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Anant Chaturdashi 2021 : चौदह गांठ में भगवान श्रीहरि का नाम, यह है अनंत चतुर्दशी का मान

Anant Chaturdashi 2021 यह पर्व 19 सितंबर रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णुजी की अनंत रूप की पूजा की जाती है। अनंत अर्थात जिसके न आदि का पता है और न ही अंत का। अर्थात वे स्वयं श्रीनारायण ही हैं।

Abhishek SharmaSat, 18 Sep 2021 09:49 AM (IST)
Anant Chaturdashi 2021 : चौदह गांठ में भगवान श्रीहरि का नाम, यह है अनंत चतुर्दशी का मान

वाराणसी, जागरण संवाददाता। भगवान विष्णु को समर्पित अनंत चतुर्दशी पर्व भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इसे लोकभाषा में अनंत चौदश के नाम से जाना जाता है। यह पर्व 19 सितंबर रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णुजी की अनंत रूप की पूजा की जाती है। अनंत अर्थात जिसके न आदि का पता है और न ही अंत का। अर्थात वे स्वयं श्रीनारायण ही हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखकर एवं उनकी पूजा करके अनंतसूत्र बांधने से समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इस पूजा में सूत्र का बड़ा महत्व है। इस व्रत में स्नानादि करने के बाद अक्षत, दूर्वा, शुद्ध रेशम या कपास के सूत से बने और हल्दी से रंगे हुए चौदह गांठ के अनंत सूत्र को भगवान विष्णु को चढ़ाकर पूजा की जाती है। हर गांठ में श्रीनारायण के विभिन्न नामों से पूजा की जाती है। पहले में अनंत, उसके बाद ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव, वैकुंठ, श्रीधर, त्रिविक्रम, मधुसूदन, वामन, केशव, नारायण, दामोदर, गोविंद की पूजा होती है।

बुधादित्य योग का बन रहा विशेष संयोग : अनंत चतुर्दशी पर रविवार को इस बार विशेष मंगल बुधादित्य योग बन रहा है। इस दिन महारविवार का भी व्रत होगा। इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से हर प्रकार की परेशानी और जीवन में आने वाली बाधाओं से मुक्ति मिलता है।

पूजन के लिए यह हैशुभ मुहूर्त : काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. राम नारायण द्विवेदी के अनुसार चतुर्दशी तिथि 19 सितंबर 2021 की सुबह 6:07 मिनट से शुरू होकर, 20 सितंबर 2021 सोमवार को सुबह 5:30 मिनट तक रहेगी। पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:44 मिनट तक है। 19 सितंबर को पूरे दिन की चतुर्दशी तिथि है। राहुकाल को छोड़कर किसी भी समय पूजन किया जा सकता है। 19 सितंबर को राहुकाल शाम 4:52 से 6:22 बजे तक रहेगा।

यह है व्रत कथा : प्राचीन काल में सुमन्तु ब्राम्हण की कन्या सुशीला कौण्डिन्य को व्याही थी। उसने दीन पत्नियों से पूछकर अनन्त व्रत धारण किया। एक बार कुयोगवश कौडिन्य में अनन्त के डोरे को तोड़ कर आग में पटक दिया। उससे उसकी संपत्ति नष्ट हो गई। तब वह दुखी होकर अनन्त को देखने वन में चला गया। वहां आम्र, गौ, वृष, खर, पुष्करिणी और वृद्ध ब्राम्हण मिले। ब्राम्हण स्वयं अनन्त थे। वे उसे गुहा में ले गए वहां जाकर बतलाया कि वह आम वेद पाठी ब्राह्मण था। विद्यार्थियों को न पढ़ाने से आम हुआ। गौ पृथ्वी थी, बीजापहरण से गौ हुई। वृष धर्म, खर क्रोध और पुष्करिणी बहने थी। दानादि परस्पर लेने देने से उस पुष्करिणी हुई। वृद्ध ब्राह्मण मैं हूं। अब तुम घर जाओ। रास्ते में आम्रादि मिले उनसे संदेशा कहते जाओ और दोनों स्त्री पुरुष व्रत करो सब आनंद होगा। इस प्रकार 14 वर्ष या (यथा सामर्थ्य) व्रत करें। नियत अवधि पूरी होने पर भाद्र पद शुक्ल 14 को उद्यापन करें। उसके लिए सर्वतोभद्रस्थ कलश पर कुश निर्मित या सुवर्णमय अनन्त की मूर्ति और सोना चांदी ताँबा रेशम या सूत्र का (14 ग्रंथ युक्त) अनंत दोरक स्थापन करके उनका वेद मंत्रों से पूजन और तिल, घी, खांड, मेवा एवं ही आदि से हवन करके गोदान, शय्यादान, अन्नदान ( 14 घट, 14 सौभाग्य द्रव्य, और 14 अनंत दान,) कर के १४ युग ब्राह्मणों को भोजन करावें और फिर स्वयं भोजन करके व्रत को समाप्त करें।

Edited By: Abhishek Sharma

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