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रिटायरमेंट के बाद की प्लानिंग सोच-समझकर करें

Sun, 16 Jul 2017 12:29 PM (IST)

नई दिल्ली (धीरेन्द्र कुमार)। पिछले हफ्ते, मैंने इसी कॉलम में चर्चा की कि रिटायरमेंट सेविंग्स पर परंपरागत ज्ञान कैसे भारतीय बचतकर्ता को बुढ़ापे में गरीबी की ओर धकेल देता है। रिटायरमेंट महज एक घटना नहीं है, बल्कि जीवन का चरण है जो 30 या 35 साल तक रह सकता है। उस वक्त महंगाई आपकी बचत को बेहरमी से चाटती है। अगर बचत की राशि पर्याप्त रिटर्न हासिल नहीं करती है, तो यह जीते-जी ही खत्म हो जाती है। इस तरह के लंबे बुढ़ापे से बुरा कुछ भी नहीं हो सकता है, जिसमें धीरे-धीरे समृद्धि खो जाए और आखिर में आप गरीबी में प्रवेश कर जाएं।

ऐसा आपके साथ न हो इसके लिए क्या करना चाहिए? पहला, जिसे मैंने पिछले हफ्ते विस्तार से लिखा था, वह यह है कि अपने काम के वषों के दौरान पर्याप्त बचत कर लें। फिर इस बचत को इक्विटी-समर्थित म्यूचुअल फंडों में निवेश कर दें। दूसरा, जिस पर आज मैं चर्चा करूंगा, वह यह है कि रिटायरमेंट के बाद बचत की राशि से कमाई व खर्च को कैसे निकाला जाए।

महंगाई के बारे में मैं जो कुछ कहता आया हूं, अगर आपने समझ लिया है तो बुनियादी आवश्यकता खुद साफ हो जाती है। आपको अपने निवेश पर मिले रिटर्न का केवल वह हिस्सा खर्च करना चाहिए जो महंगाई की दर से ज्यादा है। यह कहने का एक और तरीका है कि आपको अपनी मूल राशि के मूल्य की बचत करनी चाहिए। इस पूरी बात का लब्बोलुआब यह है कि अपनी मूल राशि के वास्तविक, मुद्रास्फीति-समायोजित मूल्य की रक्षा करें। न कि सिर्फ उस राशि की जिसे आपने बचाकर निवेश किया है। तो आप इसे कैसे अंजाम देंगे?

आइए, एक सरल उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए कि आज आप रिटायर होते हैं और आपकी एक करोड़ रुपये की रिटायरमेंट सेविंग्स हैं। आप बैंक में इसकी एफडी करा देते हैं। एक साल बाद, इस निवेश की कीमत करीब 1.07 करोड़ रुपये हो जाएगी। इस तरह आपने 7 लाख रुपये कमाए, जो आप खर्च कर सकते हैं। लेकिन थोड़ा रुकिए। 5 फीसद की वास्तविक मुद्रास्फीति दर मान लें तो अगर मूलधन के वास्तविक मूल्य को बचाए रखना है, तो आपको बैंक में 1.05 करोड़ रुपये छोड़ने होंगे। इस तरह आपके पास एक साल में खर्च के लिए दो लाख रुपये बचते हैं। यह राशि 16,666 रुपये प्रति माह बैठती है। सवाल उठता है कि क्या यह पर्याप्त है? एक मध्यम वर्ग के व्यक्ति के लिए, कतई नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि ब्याज दरों में वृद्धि होने पर भी यह गणना बदलती नहीं है। वजह यह है कि महंगाई और ब्याज दर में करीबी संबंध है। एक के बढ़ने या घटने के साथ दूसरे में भी वैसा ही बदलाव देखने को मिलता है। दरअसल, वास्तविक (मुद्रास्फीति-समायोजित) ब्याज दर को 1.5 और दो फीसद के बीच रखने के लिए यह आरबीआइ (राजन के समय से) का घोषित लक्ष्य है। यह और बात है कि आधिकारिक मुद्रास्फीति की दर से तुलना नहीं करने पर वास्तविक दर कम रहती है। इसका मतलब यह है कि अगर आपको हर महीने 50 हजार रुपये की आवश्यकता है, तो आपको तीन करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। बेशक, उस स्तर पर, आयकर भी बनेगा और सालाना करीब 30 हजार रुपये का भुगतान करना होगा। यह वास्तव में खराब बात है। लंबी अवधि में ऐसा हुआ है जब फिक्स्ड इनकम की ब्याज दर मुद्रास्फीति की दर से नीचे रही। इसके अलावा, रिटर्न मिला हो या नहीं, टैक्स का भुगतान करना पड़ा।

इक्विटी-समर्थित म्यूचुअल फंड में यह स्थिति बहुत अलग होती है। फिक्स्ड डिपॉजिट के उलट इन फंडों में ज्यादा कमाई होती है लेकिन इनसे जोखिम जुड़ा होता है। किसी एक वर्ष में, रिटर्न ज्यादा या कम हो सकते हैं, लेकिन पांच से सात साल या इससे अधिक की अवधि में ये फंड आराम से मुद्रास्फीति की तुलना में छह से सात फीसद या इससे भी ज्यादा रिटर्न देते हैं। उदाहरण के लिए पिछले पांच वर्षो में, ज्यादातर इक्विटी फंडों ने सालाना 12 फीसद या इससे ज्यादा का रिटर्न दिया है। कुछ एक ने तो 20 फीसद तक रिटर्न दिया। अलग-अलग वषों में उतार-चढ़ाव जरूर हो सकता है, जिसके लिए बचतकर्ता को तैयार रहना चाहिए, लेकिन बुढ़ापे में गरीबी का खतरा मौजूद नहीं होता है।

इस तरह के फंड में, आराम से हर साल चार फीसद तक निकाला जा सकता है। उससे भी बड़ी बात यह है कि इसमें कोई आयकर नहीं है। अगर निवेश की अवधि एक वर्ष से अधिक है, तो इक्विटी फंड से रिटर्न पूरी तरह कर-मुक्त है। इसका मतलब यह है कि इक्विटी फंडों के माध्यम से दिए गए मासिक व्यय के लिए आपको जमा के मुकाबले आधे निवेश की जरूरत होगी। लिहाजा, प्रति माह 50 हजार रुपये की मासिक आय के लिए 3 करोड़ के बजाय 1.5 करोड़ रुपये पर्याप्त होंगे। मुझे लगता है कि इस तरह के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिन्होंने इस विचार को समझना और इसे सराहना शुरू कर दिया है। हालांकि, बड़ी संख्या में ऐसे सेवानिवृत्त हैं जो आज भी सुरक्षा की परंपरागत सोच से बंधे हुए हैं। इन्हें बुढ़ापे में भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आप इनमें से एक न बनें।

(यह लेख वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेन्द्र कुमार ने लिखा है।) 

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