सियासी क्षितिज पर खूब चमका सेन परिवार का सूर्य

साढ़े चार दशक तक चला बाबूजी का जादू अब सियासत में उनके पुत्र आनंदसेन कर रहे नुमाइंदगी

JagranPublish: Sun, 23 Jan 2022 11:18 PM (IST)Updated: Sun, 23 Jan 2022 11:18 PM (IST)
सियासी क्षितिज पर खूब चमका सेन परिवार का सूर्य

अयोध्या (प्रवीण तिवारी): जब लोग लोकतंत्र का उत्सव मनाने को तत्पर हों तो सियासी क्षत्रप रहे दिवंगत मित्रसेन यादव की बात न हो, ऐसा हरगिज नहीं हो सकता। उन्होंने जिस तरह जिले की राजनीति में पांव जमाए तथा एक- एक पायदान चढ़ते हुए तकरीबन साढ़े चार दशक तक जनता के दिलों पर राज किया, वह अपने आप में मिसाल है। सूबे में सत्ता किसी की भी रही हो, लेकिन सत्ता के गलियारे में बाबूजी जरूर होते थे। सत्तर के दशक से लेकर आज तक शायद ही कोई चुनाव रहा हो जब सेन परिवार की नुमाइंदगी न रही हो। समाज के वंचित वर्ग के लिए संघर्ष की सियासत के वह पर्याय थे। बाबूजी अलग-अलग दल के टिकट पर पांच बार विधायक व तीन बार सांसद निर्वाचित हुए। मित्रसेन यादव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से सियासी पारी की शुरुआत करते हुए जीवन के अंतिम दिनों तक विधायक रहे। उनके पुत्र पूर्व मंत्री आनंदसेन यादव अब उनकी सियासी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। मित्रसेन यादव की दो पुत्र वधू प्रियंका व इंदुसेन जिला पंचायत सदस्य रहीं। पौत्र अंकुरसेन भी ब्लाक प्रमुख हैं। मित्रसेन यादव की वजह से ही उनका पैतृक गांव भिटारी हमेशा सुर्खियों में रहता था।

1934 में जन्मे मित्रसेन यादव ने 1966 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता लेकर राजनीतिक पारी शुरू की और पहली बार इस दल के टिकट से 1974 में मिल्कीपुर से विधायक चुने गए। 1977, 1980 तथा 1985 में प्रतिद्वंद्वियों को हरा कर विधायक निर्वाचित हुए। जीवन के अंतिम कुछ वर्ष पूर्व भी उन्होंने मिल्कीपुर से सटी बीकापुर विधानसभा सीट पर बसपा प्रत्याशी को हराया था। इसके पहले 1989 में फैजाबाद संसदीय क्षेत्र से कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत दर्ज कर पहली बार सांसद निर्वाचित हुए। 1998 में समाजवादी पार्टी के तथा 2004 में बसपा के टिकट पर वे दिल्ली पहुंचे। उनके पुत्र आनंदसेन यादव भी दो बार विधायक निर्वाचित हो चुके हैं। उनके शिष्य के रूप में विख्यात रहे विधायक रामचंद्र यादव को भी मित्रसेन ने ही उपचुनाव का टिकट मिल्कीपुर से दिलाया और जीत भी दिलाई।

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राजनीतिक पारियों के बेस्ट फिनिशर थे मित्रसेन

मित्रसेन यादव को नजदीकी राजनीतिक मुकाबलों में जीत हासिल करना आता था। जब चुनावी संघर्ष नजदीकी होता तो नतीजे उनके पक्ष में दिखते थे। इस तरह के मुकाबले में ही वह पहली बार 1989 में उन्होंने निर्मल खत्री को हरा कर तो दूसरी बार विनय कटियार को हरा कर संसद पहुंचे। इस दौरान खत्री को पांच हजार 855 मत से हार झेलनी पड़ी। इसके बाद लगातार दो बार जीत दर्ज करने वाले भाजपा के फायर ब्रांड नेता विनय कटियार को 1998 में मित्रसेन ने सात हजार सात सौ 35 वोट से हराया था।

Edited By Jagran

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