हॉलिडे होम' में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बनाई थी 'द ग्रेट एस्केप' की योजना, जानिए हिम्‍मत और साहस की यह अद्भुत कहानी

कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित अपने पुश्तैनी मकान में नजरबंद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों को चकमा देकर द ग्रेट एस्केप को अंजाम देने वाले थे। इसकी योजना बहुत पहले ही बन चुकी थी। पढि़ए यह विशेष रिपोर्ट।

Sumita JaiswalPublish: Sun, 23 Jan 2022 05:43 PM (IST)Updated: Mon, 24 Jan 2022 06:05 PM (IST)
हॉलिडे होम' में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बनाई थी 'द ग्रेट एस्केप' की योजना, जानिए हिम्‍मत और साहस की यह अद्भुत कहानी

सिलीगुड़ी, इरफान-ए-आजम। सन् 1941 की वह 16-17 जनवरी के बीच की रात थी। कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित अपने पुश्तैनी मकान में नजरबंद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों को चकमा देकर 'द ग्रेट एस्केप' को अंजाम देने वाले थे। इसकी योजना बहुत पहले ही बन चुकी थी। इसलिए उन्होंने अपने घर में नजरबंदी की अवस्था में ही अपनी दाढ़ी बढ़ानी शुरू कर दी थी। उस रात उन्होंने अपने तन पर भूरे रंग का एक लंबा-सा कोट व लंबा-चौड़ा पायजामा चढ़ाया। एक पठान का रूप धरा और देर रात अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की मदद से अंग्रेजों के कड़े पहरे को धता बता कर नजरबंदी से बाहर निकल पाने में कामयाब रहे।

 मुस्लिम इंश्योरेंस एजेंट जियाउद्दीन बन गए

वह अपनी कार (नंबर बीएलए 7169) की पिछली सीट पर बैठे। उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस ने ड्राइवर बन कर उन्हें कार से रातोंरात धनबाद के निकट गोमोह रेलवे स्टेशन पहुंचाया। वहां से ट्रेन पकड़ कर वह पेशावर चले गए। वहां उन्होंने अपना परिचय एक मुस्लिम इंश्योरेंस एजेंट जियाउद्दीन के रूप में रखा। पेशावर से वह अपनी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता मियां अकबर शाह की मदद से काबुल पहुंचे। काबुल में इटली के एंबेसी गए और फिर, वहां से इटली के पासपोर्ट से रूस के माॅस्को सफर किया। फिर, मॉस्को से इटली होते हुए जर्मनी पहुंचे। वह ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी के लिए जर्मनी की मदद चाहते थे। इसके लिए उन्होंने जर्मनी के सर्वेसर्वा हिटलर से मुलाकात कर बातचीत भी की। जर्मनी से उन्हें बहुत मदद भी मिली। फिर, जापान से भी उन्हें पूरी मदद प्राप्त हुई। उन्होंने आजाद हिंद फौज गठित कर हिंदुस्तान की आजादी में अहम किरदार अदा किया।

अब म्यूजियम परिसर में रखी यह कार, जिससे नेता जी ने "द ग्रेट एस्केप" को अंजाम दिया था। जागरण फोटो।

काबुल होते हुए पहुंचे जर्मनी व जापान

ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी के लिए नेताजी की जर्मनी से मदद की चाहत व गतिविधियों को अंग्रेज सरकार भी भांप गई थी। इसलिए उन्हें आए दिन गिरफ्तार किया जाता था। आखिरी बार 1940 में उन्हें गिरफ्तार कर कलकत्ता की जेल में डाल दिया गया। मगर, नेताजी को आजादी का मंसूबा पूरा करना था, जो कि जेल में रह कर कर पाना मुश्किल था। इसलिए उन्होंने जेल से रिहाई के लिए वहां आमरण अनशन शुरू कर दिया। उस दबाव में अंग्रेज सरकार ने उन्हें जेल से रिहा तो कर दिया लेकिन कलकत्ता के एल्गिन रोड स्थित उनके पुश्तैनी मकान में ही उन्हें नजरबंद भी कर दिया। जहां से 'द ग्रेट एस्केप' को अंजाम देते हुए कलकत्ता से काबुल हो कर जर्मनी व जापान पहुंच नेताजी ने हिंदुस्तान की आजादी की गजब की इबारत लिखी।

नेताजी अपने घर हॉलिडे होम के सामने भतीजे- अमिय बोस (बाएं) और शिशिर बोस के साथ, जागरण आर्काइव ।

इस घर में अंतिम बार 1939 में आए

यह कहा जाता है कि नेताजी ने यहां सिलीगुड़ी के निकट दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र के कर्सियांग में गिद्धा पहाड़ स्थित अपने 'हॉलिडे होम' में ही 'द ग्रेट एस्केप' की योजना बनाई थी। अपने इस घर पर नेताजी अंतिम बार 1939 में आए थे। सिलीगुड़ी से 30 किलोमीटर दूर कासयांग के गिद्धा पहाड़ पर लगभग पौने दो एकड़ जमीन पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस का वह ऐतिहासिक घर आज भी मौजूद है, जो अब नेताजी म्यूजियम बन गया है। इस बाबत उपलब्ध रिकॉर्ड से पता चलता है कि यह घर नेताजी के भैया अधिवक्ता शरत चंद्र बोस ने 1922 में एक अंग्रेज राउली लैस्सेल्स वार्ड से खरीदा था। अपने 14 भाई-बहनों में शरत चंद्र बोस चौथे व सुभाष चंद्र बोस नौवें थे। यह घर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार का एक 'हॉलिडे होम' था। उनका परिवार अक्सर गर्मी व पूजा आदि की छुट्टियां बिताने यहीं आता था। कहते हैं कि नेता जी के परिवार का ड्राइवर उनकी कार लेकर कलकत्ता से सड़क मार्ग से दो-चार रोज पहले ही यहां आ जाता था। फिर, नेता जी व परिवार के लोग सियालदह से दार्जिलिंग मेल के जरिये सिलीगुड़ी जंक्शन (अब सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन) पहुंचते थे। वहां से उनका ड्राइवर कार से उन्हें कर्सियांग के गिद्धा पहाड़ स्थित उनके घर ले जाता था। वह घर अब म्यूजियम है।

यहां रची-बसी हैं नेताजी की यादें

इस म्यूजियम के कार्यालय प्रभारी गणेश कुमार प्रधान बताते हैं कि इस म्यूजियम में नेताजी के बेड, फर्नीचर, पारिवारिक फोटो एल्बम व कई सामान और विशेष रूप से उनके बहुत सारे ऐतिहासिक पत्र, व बहुत सारी यादें दस्तेयाब हैं। एक यह कि ब्रिटिश सरकार ने अक्टूबर 1936 में उन्हें यहां कर्सियांग के गिद्धा पहाड़ स्थित उनके घर पर ही सात महीने के लिए नजरबंद कर दिया था। उसी दौरान देश में वंदे मातरम् गान को लेकर उत्पन्न विवाद के सिलसिले में गिद्धा पहाड़ से ही नेता जी ने रवींद्रनाथ टैगोर व पंडित जवाहरलाल नेहरू संग पत्राचार किया था। एक दिलचस्प बात यह भी है कि नेता जी ने उस दौरान 26 पत्र लिखा, जिनमें 11 पत्र एमिली शेंक्ल के नाम थे। वहीं, उन्हें भी यहां एमिली के 10 पत्र प्राप्त हुए। ये सारे पत्र सुभाष चंद्र बोस व एमिली शेंक्ल के बीच के खास निजी संबंधों की गवाही देते हैं। इसी घर में नेताजी से पहले उनके भैया स्वतंत्रता सेनानी अधिवक्ता शरत चंद्र बोस को भी अंग्रेज सरकार ने 1933 से 1935 के बीच दो साल के लिए नजरबंद किया था। यहां कर्सियांग के गिद्धा पहाड़ स्थित उनके घर से जुड़ी यादों को लेकर यह भी कहा जाता है कि 1938-39 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जो गुजरात के हरिपुरा अधिवेशन में ऐतिहासिक भाषण दिया था वह भाषण भी उन्होंने यहीं तैयार किया था। 1945 में जेल से छूटने के बाद शरत चंद्र बोस सपरिवार अक्सर इसी घर में रहा करते थे।

आजाद होना और दार्जिलिंग के घर में रहना थी, उनकी सबसे बड़ी खुशी

नेताजी को भी यहां दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र की हसीन वादियों में रहना बहुत पसंद था। एक दफा लड़कपन में उन्होंने कहा था कि 'मेरी जिंदगी का सबसे खुशी भरा दिन तब होगा जब मैं आजाद हो जाऊंगा और जब मैं दार्जिलिंग जाऊंगा'। दार्जिलिंग व यहां के गोरखाओं ने भी नेता जी को बहुत सम्मान दिया। ब्रिटिश फौज की गुलामी छोड़ कर भारत की आजादी के लिए अनेक गोरखा नेता जी के आजाद हिंद फौज से जुड़े। इधर, 1950 के दशक तक भी शरत चंद्र बोस की पत्नी विभावती देवी अपने परिवार के सदस्यों के साथ यहीं कर्सियांग के गिद्धा पहाड़ स्थित अपने घर पर छुट्टियां बिताती थीं। 1954 तक उनके परिवार के यहां रहने के साक्ष्य मिलते हैं। उसके बाद, तीन दशकों से अधिक समय तक यह घर अप्रयुक्त ही रहा। 1996 में पश्चिम बंगाल सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने इस घर के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। फिर, इसका जीर्णोद्धार और नवीनीकरण किया गया। इसे नेताजी इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज (कोलकाता) को सौंप दिया गया जिसने इस ऐतिहासिक घर को 'नेताजी म्यूजियम एंड सेंटर फॉर स्टडीज इन हिमालयन लैंग्वेजेज, सोसाइटी एंड कल्चर' में तब्दील कर दिया।

यहां सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग व कर्सियांग से नेता जी की बहुत सी खास यादें जुड़ी हुई हैं। अंत में यही कि 18 अगस्त 1945 को यह खबर आई कि ताइवान के ताइपे में जहाज के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के चलते उसमें सवार 48 वर्षीय नेता जी बुरी तरह जल गए थे और उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि, अभी तक उनकी मृत्यु हो जाने को लेकर तरह-तरह के रहस्य बरकरार  हैं।

Edited By Sumita Jaiswal

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