देवबंद में आजादी के मतवालों ने हंसकर चूमा था फांसी का फंदा

मोईन सिद्दीकी, देवबंद (सहारनपुर) : देश की आजादी की लड़ाई में देवबंद के आजादी के मतवाले भी हंसते हंसते

Publish: Tue, 11 Aug 2015 11:51 PM (IST)Updated: Tue, 11 Aug 2015 11:51 PM (IST)
देवबंद में आजादी के मतवालों ने हंसकर चूमा था  फांसी का फंदा

मोईन सिद्दीकी, देवबंद (सहारनपुर) : देश की आजादी की लड़ाई में देवबंद के आजादी के मतवाले भी हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। 1857 की क्रांति में सरजमीं ने देवबंद में ही फिरंगियों द्वारा उलेमा समेत 40 शूरवीरों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। अंग्रेजों के हथियार लूटने वाले एक गुरु शिष्य भी खुशी खुशी फांसी के फंदे पर लटक गए थे। देश की आजादी की लड़ाई में उलेमा और दारुल उलूम के योगदान को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

वर्ष 1857 में देश की आजादी के लिए क्रांति का बिगुल फूंका गया तो देवबंद के हर वर्ग के लोगों ने हिस्सेदारी की। उलेमा ने आजादी के लिए न सिर्फ आंदोलन चलाए बल्कि अपनी जान भी न्योछावर कर बेमिसाल कुर्बानियां दी। मौलाना कासिम नानौतवी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही के नेतृत्व में उलेमा के जत्थे ने शामली के मैदान में जंग लड़ी। इस जंग का उद्देश्य अंबाला से मेरठ और दिल्ली जाने वाली अंग्रेजों की रसद के रास्ते को खत्म करना था। इस लड़ाई में उलेमा ने अंग्रेजों को करारी शिकस्त देते हुए फतेह हासिल की। इस लड़ाई को इतिहास में शामली मार्का के नाम से जाना जाता है। इसके बाद उलेमा द्वारा वर्ष 1866 में देवबंद में दारुल उलूम की स्थापना की गई। इस संस्था की स्थापना का मकसद धार्मिक शिक्षा के साथ ही अंग्रेजों की नजर से बचाकर ऐसे क्रांतिकारी पैदा करना था, जो बिना भेदभाव और नस्ल के अंग्रेजों से लोहा लें और भारत को आजाद कराने में अहम योगदान दें। मौलाना कासिम के बाद हाजी आबिद हुसैन, शेखुल ¨हद मौलाना महमूद हसन देवबंदी, मौलाना रफीउद्दीन उस्मानी, मौलाना जुल्फिकार और मौलाना वहीदउद्दीन का देश की आजादी की लड़ाई में खासा योगदान रहा। उधर, जहां 1857 की क्रांति में देवबंद के उलेमा समेत 40 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया। वहीं वर्ष 1863 में सोमदत्त त्यागी और उनके शिष्य जावेद अख्तर को अंग्रेजी हथियार लूटने के आरोप में फांसी की सजा दी गई। इतिहासकारों के मुताबिक 1863 में जब देवबंद के रास्ते अंग्रेजों द्वारा सहारनपुर हथियार ले जाए जा रहे थे। तब गुरु शिष्य ने अंग्रेजों से हथियार लूट लिए। लेकिन इस दौरान वे पकड़े गए। देवबंद निवासी जावेद की उम्र 18 वर्ष थी। जिसे देखते हुए अंग्रेजों ने माफी मांगने पर उसकी सजा माफ करने को कहा। लेकिन जावेद ने माफी नहीं मांगी। इसके बाद दोनों गुरू शिष्य को अंग्रेजों ने देवीकुंड के मैदान में फांसी दे दी। अब उस स्थान पर शिलापट स्थापित है। जहां जंगे आजादी के दीवानों को याद किया जाता है।

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