UP Election 2022: यूपी चुनाव में बहुत दूर तक जाएगा कैराना का संदेश

UP Vidhan Sabha Election 2022 कैराना क्षेत्र में भाजपा नेता ही ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं जबकि अन्य पार्टियों के नेता अभी शांत ही दिखते हैं। हो सकता है कि उनकी रणनीति कुछ और हो लेकिन जनता से अधिक दूरी उनके लिए नुकसानदेह भी हो सकती है।

Sanjay PokhriyalPublish: Mon, 24 Jan 2022 12:19 PM (IST)Updated: Mon, 24 Jan 2022 12:45 PM (IST)
UP Election 2022: यूपी चुनाव में बहुत दूर तक जाएगा कैराना का संदेश

लखनऊ, राजू मिश्र। उत्तर प्रदेश में सात चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से पहले चरण में 58 सीटों पर 10 फरवरी को मतदान के लिए नामांकन का काम पूरा हो चुका है और नाम वापसी के बाद तस्वीर स्पष्ट हो पाएगी कि कितने प्रत्याशी मैदान में शेष हैं। पहले चरण में शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, हापुड़, गाजियाबाद, बुलंदशहर, मथुरा, आगरा, गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) और अलीगढ़ कुल 11 जिलों में चुनाव होने हैं। ये सभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वे जिले हैं जहां मुद्दों से ज्यादा जातिगत समीकरण अहमियत रखते हैं। मेरठ और सहारनपुर मंडल में जबरदस्त ढंग से जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश राजनीतिक दल कर रहे हैं। लेकिन दिलचस्प पहलू है कि इसे जाट बेल्ट भी कहा जाता है, जहां भाजपा ने छह जाट नेताओं को टिकट दिया है, जबकि जाटों का अलंबरदार बनने वाली पार्टी रालोद ने सपा से गठबंधन करके केवल तीन जाटों को टिकट दिया है। ऐसे में मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। होर्डिग्स और पोस्टर के बिना यद्यपि यहां चुनाव प्रचार सूना लग रहा है, पर इंटरनेट मीडिया के जरिये प्रचार ने खूब धमाका मचा रखा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का मूड सबसे जुदा माना जाता है, जहां जाति-धर्म का मुद्दा ज्यादा मायने रखता है और अन्य जरूरी मुद्दे गौण हो जाते हैं, यही कारण है कि राष्ट्रीय राजधानी के निकट होने के कारण जितनी तरक्की इस क्षेत्र की होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। यह जरूर है कि योगी सरकार के आने के बाद विकास कमोबेश संतुलित हुआ है और प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र तक पहुंच रहा है, लेकिन यह भी सोचने वाली बात है कि यदि राजनीतिक पार्टियों को मतदाता जाति-धर्म के उलझनों में ही उलझाए रखेंगे तो निश्चित रूप से पार्टियां विकास के जरूरी मुद्दों को छोड़कर वोटों की गुणा गणित में ही व्यस्त रहेंगी, जिसे क्षेत्र के विकास के लिए उचित नहीं कहा जा सकता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात है क्षेत्र में गन्ना किसानों की समस्या और अपराध। योगी सरकार से पहले गन्ना किसानों की समस्या और अपराध की स्थिति सबके सामने थी। अब बदले हालात को भी लोग महसूस कर रहे हैं, फिर भी चुनाव में जनता को बहुत ही सावधानी से प्रत्याशी का चयन करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को जाति-धर्म की बाधा से ऊपर उठकर बेहतर भविष्य दिया जा सके। अब यह मतदाताओं पर निर्भर करता है कि वे अच्छे और सच्चे प्रत्याशी का चुनाव करते हैं या अपने पुराने ख्यालों में फंसकर गलतियां फिर से दोहराएंगे।

वेस्ट यूपी में राष्ट्रीय लोकदल को लेकर लोगों में खास उत्सुकता थी। राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि पहले और दूसरे चरण के लिए रालोद-सपा गठबंधन के प्रत्याशी चयन में कोई रणनीतिक सोच परिलक्षित नहीं हो रही है। यहां सभी बिरादरी या यूं कहें कि सर्वसमाज असामाजिक तत्वों पर लगाम लगने से सर्वाधिक प्रसन्न है। नदीपुत्र रमन त्यागी कहते हैं कि जिन सीटों पर लोकदल ने जाट के अलावा मुस्लिम उम्मीदवार दिए हैं और भारतीय जनता पार्टी ने जाट को प्रत्याशी बनाया है, वहां जाट बिरादरी के वोट का बड़ा हिस्सा गठबंधन को जाता नहीं लग रहा है। किसान आंदोलन के बाद जिस हवा का लाभ लोकदल ले सकता था उसे जयंत चौधरी के बचकाने व लचीले निर्णयों ने गवां दिया है। सरकार द्वारा बिजली की दरें आधी करने से किसानों को संतुष्टि हुई है। किसान आंदोलन के दबाव में सरकार द्वारा गन्ना मिलों से किसानों का भुगतान भी लगभग 90 प्रतिशत कराया जा चुका है।

पांच बरस पहले यूपी का चुनावी ताप समझने की खातिर कैराना जाना हुआ था। तब लग रहा था कि प्रदेश में भाजपा को ढाई सौ से कहीं अधिक सीटें मिलेंगी। इसलिए कैराना के मायने समझने होंगे। कैराना पहुंचकर शीर्ष भाजपा नेता एवं गृहमंत्री अमित शाह ने जिस जोश और उमंग के साथ घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया, उससे तो यही लगता है कि कैराना से निकला संदेश एक बार फिर पूरे राज्य में लहर पैदा करेगा। शाह ने यहां घर-घर मतदाताओं से संपर्क करने के साथ पलायन के बाद घर लौटे परिवारों का भी हाल जाना। पिछले चुनाव में भाजपा ने पलायन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। भाजपा की जीत में इस मुद्दे की भी अहम भूमिका रही। इस बार भी पार्टी कैराना मुद्दे को धार देना चाहती है।

Edited By Sanjay Pokhriyal

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