जानिए बिरजू महाराज की क्‍या थी अंतिम इच्‍छा, स्‍वजनों ने ऋषिकेश के गंगा घाट पर की पूजा अर्चना

प्रख्यात कथक सम्राट बिरजू महाराज की यह इच्छा थी कि वह ऋषिकेश के श्री भरत मंदिर के दर्शन करें। अब बिरजू महाराज के स्वर्गवास होने के बाद उनके पुत्र और स्वजन ने उनका दसवां ऋषिकेश गंगा तट पर संपन्न कराया।

Sunil NegiPublish: Wed, 26 Jan 2022 03:32 PM (IST)Updated: Wed, 26 Jan 2022 05:34 PM (IST)
जानिए बिरजू महाराज की क्‍या थी अंतिम इच्‍छा, स्‍वजनों ने ऋषिकेश के गंगा घाट पर की पूजा अर्चना

जागरण संवाददाता, ऋषिकेश। प्रख्यात कथक सम्राट बिरजू महाराज के दसवां पूजन के लिए उनके स्वजन ऋषिकेश पहुंचे। पौराणिक श्री भरत मंदिर के दर्शन करने के पश्चात उनके परिवार वालों ने गंगा तट पर विधि विधान से उनकी आत्मा शांति के लिए पूजा अर्चना की।

विश्व विख्यात कथक सम्राट बिरजू महाराज का बीती 17 जनवरी को स्वर्गवास हो गया था। श्री भरत मंदिर के महंत वत्सल प्रपन्नाचार्य महाराज ने बताया कि बिरजू महाराज के पुत्र ने अवगत कराया कि उनकी यह इच्छा थी कि वह श्री भरत मंदिर के दर्शन करें। अपने जीते जी वह मंदिर के दर्शन नहीं कर पाए थे। अब उनका स्वर्गवास होने के बाद उनके पुत्र और स्वजन ने यह निर्णय लिया कि उनका दसवां ऋषिकेश गंगा तट पर संपन्न कराया जाएगा। इसके साथ ही श्री भरत मंदिर कर भी दर्शन किए जाएंगे और उनकी आत्मा शांति के लिए प्रार्थना की जाएगी।

श्री भरत मंदिर परिवार के सदस्य वरुण शर्मा ने बताया कि प्रख्यात कथक सम्राट बिरजू महाराज के पुत्र पंडित जय किशन महाराज, पंडित दीपक महाराज, उनके पौत्र त्रिभुवन महाराज, स्वरांश मिश्रा, दामाद साजन मिश्रा बीती शाम श्री भरत मंदिर पहुंच गए थे। यहां उन्होंने मंदिर के दर्शन किए। बुधवार की सुबह सभी लोग गंगा तट पर पहुंचे। यहां पीपल घाट लाल मंदिर के समीप इन सभी ने स्वर्गीय बिरजू महाराज का दसवा पूजन संपन्न कराया।

बिरजू महाराज का दून से था गहरा नाता

देहरादून से कथक नर्तक पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज का गहरा नाता रहा। उनके पिता अच्छन महाराज देहरादून के राजपुर रोड पर कथक सिखाया करते थे। पंडित बिरजू महाराज जब चार वर्ष के थे तब वह पहली बार देहरादून आए थे। इसके बाद उनका यहां आना लगारहा। बिरजू महाराज को दून की शांत वादियां खूब भाती थीं। वह यहां घर बनाना चाहते थे। साथ ही यहां के बच्चों को कथक का प्रशिक्षण देना चाहते थे। वर्ष 2019 में अपनी यह इच्छा खुद पंडित बिरजू महाराज ने जाहिर की थी।

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Edited By Sunil Negi

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