दशकों बाद भी नहीं कम हुआ उत्‍साह, लोकतंत्र के पहले महायज्ञ से अब तक दे रहे मतदान की आहुति

लोकतंत्र के पहले महायज्ञ में मतदान करने वाले वृद्ध जनों का उत्साह अब भी बरकरार है। वे उतने ही उत्साह से अब भी वोट डालने जाते हैं जितने उत्साह से पहले मतदान करते थे। वरिष्ठ होने का इतना फायदा जरूर मिला प्राथमिकता के आधार पर मतदान करने का मौका मिला।

Ravi MishraPublish: Wed, 26 Jan 2022 01:04 PM (IST)Updated: Wed, 26 Jan 2022 01:04 PM (IST)
दशकों बाद भी नहीं कम हुआ उत्‍साह, लोकतंत्र के पहले महायज्ञ से अब तक दे रहे मतदान की आहुति

बरेली, जेएनएन। देश में संविधान लागू होने के बावजूद असल लोकतंत्र तब आया था, जब देश के लोगों ने अपनी सरकार का चयन अपने मतों से किया। मतदान के पहले महायज्ञ में वोट की आहुति देने वालों का उत्साह सातवें आसमान पर था। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के बाद अब खुद सरकार चुनने में भागीदारी करने का मौका जो मिला था। लोकतंत्र के पहले महायज्ञ में मतदान करने वाले वृद्ध जनों का उत्साह अब भी बरकरार है। वे उतने ही उत्साह से अब भी वोट डालने जाते हैं, जितने उत्साह से पहले मतदान करते थे। वरिष्ठ होने का इतना फायदा जरूर मिला कि प्राथमिकता के आधार पर मतदान करने का मौका मिला। आज की रिपोर्ट में ऐसे ही मतदाताओं से रूबरू कराते हैं, जो 50 साल से ज्यादा समय से मतदान कर रहे हैं।

1952 में वोट तो डाला था, प्रत्याशी याद नहीं: वर्ष 1952 में वोट डाला था। अब अगर याद करते हैं तो प्रत्याशी भी याद नहीं है, लेकिन इतना याद है कि कांग्रेस को वोट दिया था। पहले बहुत दूर वोट डालने जाते थे। पहले मेरा वोट मीरगंज तहसील के गांव दियुरिया अब्दुल्लागंज में था। वहां पर करीब पांच किलोमीटर दूर बैलगाड़ी और पैदल वोट डालने जाते थे। एकदूसरे के कहने मात्र और प्रत्याशी के नाम पर ही वोट डालने जाते थे। अब नजर थोड़ी कमजोर हो गई, लेकिन ईवीएम से मतदान में आसानी होती है। - हाजी महबूब खां, रजा कालोनी, रामपुर रोड

हमारी सरकारी बनने की खुशी में डाला था पहला वोट: देश आजाद होने की सभी ने खुशी मनाई थी। इसके बाद जब वोट डालने का नंबर आया तो और ज्यादा खुशी थी। इससे पहले अंग्रेजों का शासन था और वे मनमर्जी करते थे। हम लोगों को बताया गया था कि अब हमारी सरकार बनेगी। इसी वजह से सभी ने खुशी-खुशी वोट डाला था। पहला वोट कांग्रेस को ही दिया था। अब तो नजर भी कम पड़ती है और ऊंचा सुनने लगा हूं, लेकिन चुनाव में वोट डालने को लेकर उत्साह अब भी बरकरार है।- हाजी रफीक खां, बाकरगंज बरेली

दो बैलों की जोड़ी था पहला चुनाव निशान: सुभाष चंद्र बोस, डा. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू सभी को मैंने देखा है। इनके भाषण भी सुने हैं। वर्ष 1952 में जब चुनाव हुआ था तब कांग्रेस का चुनाव निशान दो बैलों की जोड़ी था। उसी पर वोट दिया था। अब कौन प्रत्याशी उस समय था, इतना याद नहीं है। वोट डालने में कभी लापरवाही नहीं की। हमेशा खुद वोट डालने के साथ ही और को भी मतदान के लिए प्रेरित करता था। इन दिनों बीमार चल रहा हूं, लेकिन मतदान जरूर करूंगा।- नत्थूलाल, पीपलसाना चौधरी, भोजीपुरा

फरीदपुर स्थित मायके में डाला था पहला वोट: 1952 में वोट डाला था या नहीं, इतना स्पष्ट याद नहीं है। लेकिन पहले वोट डालने को लेकर उत्साह खूब रहता था। घर वालों के साथ वोट डालने के लिए जाते थे। पहले अपने फरीदपुर स्थित मायके में वोट डालने के लिए जाते थे। अब पीर बहोड़ा में मतदान करने के लिए जाती हूं। वोट डालने को लेकर अब भी कोई लापरवाही नहीं करती हूं। मुझे याद नहीं है कि कभी वोट डालने का मौका हो और मैं वोट ना डालूं।- बशीरन, नार्थ सिटी बरेली

Edited By Ravi Mishra

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