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जानें, क्यों डोनाल्ड ट्रंप के इस सनकभरे फैसले से पूरी दुनिया होगी प्रभावित

Fri, 08 Dec 2017 11:29 AM (IST)

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क]। मध्य पूर्व एशिया एक बार फिर बारूद की ढेर पर खड़ा है। यरुशलम शहर को इजरायल की राजधानी के तौर अमेरिकी मान्यता के फैसले का पूरजोर विरोध हो रहा है। अरब जगत के साथ-साथ यूरोपीय देश भी ट्रंप के फैसले को अदूरदर्शी बता रहे हैं।अमेरिका अपने दूतावास को तेलअवीव से यरुशलम में स्थानांतरित कर देगा। अमेरिका के इस कदम को उसकी 70 साल पुरानी विदेश नीति से उलट देखा जा रहा है। अमेरिकी नीति के अनुसार यरुशलम का भविष्य इजरायल और फलस्तीन को बातचीत के जरिये तय करना था। इस विषय पर जानकार का क्या कहना है उससे पहले आप को बताते हैं कि पूरा मामला क्या है। 

इजरायल, फिलीस्तीन और यरुशलम विवाद
1947 में संयुक्त राष्ट्र का दखल
1947 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा यरुशलम के विभाजन का प्लान रेखांकित किया गया था। इसका मकसद यरुशलम को अलग अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में परिकल्पित करना था।
1949 में यरुशलम का हुआ विभाजन
1948 में इजरायल के आजाद होने पर शहर का विभाजन हुआ। 1949 में युद्ध समाप्त होने पर आर्मिटाइस सीमा खींची गई। इससे शहर का पश्चिमी हिस्सा इजरायल और पूर्वी हिस्सा जॉर्डन के हिस्से आया। 
पूर्वी यरुशलम बना इजरायली हिस्सा
1967 में हुए छह दिनी युद्ध में इजरायल ने जॉर्डन से पूर्वी हिस्सा भी जीत लिया। शहर को इजरायली प्रशासन चला रहा है। लेकिन फलस्तीन पूर्वी यरुशलम को भविष्य की अपनी राजधानी के रूप में देखता रह है।

इजरायल ने अमेरिका का किया शुक्रिया
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले को ऐतिहासिक और साहसी फैसला बताया। नेतन्याहू ने एक बयान में कहा,
यह ऐतिहासिक दिन है। यह करीब 70 सालों से इजरायल की राजधानी रहा है। यरुशलम तीन सदियों से हमारी उम्मीदों, हमारे सपनों, हमारी दुआओं के केंद्र में रहा है। यह 3,000 वर्षों से यहूदी लोगों की राजधानी रही है. यहां हमारे पवित्र स्थल हैं, हमारे राजाओं ने शासन किया और हमारे पैंगबरों ने उपदेश दिए।

यरुशलम को राजधानी के रूप में मान्यता देने पर फिलिस्तीनी संगठन हमास ने कहा कि ट्रंप ने नरक का रास्ता खोला है। 

भारत ने सधी टिप्पणी करते हुए कहा कि फिलस्तीन के मुद्दे पर कोई तीसरा देश स्टैंड को तय नहीं करेगा। 


 
जानकार की राय

मध्य पूर्व एशिया मामलों के जानकार वइल अव्वाद ने दैनिक जागरण से खास बातचीत में बताया कि यरूशलम को राजधानी के रूप में मान्यता देना ट्रंप का सनक भरा फैसला है। उन्होंने कहा कि सच ये है अमेरिका में अपनी गिरती लोकप्रियता से वो परेशान हैं। अंतरराष्ट्रीय जगत में ट्रंप के फैसले का विरोध हो रहा है। नेटो के सदस्य देशों का भी कहना है कि मध्य-पूर्व में शांति, स्थिरता को पटरी से उतारने की कोशिश की जा रही है। फ्रांस ने कहा कि आज जब पूरी दुनिया को शांति के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है ऐसे में ये कदम न केवल मध्य-पूर्व एशिया को अस्थिर करेगा बल्कि दुनिया के दूसरे देशों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वइल अव्वाद ने कहा कि ट्रंप का फैसला न केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी है, बल्कि सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन भी है। 1967 में जब ये तय किया गया कि यरुशलम के मुद्दे पर इजरायल कोई उकसाने वाला काम नहीं करेगा तो ऐसे में ट्रंप ने अदूरदर्शी फैसला किया है, जिसका असर आप फिलीस्तीन और इजरायल के बीच खूनी संघर्ष में बढ़ोतरी के तौर पर देखेंगे। 

एक नजर में यरुशलम
यरुशलम की आबादी 8.82 लाख है। शहर में 64 फीसद यहूदी, 35 फीसद अरबी और एक फीसद अन्य धर्मों के लोग रहते हैं। शहर का क्षेत्रफल 125.156 वर्ग किमी है। इजरायल और फलस्तीन, दोनों ही अपनी राजधानी यरुशलम को बनाना चाहते थे। इस ऐतिहासिक शहर में मुस्लिम, यहूदी और ईसाई समुदाय की धार्मिक मान्यताओं से जुड़े प्राचीन स्थल हैं।

अमेरिकी फैसले का विरोध करते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने कहा कि इस विवादित मुद्दे का समाधान संयुक्त राष्ट्र के नियमों के साथ साथ इजरायल और फिलिस्तीन के बीच तय बिंदुओं पर होना चाहिए। 

1980 में इजरायल ने यरुशलम को राजधानी घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव पारित कर पूर्वी यरुशलम पर इजरायल के कब्जा की निंदा की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। 1980 से पहले यरुशलम में नीदरलैंड और कोस्टा रिका जैसे देशों के दूतावास थे। लेकिन 2006 तक देशों ने अपना दूतावास तेलअवीव स्थानांतरित कर दिया। अंतरराष्ट्रीय समुदाय यरुशलम पर इजरायल के आधिपत्य का विरोध करता आया है लिहाजा तेलअवीव में ही सभी 86 देशों के दूतावास हैं।
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