सुअरों में पाए जाने वाला स्ट्रेन इंसानों के लिए घातक, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल का पड़ रहा व्यापक असर

विज्ञानियों का कहना है कि मनुष्यों के संक्रमित होने की स्थिति काफी कम है लेकिन यह आंकड़ा बढ़ रहा है जो चिंताजनक है। बताया जाता है कि कई वर्षो तक सुअरों को डायरिया से बचाने के लिए जिंक आक्साइड का उपयोग किया जाता रहा।

Sanjay PokhriyalPublish: Thu, 30 Jun 2022 02:59 PM (IST)Updated: Thu, 30 Jun 2022 03:18 PM (IST)
सुअरों में पाए जाने वाला स्ट्रेन इंसानों के लिए घातक, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल का पड़ रहा व्यापक असर

कैंब्रिज, एएनआइ : पशु-पक्षियों के विभिन्न वायरस से संक्रमित होने से मनुष्यों पर भी खतरा मंडराने लगा है। कई रोग जिससे विभिन्न पशु संक्रमित होते हैं, उनके संपर्क में आने से मनुष्यों में भी बीमारी आने का खतरा पिछले कुछ दशकों में बढ़ा है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि वायरस अपने स्वरूप और आंतरिक संरचना में बदलाव कर मनुष्यों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस क्रम में यूनिवर्सिटी आफ कैंब्रिज के एक नए अध्ययन में पाया गया है कि सुअर पालन में अत्यधिक एंटीबायोटिक के इस्तेमाल का इस नस्ल पर व्यापक असर पड़ा है। विज्ञानियों के अनुसार, एमआरएसए सुपरबग के उच्चस्तरीय एंटीबायोटिक रेसिसटेंट स्ट्रेन गत 50 वर्षो में उभरकर सामने आया है। यूरोपीय पशुधन में सीसी 398 नामक स्ट्रेन एमआरएसए का प्रमुख प्रकार बन गया है। इससे मानव में संक्रमण का भी खतरा बन गया है। इस स्ट्रेन से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने का जोखिम है। पशुओं के सीधे या किसी प्रकार से संपर्क में आने से संक्रमण की संभावना हो सकती है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा विभाग से पूर्व में जुड़ी प्रमुख लेखक जेम्मा मूरे बताती हैं कि एंटीबायोटिक के लंबे समय तक अत्यधिक इस्तेमाल ने सुअरों में इस स्ट्रेन को जन्म दिया है।

मूरे का कहना है कि इस शोध में पाया गया कि सुअरों में यह एंटीबायोटिक प्रतिरोध कई दशकों से स्थिर है। साथ ही यह बैक्टीरिया कई अन्य पशुओं में फैल गया है। यूरोपीय देशों के संदर्भ में देखें तो पहले की तुलना में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल काफी कम हो गया है। नीतिगत बदलावों के कारण एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को कम किया गया है, लेकिन सुअर पालन के मामले में यह स्ट्रेन लगातार स्थिर है और इसका सीमित प्रभाव पड़ा है।

सीसी 398 नामक स्ट्रेन विशेष रूप से सुअरों में पाया जाता है। इसकी वृद्धि विशेष रूप से डेनिश सुअर फार्मो में स्पष्ट हुई है। वर्ष 2008 में जहां एमआरएसए पाजिटिव महज पांच प्रतिशत थे, वर्ष 2018 यह 90 प्रतिशत तक पहुंच गया। हालांकि एमआरएसए सुअरों में बीमारी का कारण नहीं बनता है। कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पशु चिकित्सा विभाग के डा. लूसी वेनर्ट का कहना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को किसी प्रकार के जोखिम से बचाने के लिए यूरोपीय पशुओं में सीसी 398 के उद्भव और सफलता को समझना जरूरी है। मनुष्यों को संक्रमित करने के लिए एमआरएसए जीनोम के तीन मोबाइल अनुवांशिक तत्वों से जुड़ी हुई है।

बाद में इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए इसे प्रतिबंधित करने की तैयारी है। विज्ञानियों के मुताबिक इस प्रतिबंध से कोई खास असर नहीं पड़ेगा। वर्ष 1960 में पहली बार एमआरएसए को मानव रोगियों में पहचाना गया। एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध के कारण अन्य जीवाणु संक्रमण की तुलना में इसका इलाज बेहद कठिन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन एमआरएसए को मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा मानता है।

Edited By Sanjay Pokhriyal

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