राष्ट्रीय शर्करा संस्थान ने खोई से बनाया 'एक्टिवेटेड बायोचार' अब रंगहीन होगी चीनी, कीमत भी घटेगी

संस्थान के भौतिक रसायन अनुभाग के कनिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डा. सुधांशु मोहन के निर्देशन में कन्नौज निवासी शोध छात्रा शालिनी कुमारी ने डेढ़ वर्ष परिश्रम के बाद खोई से एक्टिवेटेड बायोचार उत्पाद बनाया है। एक्टिवेटेड बायोचार चीनी के घोल को रंगहीन व शुद्ध करेगा।

Abhishek VermaPublish: Tue, 25 Jan 2022 12:21 PM (IST)Updated: Tue, 25 Jan 2022 01:53 PM (IST)
राष्ट्रीय शर्करा संस्थान ने खोई से बनाया 'एक्टिवेटेड बायोचार' अब रंगहीन होगी चीनी, कीमत भी घटेगी

कानपुर, जागरण संवाददाता। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (NSI) ने गन्ना पेराई के बाद निकलने वाली खोई से 'एक्टिवेटेड बायोचार' बनाने में सफलता प्राप्त की है। इससे कम लागत में चीनी को रंगहीन व शुद्ध करने में मदद मिलेगी और चीनी की कीमत भी कम होगी। यही नहीं, इस बायोचार से चीनी मिलों से निकलने वाले गंदे पानी को भी साफ किया जा सकेगा।

निदेशक प्रो. नरेन्द्र मोहन ने बताया कि वर्तमान समय में गन्ने की खोई को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अब संस्थान के भौतिक रसायन अनुभाग के कनिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डा. सुधांशु मोहन के निर्देशन में कन्नौज निवासी शोध छात्रा शालिनी कुमारी ने डेढ़ वर्ष परिश्रम के बाद खोई से एक्टिवेटेड बायोचार उत्पाद बनाया है। शालिनी ने दिल्ली विवि के मिरांडा हाउस से स्नातक व परास्नातक किया और आइआइटी से प्रोजेक्ट एसोसिएट के तौर पर काम किया था। निदेशक ने बताया कि वर्तमान में चीनी मिलों में चीनी के घोल को रंगहीन व साफ करने के लिए आयन एक्सचेंज रेसिन का इस्तेमाल किया जाता है। आयात किए जाने के कारण यह काफी महंगा होता है और इससे काफी उत्प्रवाह निकलता है, जिससे प्रदूषण की समस्या बनी रहती है। संस्थान की ओर से निर्मित एक्टिवेटेड बायोचार, आयन एक्सचेंज रेसिन की जगह इस्तेमाल होगा और चीनी के घोल को रंगहीन व शुद्ध करेगा। साथ ही चीनी मिलों से निकलने वाले गंदे पानी का ट्रीटमेंट करेगा। आगे चलकर एक्टिवेटेड बायोचार से अन्य मिलों में उत्प्रवाह के ट्रीटमेंट पर भी शोध कार्य कराया जाएगा। साथ ही चीनी मिलों में बायोचार बनाने की तकनीकी विकसित की जाएगी।

550 डिग्री तापमान पर खोई को जलाकर बनाया बायोचार

निदेशक ने बताया कि एक्टिवेटेड बायोचार शुगर मेल्ट (चीनी घोल) को पहले से 30 प्रतिशत ज्यादा रंगहीन करेगा। छात्रा शालिनी ने बताया कि बायोचार बनाने के लिए खोई को सुखाकर पीसा और छाना गया, ताकि वांछित आकार के रेशे प्राप्त हों। इसके बाद हवा की अनुपस्थिति में 550 डिग्री सेल्सियस तापमान पर जलाया गया और ठंडा करके उसकी सतह में क्रियाशील बनाने के लिए एसिड ट्रीटमेंट किया गया।

एक किलो खोई से बनेगा 100 ग्राम एक्टिवेटेड बायोचार

छात्रा ने बताया कि एक किलो खोई से एक्टिवेटेड बायोचार की रिकवरी 10 प्रतिशत होती है। खोई का बाजार मूल्य 2000 रुपये प्रति टन है, यानी कि इतनी कीमत में 200 टन बायोचार बनाया जा सकता है। आयात किए जाने के कारण आयन रेसिन काफी महंगा पड़ता है। डा. सुधांशु मोहन ने बताया कि एक्टिवेटेड बायोचार के प्रयोग से चीनी के शोधन की लागत कम होगी। चीनी की कीमत 25 पैसे से 50 पैसे तक घटेगी।

Edited By Abhishek Verma

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