न रैली न रोड शो, मेड़ पर कलेवा के साथ प्रचार

102 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक चिरंजीलाल ने किया चुनाव प्रचार के पुराने तरीकों पर विचार साझा

JagranPublish: Sat, 22 Jan 2022 01:18 AM (IST)Updated: Sat, 22 Jan 2022 01:18 AM (IST)
न रैली न रोड शो, मेड़ पर कलेवा के साथ प्रचार

रामबाबू यादव, हाथरस : आजादी के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत जब-जब चुनाव की बेला आई तब-तब प्रचार का तरीका बदलता गया। आज के हाईटेक युग में डिजिटल चुनाव प्रचार ने मतदाताओं के पास जाने का तरीका बदल ही दिया। एक समय वह भी था जब प्रत्याशी मतदाता के पास खेत की मेड़ पर ही पहुंच जाते थे। उनके साथ कलेवा करते थे, तब मतदाताओं को भी अपनापन दिखता था। मुद्दों के साथ मन की बात भी होती थी। उस समय के चुनाव प्रचार को जानकर आज लोग हैरान रह जाते हैं। तब न तो प्रचार के इतने साधन थे और न ही जातिवाद व क्षेत्रवाद जैसे मुद्दे होते थे। आम आदमी की तरह ही नेता भी मतदाताओं के बीच पहुंचते थे और अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के लिए वोट मांगते थे।

सिकंदराराऊ के मोहल्ला गढ़ी बुंदू खां निवासी चिरंजीलाल उम्र का शतक लगा चुके हैं। पेशे से शिक्षक रह चुके 102 साल की उम्र में भी उनके जेहन में पुरानी बातें जिंदा हैं। जब उनसे चुनाव प्रचार पर बात की तो डबडबाई आंखों से अपने अनुभव बताए। कहा कि उस दौर में कांग्रेस व भारतीय क्रांति दल के बीच टक्कर चल रही थी। लोग बैलगाड़ी, ऊंटगाड़ी, साइकिल व पैदल ही वोट डालने एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। पहले मतदान स्थल दूर बनता था। महिलाएं गीत गाते हुए पैदल टुकड़ी के रूप में वोट डालने जाया करती थीं। बड़े-बड़े नेता सड़क के रास्ते से जीप से जनसभाओं को संबोधित करने आते थे।

प्रचार की समय-सीमा नहीं :

पहले केवल झंडा और बिल्ला से प्रचार होता था। प्रचार की कोई समय सीमा नहीं थी। क्षेत्र में ऐसे दो विधायक हुए जो किसानों के खेत में हल चलाते समय वोट मांगने पहुंचते थे, जिनमें सुरेश प्रताप गांधी व फरजंद अली बेग शामिल थे। दोनों ऐसे प्रत्याशी कि किसानों के खेत पर जो खाना घर से आता था वही खा लेते थे।

लालटेन से हुई थी सभा

चौधरी चरण सिंह अपने भाषण में विकासशील देश अमेरिका से तुलना करते हुए यहां के किसानों की बात रखी थी। उनका कहना था कि यहां के किसान को घड़ी हाथ में बांधनी चाहिए। जैसा कि अमेरिका का किसान बांधता है। यहां के किसान को हर वह सुविधा होनी चाहिए जो अमेरिका के किसान के पास है। भारतीय क्रांति दल का चुनाव चिह्न हलधर किसान था तो कई किसान हल को अपने कंधे पर रखकर क्रीड़ा स्थल की जनसभा में आए थे। तब बिजली नहीं आती थी तो हंडा व लालटेन जलाकर जनसभा हुई थी। एक नारे, एक झंडी व झंडा

से चुनाव जीत गए थे फरजंद

उन्हें याद है फरजंद अली बेग केवल एक नारे के साथ विधायक हो गए थे। 'झंडी न झंडा, जीत गया फरजंदा' नारा गूंजा था। फरजंद अली ऐसे विधायक थे जो अपनी जेब में लेटर पैड, इंक स्टांप पैड व मुहर रखते थे। जो कोई भी आया वह उससे कह देते थे कि इस लैटर पैड पर लिख लें और मोहर लगा लें। कार्यकर्ताओं को लोग पिलाते थे दूध

चिरंजीलाल ने बताया कि 1952 में नेकराम शर्मा कांग्रेस से यहां विधायक हुए थे। तब चुनाव प्रचार में घोड़ी व घोड़ो पर सवार होकर चुनाव प्रचार हुआ था। चाय की चुस्की भी नहीं थी। दूध इतना था कि साथ में आने वाले लोगों को किसान पेट भरकर दूध पिलाते थे। वह कहते हैं कि अब चुनाव प्रचार हाईटेक हो गया है। अब नेता हेलीकाप्टर, महंगी-महंगी गाड़ियों से चुनाव प्रचार करने आते हैं और इतने बढि़या लाउड स्पीकर लगाए जाते है कि पूरे नगर में उनकी आवाज जाए। पहले टोली बनाकर लोग चुनाव प्रचार करते थे।

Edited By Jagran

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