जनधन योजना से ताल के लोग बेहाल

जिले के थाने में एक माह से ठंड का असर कुछ ज्यादा दिख रहा है।शाम होते ही जैसे ही ओस की बूंद थाने में पहुंचती है पूरे परिसर की बत्ती बुझ जाती है।दिन भर खामोश रहने वाला भौरा मंडराने लगता है।

Navneet Prakash TripathiPublish: Fri, 28 Jan 2022 02:34 PM (IST)Updated: Fri, 28 Jan 2022 05:28 PM (IST)
जनधन योजना से ताल के लोग बेहाल

गोरखपुर, सतीश कुमार पांडेय। गुटखा वाले इंस्पेक्टर को लंबे समय बाद थाने का प्रभार मिला है। दो माह तक अधिकारियों व आमजन के सामने वह सौम्य, मृदुभाषी और आज्ञाकारी होने का दिखावा करते रहे।अच्छा समझकर साहब ने जैसे ही भरोसा जताया।थाने में जनधन योजना शुरू कर दी।जो आमजन को भारी पड़ रही है।योजना कुछ इस तरह की है। धन वाले मामले को इंस्पेक्टर खुद देखते हैं। प्रेषक की इच्छानुसार कार्य करने के लिए उन्होंने कुछ शर्त बनाई है।जिसे पूरा करने के बाद इंस्पेक्टर की कोर टीम मामले का निस्तारण कराती है।जन वाले मामले वरिष्ठ उप निरीक्षक व हल्का दारोगा को भेज दिया जाता है।शिकायत का निस्तारण कराने के लिए पीडि़त को तब तक दौड़ना पड़ता है जब तक कोई अधिकारी थाने पर फोन न करे।गुटखा वाले इंस्पेक्टर की जनधन योजना से ताल के लोग बेहाल हैं लेकिन कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं।शिकायत करे तो किससे।जिम्मेदार अधिकारी चुनाव प्रकिया में फंसे हैं आमजन इंस्पेक्टर की स्कीम में।

गुंडो को देख छुप गए थानेदार

तराई से स्थानांतरित होकर जिले में आए इंस्पेक्टर सबको अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते हैं। थाने में साथ बैठने-उठने वाले और मातहतों को बताते रहते हैं कि 28 साल की सेवा में कितने इनामी, माफिया, लुटेरे व डकैत को कैसे और कहां पकड़ा।यह बात अधिकारियों तक पहुंची तो बहादुर समझकर शहर के उत्तरी क्षेत्र में स्थित थाने की कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी सौंप दी।जिसे पूरी करने में इंस्पेक्टर पूरी तरह से फेल है।बदमाश उनके इलाके में जब चाहते हैं वारदात करके निकल जाते हैं।पिछले दिनों थानेदार व उनकी पूरी टीम का सामना पशु तस्करों से हो गया।पहले तो उन्होंने कोशिश की तस्करों से सामना न हो।अधिकारियों के निर्देश पर बाहर निकले।थानाक्षेत्र में एक जगह तस्करों से सामना हुआ तो थानेदार की सारी बहादुरी धरी की धरी रह गई।जान बचाने के लिए मातहतों के साथ छुप गए।बाहर तभी निकले जब तस्कर शहर से बाहर निकल गए। अब बहादुर थानेदार पर लोग हंस रहे हैं।

प्यार की लड़ाई में छिना प्रभार

बहुत सिफारिश के बाद दारोगा को चौकी का प्रभार मिला।देर रात तक वह चौकी पर बने रहते।चौकी पर तैनात सिपाही के साथ ही थानेदार तारीफ करते थे कि घर नहीं जाते।चौकी पर बैठे रहते हैं भले की मोबाइल में व्यस्त रहते हैं।चौकी में प्रभारी के मौजूद रहने से पुलिस का इकबाल बना रहता है।एक माह पहले उत्तरी क्षेत्र के थाने में दो युवती भिड़ गईं।कहासुनी के बाद बात हाथापाई तक पहुंच गई।मामला कंट्रोल से बाहर होने पर स्थानीय लोगाें ने कंट्रोल रूम में फोन किया।पुलिसकर्मी दोनों को थाने ले गए।विवाद की वजह पूछने पर पता कि वह दारोगा जी के लिए लड़ रही हैं।दोनों का दावा था कि दारोगा की उससे शादी होने वाली है।छानबीन करने पर पता चला कि दारोगा की दोनों से बातचीत होती है।अगले दिन यह मामला अधिकारियों के पास पहुंचा।जिसके बाद दारोगा लाइन हाजिर हो गए।कुछ ही दिनों में यह बात पूरे महकमे में फैल गई।कई लोगों ने दारोगा को फोन करके रातो-रात चौकी से हटने का कारण पूछा तो तरह-तरह की कहानी बताने लगे।

ओस की बूंद बुझा देती है थाने की बत्ती

जिले के थाने में एक माह से ठंड का असर कुछ ज्यादा दिख रहा है।शाम होते ही जैसे ही ओस की बूंद थाने में पहुंचती है पूरे परिसर की बत्ती बुझ जाती है।दिन भर खामोश रहने वाला भौरा मंडराने लगता है।थाने के बदले इस मौसम को लेकर वहां तैनात पुलिसकर्मी भौचक व बहुत परेशान है। ओस की बूंद के आते ही बत्ती बुझने का राज क्या है इसको लेकर तरह-तरह की चर्चा हो रही है।जानने वाले बताते हैं कि थाना प्रभारी एक जिले में तैनात थे।जहां पर तंत्रमंत्र के जरिए बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज होता है।संयोग से थाना प्रभारी की तैनाती उसी क्षेत्र में हो गई।जहां आते-जाते वह ओस की बूंद वाले तंत्रमंत्र में फंस गए।जिसके बाद जहां भी तैनात होते वहां शाम होते ही ओस की बूंद परिसर को अपनी आगोश में ले लेती है और थाने की बत्ती बुझ जाती है।अगर किसी ने बत्ती जलाने का प्रयास किया तो उसका अनिष्ट होना तय है।

Edited By Navneet Prakash Tripathi

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