सुभाषचंद्र बोस जन्मतिथि: प्रयागराज से था नेता जी का गहरा नाता, जानिए 1939 में आखिरी बार किससे मिलने आए यहां

प्रयागराज शहर से उनका गहरा नाता था। कई बार वह यहां आए। उनकी यादें आज भी शहर संजोए हुए है। नेता जी 1939 में आखिरी बार अपने मित्र क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय से मिलने आए थे। क्षेत्रेश उस समय दारागंज इलाके में रहते थे।

Ankur TripathiPublish: Sun, 23 Jan 2022 08:01 AM (IST)Updated: Sun, 23 Jan 2022 08:19 AM (IST)
सुभाषचंद्र बोस जन्मतिथि: प्रयागराज से था नेता जी का गहरा नाता, जानिए 1939 में आखिरी बार किससे मिलने आए यहां

अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज। आज नेता जी सुभाष चंद्र बोस की जन्म तिथि है। प्रयागराज शहर से उनका गहरा नाता था। कई बार वह यहां आए। उनकी यादें आज भी शहर संजोए हुए है। नेता जी 1939 में आखिरी बार अपने मित्र क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय से मिलने आए थे। क्षेत्रेश उस समय दारागंज इलाके में रहते थे। नेताजी को दरवाजे पर देख क्षेत्रेश ने उन्हें गले लगा लिया और अंदर ले गए।

खाने पर बोले-यही तो था मेरा आज का खाना

अपने कमरे में हाल-चाल लेने के बाद क्षेत्रेश ने कहा कि सुभाष आज भोजन यहीं करके जाना। नेताजी ने जवाब दिया कि ''खाना तो खा लूंगा पर आप मुझे पहले सांग आफ संन्यासी सुना दो।' क्षेत्रेश ने 'गाओ ऊंचे स्वर वही, निर्भीक सन्यासी' का ऊंचे स्वर में अपने अंदाज में पाठ किया तो नेताजी गदगद हो गए। उन्होंने कहा कि जितना मुझे यह गीत पसंद है, उतना ही आपकी आवाज में इसे सुनकर मैं रोमांचित और आत्मशक्ति से समृद्ध हो जाता हूं। नेता जी शहर में युवाओं की एक टोली को संबोधित करने के जाने लगे तो उन्हें रोकते हुए क्षेत्रेश ने कहा कि अरे सुभाष खाना तो खाकर जाओ। नेता जी ने जवाब दिया आज का मेरा खाना यही है।

जब भी मिलते मित्र से तो कहते वही गीत सुनाओ मुझे

सरस्वती पत्रिका के उप संपादक अनुपम परिहार बताते हैं कि प्रो. क्षेत्रेश और सुभाष चंद्र बोस के सहपाठी थे। उन दोनों ने 1913 प्रेसीडेंसी स्कूल से मैट्रिक, 1919 में कोलकाता विश्वविद्यालय से बीए की परीक्षा पास की। नेताजी जब लंदन गए तो क्षेत्रेश प्रयागराज आ गए और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में उन्हें नौकरी मिल गई। 1939 में नेताजी यहां आए तो क्षेत्रेश से मिलने उनके दारागंज स्थित आवास गए। नेताजी और प्रो. क्षेत्रेश के बीच कई पत्राचार हुए, जो आज भी मौजूद हैं और उन पत्रों से दोनों की प्रगाढ़ता का पता चलता है। नेताजी को स्वामी विवेकानंद द्वारा रचित संन्यासी गीत बहुत अधिक पसंद था। प्रो.क्षेत्रेश से जब भी मिलते वह संन्यासी गीत को सुनाने का आग्रह करते थे। वह अक्सर इस गीत की लाइनों का इस्तेमाल अपने भाषण में कर युवाओं में जोश भर देते थे।

Edited By Ankur Tripathi

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