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तकनीकी में बढ़ोतरी के साथ ही मानवरहित ड्रोन हमलों में इजाफा, भविष्य के लिए बढ़ रहा खतरा

हथियार बनाने पर रोक के बाद अब ईरान ने ड्रोन को ही आत्मघाती बना दिया है। वो इसी के इस्तेमाल से दुश्मन का नुकसान कर रहा है।

Vinay TiwariThu, 19 Sep 2019 06:48 PM (IST)
तकनीकी में बढ़ोतरी के साथ ही मानवरहित ड्रोन हमलों में इजाफा, भविष्य के लिए बढ़ रहा खतरा

नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। सऊदी अरब में सरकारी तेल कंपनी अरामको पर हुए ड्रोन हमले के बाद ऐसे ड्रोन बनाने और इनसे होने वाले हमलों पर बहस तेज हो गई है। यमन के हूती विद्रोहियों ने इन ड्रोन हमलों की जिम्मेदारी भी ले ली, हमले की जिम्मेदारी लेते हुए हूती विद्रोहियों ने कहा था कि इसके लिए उनकी ओर से 10 ड्रोन भेजे गए थे। अब एक बात ये देखने में आ रही है कि बीते कुछ सालों में मध्य पूर्व देशों में यूएवी (मानवरहित ड्रोन) से हमलों के मामले में वृद्धि हुई है। इससे एक और बात को बल मिल रहा है कि तकनीकी रूप से उतने आगे न होने के बावजूद वहां इसे बनाने में इतनी होड़ क्यों लगी है।

मानवरहित ड्रोन बन रहा युद्ध का नया हथियार 

अक्तूबर 2011 में पहली बार अफगान युद्ध के दौरान तालिबान के काफिले पर हमले के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था। ये हमलावर ड्रोन शुरू में इसराइल और अमरीका जैसे कुछ उन्हीं देशों के पास थे जो तकनीक के मामलों में आगे माने जाते हैं। जल्द ही चीन भी इसमें शामिल हो गया। चीन दुनियाभर में अपने हथियार बेचने की इच्छा रखता है। चीन ने अपने सैन्य ड्रोन को मध्य पूर्व के देशों को बेचना शुरू किया और आज यह आधा दर्जन देशों को अपने हथियार मुहैया करा रहा है। अब इन ड्रोन्स की तकनीक में बदलाव करके उसे लड़ाकू ड्रोन में भी बदला जा रहा है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण ईरान है जिसने ड्रोन की कहीं अधिक अत्याधुनिक तकनीक को यमन के हूती विद्रोहियों को ट्रांसफर करने में मुख्य भूमिका निभाई है। 

अमरीका ने अपने अभियान में किया सशस्त्र ड्रोन का इस्तेमाल  

अमरीका ने मध्य पूर्व में अल-कायदा और तथाकथित इस्लामिक स्टेट (आईएस) के खिलाफ अपने अभियान में सशस्त्र ड्रोन का भरपूर इस्तेमाल किया है, प्रीडेटर और रीपर जैसे ड्रोन का उसने सीरिया, इराक, लीबिया और यमन में इस्तेमाल किया है। प्रीडेटर से बड़ा, भारी और कहीं अधिक क्षमता वाला एमक्यू-9 रीपर है जो कहीं बड़े हथियार को लंबी दूरी तक लेकर जा सकता है। अमरीका के सैन्य सहयोगी ब्रिटेन ने यूएसए से कई रीपर खरीदे और इसका इस्तेमाल इराकी और सीरियाई लक्ष्यों को ध्वस्त करने में किया।

नीदरलैंड में क्यों हो रही है ड्रोन्स की जंग 

इसराइल ड्रोन तकनीक को बेचने के मामले में कहीं आगे है। 2018 के एक शोध के मुताबिक बिना हथियार वाले ड्रोन को बेचने के मामले में करीब 60 फीसदी वैश्विक बाजार पर इसराइल का कब्जा है। अन्य देशों के अलावा इसने निगरानी करने वाले ड्रोन रूस को भी बेचे हैं और इनमें से कम से कम एक को उसने तब मार गिराया था जब सीरिया की सीमा से वो इसराइल में घुसने की कोशिश कर रहा था। खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी करने और हमले के अभियानों को अंजाम देने के लिए इसराइल अलग अलग तरह के ड्रोन का इस्तेमाल करता है। इसके सशस्त्र ड्रोन में हेरॉन टीपी, हर्मिस 450 और हर्मिस 900 शामिल हैं। 

हथियार बनाने पर प्रतिबंध तो बनाया सशस्त्र ड्रोन  

हथियार बनाने पर रोक और प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने कहीं बेहतर सशस्त्र ड्रोन विकसित करने की अपनी क्षमता विकसित की है। 2012 में इसने शाहेद-129 के बारे में जानकारी दी जिसका सीरिया और इराक में लक्ष्यों को भेदने में इस्तेमाल भी किया गया। 2018 से वह मोहाजेर 6 नामक ड्रोन बना रहा है। ईरान के ड्रोन कार्यक्रम का दूसरा पहलू यह भी है कि वो इसे अपने सहयोगियों को बेचना या हस्तांतरित करने की इच्छा भी रखता है।

यूएई ने सुरक्षा में तैनात किए ड्रोन 

यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) ने चीन में बने विंग लूंग-1 ड्रोन को तैनात किया है, जिसे उसने यमन और लीबिया के गृह युद्ध में लक्ष्यों को नष्ट करने में इस्तेमाल किया। लीबिया में राष्ट्रीय सहमति वाली सरकार के समर्थन में तुर्की में बने ड्रोन इस्तेमाल किए गए। अमरीकी ड्रोन को खरीदने में असमर्थ तुर्की ने अपने खुद के ड्रोन बनाए और उनका इस्तेमाल उसने तुर्की और सीरिया के कुर्दिश टारगेट को भेदने में किया। वहीं इराक, जॉर्डन, सऊदी अरब, मिस्र और अल्जीरिया जैसे देशों ने चीन में बने ड्रोन खरीदे हैं। 

हूती विद्रोही कर रहे ड्रोन का कारगर इस्तेमाल  

हूती विद्रोही मानवरहित ड्रोन का सबसे कारगर इस्तेमाल करते हैं, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के मुताबिक़, वो कई ऐसे सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं जो ईरानी प्रौद्योगिकी पर बहुत अधिक निर्भर हैं। हूती विद्रोहियों ने क्यूसेफ -1 का इस्तेमाल किया। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के मुताबिक, बहुत हद तक ईरानी मॉडल के समान है। ये वो 'कामिकेज ड्रोन' हैं जिन्हें उनके टारगेट से जानबूझ कर टकराया गया। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हूती एक और उन्नत ड्रोन का इस्तेमाल भी करते हैं, कभी कभी इन्हें समद-2/3 बताया जाता है। माना जाता है कि ये एक छोटा विस्फोटक वारहेड है।

सीरिया की लड़ाई पहली बार हुआ ड्रोन का इस्तेमाल 

सीरिया की लड़ाई में पहली बार ड्रोन का व्यापक इस्तेमाल देखा गया जिसका उपयोग हवाई सुरक्षा को तबाह करने के लिए किया गया। तब विद्रोहियों ने सीरिया में स्थित रूसी सैन्य ठिकानों पर कई ड्रोन हमले किए थे। ऐसा माना जाता है कि लेबनान के शिया मुसलमान चरमपंथी संगठन हिज़्बुल्लाह ने कम संख्या में ड्रोन के उपयोग किए हैं ये ड्रोन उन्होंने ईरान से लिए थे।

आगे बढ़ते जाएंगे ड्रोन से हमले, सचेत होने की जरुरत 

जैसे-जैसे तकनीकी का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे ये माना जा रहा है कि आने वाले समय में ड्रोन के हमलों की संख्या में इजाफा ही होगा। चीन ने बहुत नई तकनीकी के साथ बाजार में कदम रखा है। अरामको पर हमले के बाद अब एक नई तरह की लड़ाई की संभावनाएं बढ़ रही हैं, इसमें इस तरह की नई तकनीक के ड्रोन जमकर इस्तेमाल किए जाएंगे।  

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