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पैसे की पाठशाला से बच्चों को सिखाएं इन्वेस्टमेंट के गुर, जानिए- अर्थयुग में क्यों पड़ रही इसकी जरूरत

Warren Buffett ने महज 11 वर्ष की उम्र से निवेश करना आरंभ किया था और आज वह विश्व के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। यह बहुत आवश्यक है कि किशोरावस्था में ही निवेश के संस्कार डाले जाएं ताकि गाढ़ी मेहनत की कमाई का सबक जिंदगी भर काम आए।

Shaswat GuptaFri, 26 Nov 2021 09:09 AM (IST)
पैसे की पाठशाला से बच्चों को सिखाएं इन्वेस्टमेंट के गुर, जानिए- अर्थयुग में क्यों पड़ रही इसकी जरूरत

[विनायक सप्रे]। आम तौर पर जब बच्चे बड़े होकर नाम कमाते हैं तब अक्सर हम कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिखाई दे गए थे यानी कि बच्चा बचपन से ही पढ़ाई अथवा खेलकूद में अव्वल रहा होगा, लेकिन निवेश के मामले में ऐसा नहीं होता। जब कभी हम किसी बड़े अथवा सफल निवेशक के बारे में पढ़ते हैं आम तौर पर हमें यह पता नहीं होता कि उनका बचपन कैसा था।

लेकिन यदि हम गौर से देखें तो पाएंगे कि जिन पालने के पूतों की हम बात करते हैं, उन बच्चों की प्रतिभा को निखारने में उनके अभिभावकों का आम तौर पर बहुत योगदान होता है। उसको हम आसान भाषा में यह कह सकते हैं कि माता-पिता और गुरु के दिए संस्कार ही उस बच्चे को सफलता के पथ पर आगे जाने में मददगार साबित होते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ पिछले 25 सालों में हमारे समाज के व्यवहार में बहुत बदलाव आए। उनमें से कई बदलावों पर ध्यान नहीं गया और न जाने कब वो हमारी जिंदगी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गए, पता ही न चला। इन 25 वर्षों में एक पीढ़ी के विचार प्रक्रिया में बहुत बदलाव देखा गया जो आने वाले पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करेगा।

इन बड़े बदलावों में से एक, समाज के खर्च करने, उनके रहन सहन और उनकी जीवन शैली के रूप में बड़ा बदलाव आया। त्योहारों और विवाह के अतिरिक्त भारतीय आमतौर पर खर्च करते समय बहुत विचार करते हैं और साथ ही निवेश करते समय भी बहुत ज्यादा पुराने विचारों के होते हैं और अपनी परंपरागत सोच ही रखते है । पिछले 25 सालों में खर्च के पैटर्न में बदलाव को देखा गया। पहले जो चीजें विलासिता के रूप में मानी जाती थी , वही चीज़े रातों रात आवश्यकता हो गई।  पिछले 15-16 वर्षों में लोगो के वेतन में भारी वृद्धि हुई जिससे लोगों में अधिक खर्च करने की होड़ शुरू हो गई। ब्याज दरों में तेजी से कमी आई। बाजारों में घरों और वाहनों से लेकर यात्रा सम्बन्धी टिकट तक लगभग सभी चीजों के लिए ऋण उपलब्ध होने लगे। अब तो ई.एम.आइ पर कपड़े भी उपलब्ध हैं ।

“ अभी खरीदें और पैसे का भुगतान बाद में करे ” ये सोच युवा पीढ़ी के दिमाग में बहुत तेज़ी से चल रही है। उच्च वेतन और कम ब्याज दरों ने इस प्रवृत्ति को और भी बढ़ा दिया है। लोग चकाचौंध जीवन जीने के आदी हो गये है ।

हालांकि ये परिवर्तन खर्च के संबंध में हो रहे थे  लेकिन  निवेश अथवा बचत के सन्दर्भ में ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं हो रहा था।

पिछले 18 महीनों में तो बहुत लोगों की नौकरियां गईं अथवा आमदनी में भारी कटौती हुई है और तो और अब सबसे बड़ा डर यह है कि तेजी से बढ़ते डिजिटलाईजेशन की वजह से निजी संस्थानों में लोगों का 58 या 60 की उम्र तक काम करना लगभग असंभव हो जायेगा और यहाँ तक कि सरकारी संस्थानों में पेंशन न मिलने की वजह से यदि पर्याप्त मात्रा में धन उपलब्ध न हो तो सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन संघर्षमय हो सकता है। पर्याप्त धन तभी उपलब्ध हो सकता है जब लोगों को जल्द से जल्द निवेश की आदत पड़े और इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि किशोरावस्था में ही बच्चों को निवेश के संस्कार डाले जाएँ ताकि वे गाढ़ी मेहनत की कमाई का सदुपयोग समझ सके। काश ऐसी कोई पाठशाला होती जहाँ इन बच्चों को निवेश के संस्कार लगाये जाते।  

हालांकि यह बहुत कठिन नहीं है। शुरूआती तौर पर उनको यह बताना बहुत आवश्यक है कि एक अच्छा निवेशक बनने  के लिए खूब सारा धैर्य, अनुशासन आवश्यक है। चक्रवृद्धि ब्याज को जानना सिर्फ परीक्षापयोगी नहीं है अपितु इसका निवेश जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है। जितना जल्दी निवेश की शुरुआत करेंगे उतनी ही ज्यादा संभावना बड़े निवेशक बनने की हो जाती है। प्रसिद्ध  निवेशक  वारेन बफेट ने महज 11 वर्ष की उम्र से निवेश करना आरम्भ किया था और आज वह विश्व के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। मैं अपने स्तर पर शिक्षण संस्थानों के साथ ‘पैसे की पाठशाला’ के माध्यम से  बच्चों को वित्तीय रूप से साक्षर करने का प्रयत्न कर रहा हूँ परन्तु यह पहाड़ जैसा काम अकेले के बस की बात नहीं है। वित्तीय साक्षरता आसान भाषा में 12वीं के बाद के बच्चों के लिए उन व्यक्तियों के द्वारा कराई जानी चाहिए जो निवेश जगत में सक्रिय हैं ताकि उनको प्रैक्टिकल ज्ञान मिल सके न कि किताबी ज्ञान।

फिर जब इनमें से कुछ बच्चे भविष्य में बड़े निवेशक बनें तो लोग कह सकें कि पूत के पांव पालने में ही दिखाई दे गए थे!

Edited By: Shaswat Gupta

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