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चीन पर निर्भरता कम करने को वाराणसी में फार्मा कंपनियों को चाहिए राहत, अप्रैल में 888 करोड़ का कारोबार

भारतीय दवा कंपनियां 60-70 फीसद चीन से आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं। ऐसे में वाराणसी के दवा कारोबारी सरकार से राहत की मांग कर रहे हैं ताकि चीन पर निर्भरता कम हो सके।

Saurabh ChakravartyMon, 29 Jun 2020 05:30 PM (IST)
चीन पर निर्भरता कम करने को वाराणसी में फार्मा कंपनियों को चाहिए राहत, अप्रैल में 888 करोड़ का कारोबार

वाराणसी,  [मुकेश चंद्र श्रीवास्तव]। वैसे, काशी में चीन का कारोबार तेजी से घट रहा है। लोगों व व्यापारियों ने  ड्रैगन को बाहर का रास्ता दिखाने की ठानी है। वाराणसी व आस-पास के व्यापारियों ने पांच करोड़ रुपये के चीनी उत्पाद का आर्डर रद कर यह संदेश भी दे दिया। यहां तक की बनारसी साड़ी में लगने वाले रेशम के धागे का भी आयात घटकर 25 फीसद रह गया है। बात आती है बेसिक ड्रग से दवाइयों के फार्मूलेशन और मेडिकल उपकरणों की तो इनका विकल्प भारत में 100 फीसद तैयार करना पड़ेगा। इसके बाद ही हम चीन को रास्ते पर ला सकते हैं। इसके लिए जरूरी है आत्म निर्भर होना। ऐसे में सरकार को दवा कंपनियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए नियमों में ढील देनी होगी ताकि चीन के मुकाबले उत्पाद वाजिब रेट में तैयार कर सकें।

सीमा विवाद के बाद पूरे भारत में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार व आयात बंद करने की मांग जोर पकड़ रही है। इसके लिए आत्मनिर्भर होने की भी बात की जा रही है। हमारे निर्यात के मुकाबले चीन चार गुना ज्यादा अपना सामान भारत भेजता है। भारतीय दवा कंपनियां 60-70 फीसद चीन से आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं।  कारण कि जर्मनी या अन्य देशों की तुलना में चीनी मशीनरी सस्ती मिलती है। हेल्थ केयर उपकरणों की भी यही स्थिति है। केमिकल, उर्वरक संग फार्मा इंडस्ट्री में बेसिक ड्रग का बड़ी हिस्सा चीन से आयात किया जाता है। हिमाचल, उत्तराखंड आदि राज्यों की इकाइयां चीन के बेसिक ड्रग से दवाइयों का फार्मूलेशन करतीं हैं। इन इकाइयों से जानना चाहिए कि चीन से आयातित सस्ते बेसिक ड्रग का मुकाबला स्थानीय स्तर पर कैसे हो।

एक माह में 890 करोड़ का कारोबार

पूर्वांचल की सबसे बड़ी दवा मंडी सप्तसागर वाराणसी में ही है। यहां प्रतिमाह 890 करोड़ का कारोबार होता है। केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन, वाराणसी के अध्यक्ष मनोज खन्ना ने बताया कि वैसे तो वाराणसी में फार्मा कंपनियां नहीं हैं, लेकिन दवाओं का कारोबार बेहतर है। लॉकडाउन के दौरान भी अप्रैल में 888 करोड़ का कारोबार हुआ। हेल्थकेयर, सर्जिकल उपकरण व दवा का 40 फीसद कच्चा माल चीन का ही होता है। कच्चा माल भारत में ही तैयार हो तो चीन पर निर्भरता कम होगी। बस, फार्मा इंडस्ट्री को सरकार से आर्थिक व  नियमों में राहत संग प्रोत्साहन मिले।

सस्ती व गुणवत्ता युक्त चीजें बनाने के लिए बेहतर शोध हो

दी स्माल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश भाटिया ने बताया कि चीन को पछाडऩे के लिए उद्योग का  ढांचा व तकनीकी पक्ष  मजबूत करना होगा। सस्ती व गुणवत्ता युक्त चीजें बनाने के लिए बेहतर शोध होने चाहिए। यहां 20 साल पहले पैकेजिंग की मशीनें बनती और निर्यात होती थी। बाद में चीन से मंगाई जाने लगीं हैैं। एसोसिएशन के महासचिव नीरज पारिख का कहना है कि प्रिटिंग व पैकेजिंग की वाराणसी में दो हजार मशीनें हैं। साड़ी कारोबार से जुड़े हार्डवेयर, लैपटॉप, कंप्यूटर, कढ़ाई की मशीनें 95 फीसद चीन से ही आती हैं। ये मशीनें यहां बनाने के लिए सरकार भी साथ दे रही है।

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