐसे ढांचे को संविधान में -राज्यों का संघ- कहा गया है।

राज्यों को स्वायत्तता : भारत में राज्यों को स्वतंत्रता के बदले स्वायत्तता दी गई है। इसका सबसे बड़ा कारण विकेंद्रीकृत ढांचे के माध्यम से संसाधनों का समतामूलक वितरण और राष्ट्र को एकीकृत और अखंड बनाए रखना है। अत: कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि राज्यों पर संघ का स्पष्ट और ताकतवर नियंत्रण बना हुआ है। यह भी विदित है कि संसाधनों के वितरण के लिए राज्य ही मूल रूप से उत्तरदायी हैं। अत: संघ-राज्य तथा राज्य-राज्य समन्वय अनिवार्य है। इसी प्रकार, इनके बीच एक-दूसरे की सहायता करने की मनोवृत्ति भी महत्वपूर्ण है। यही भारत में सहकारी संघवाद का आधार भी है। ऐसी स्थिति में सहयोग, समन्वय और सहायिकता जैसे गुणों के बिना संवैधानिक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव नहीं है। परिसंघ की इसी भूमिका की पहचान करते हुए उच्चतम न्यायालय ने भारत के परिसंघीय चरित्र को संविधान के मूल ढांचे का भाग कहा था।

अब प्रस्ताव की संवैधानिकता पर विचार करने के लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि भारत के राजनीतिक ढांचे की विशेषताएं कौन सी हैं? सबसे पहले यह ढांचा चरित्र में परिसंघीय और आत्मा में एकात्मक है। भारत एक कार्यात्मक परिसंघ है जो अमेरिकी परिसंघ के विपरीत है। यहां वित्त और अवशिष्ट शक्तियां राज्यों के बदले संघ में निहित हैं। इसी कारण संविधान के अनुच्छेद 109 (1) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि धन विधेयक राज्यसभा में नहीं लाए जा सकते। दूसरी ओर, अनुच्छेद 248 (1) में उन विषयों पर संसद को विधि बनाने की शक्ति है जिनका उल्लेख संविधान में नहीं है। अत: समय-समय पर उभरने वाले नए विषयों पर संघ ही विधि बना सकता है। इसके अतिरिक्त, कई ऐसे प्रविधान भी हैं जिनमें संघ को राज्य सूची के विषयों पर भी विधि बनाने की शक्ति है। इनमें से दो प्रविधान ऐसे हैं जिन्हें राज्यसभा का गैर-परिसंघीय लक्षण भी कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि इन परिस्थितियों में राज्यसभा राज्यों की प्रतिनिधि सभा के रूप में नहीं, बल्कि संघ की विधायिका के एक सदन के रूप में कार्य करती है। अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 312 इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इनमें राज्यसभा क्रमश: राज्य सूची के किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित करने और अखिल भारतीय सेवा के सृजन के लिए संकल्प पारित कर सकती है जिससे संघ को विधि बनाने की शक्ति मिल जाती है। इसके साथ-साथ, अनुच्छेद 353 में राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा के बाद राज्य की समस्त विधायी और कार्यपालिका शक्तियां संघ में निहित हो जाती हैं और भारत पूर्ण रूप से एकात्मक स्वरूप वाला हो जाता है।

संघ और राज्यों के बीच पर्याप्त समन्वय % कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक ढांचे में संघ-राज्य समन्वय के बावजूद इसका झुकाव संघ की ओर है। लेकिन इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि भारत का परिसंघ कमजोर है। वस्तुत: राज्यों के बिना संघ का अस्तित्व नहीं है। इसी कारण अनुच्छेद 83 (1) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि राज्यसभा का विघटन नहीं होगा। स्थायी सदन बनाए जाने के कारण ही यह संसद का उच्च सदन है। दूसरी ओर, संविधान में संशोधन की एक प्रक्रिया में भी परिसंघ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ध्यातव्य हो कि जब राष्ट्रपति, राज्यपाल या सातवीं अनुसूची के प्रविधानों में संशोधन करना हो तो ऐसे विधेयक को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों का समर्थन अनिवार्य है। उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के 97वें संशोधन 2011 को इसी आधार पर असंवैधानिक कहा है कि उसे आधे राज्यों का समर्थन नहीं मिला था। समय-समय पर परिसंघीय ढांचे को मजबूत करने वाले प्रविधान भी किए जाते रहे हैं। निश्चित रूप से भारत का राजनीतिक ढांचा संघ-राज्य सहयोग और समन्वय पर आधारित है, लेकिन अंतिम शक्ति संघ को सौंपी गई है, ताकि ऐसा ढांचा राजनीतिक रूप से एकीकृत और सांस्कृतिक रूप से अखंड बना रहे।

इस पृष्ठभूमि में अब यदि कैडर नियमों में बदलाव के प्रस्ताव पर विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि संघ और राज्य में असहमति होने पर संघ के निर्णय को अंतिम बनाना असंवैधानिक नहीं होगा। हालांकि व्यावहारिक रूप से राज्यों में कई प्रशासनिक समस्याएं आ सकती हैं और इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। यदि अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के लिए राज्य पर संघ का दबाव होगा तो उसके प्रशासनिक कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पडऩे की आशंका होगी। दूसरी ओर, अधिकारियों में भी एक प्रकार की असुरक्षा का माहौल बन सकता है। कालांतर में संघ-राज्य असहमति विवाद का रूप भी ले सकती है। इस संभावित समस्या के निदान के लिए एक ऐसी समिति गठित की जा सकती है जिसमें संघ और राज्य के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं और दोनों की प्रशासनिक आवश्यकताओं का आकलन कर लोकतांत्रिक निर्णय लेते हुए अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की सिफारिश की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, अधिकारियों के कार्यकाल की सुरक्षा का प्रविधान भी ऐसी समस्या को कम या समाप्त कर सकता है।

अत: इस प्रस्ताव को तकनीकी रूप से संवैधानिक या परिसंघीय ढांचे का अपरदन करने या बुनियादी ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाला तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन राजव्यवस्था के सुचारु संचालन और साझा लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि संघ-राज्य समन्वय को वरीयता दी जाए।

(लेखक सेंटर फार अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस, दिल्ली के अध्यक्ष हैं )

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