प्रयागराज में संगम तीरे कल्‍पवास में जप एवं संकीर्तन में एक माह डूबेंगे श्रद्धालु, जानें कल्‍पवास का महत्‍व

कल्पवास बहुत ही मुश्किल साधना है। इसमें तमाम तरह के नियंत्रण की जरूरत होती है। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु परनन्दिा त्याग साधु सन्यासियों की सेवा जप एवं संकीर्तन एक समय भोजन भूमि शयन अग्नि सेवन आदि का कड़ाई से पालन करते हैं।

Brijesh SrivastavaPublish: Sat, 15 Jan 2022 08:31 AM (IST)Updated: Sat, 15 Jan 2022 08:31 AM (IST)
प्रयागराज में संगम तीरे कल्‍पवास में जप एवं संकीर्तन में एक माह डूबेंगे श्रद्धालु, जानें कल्‍पवास का महत्‍व

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। प्रयागराज माघ मेला यानी तंबुओं की नगरी। संगम किनारे रेती पर तंबुओं की नगरी सज चुकी है। इसी के साथ एक माह के आस्था के महापर्व की शुरूआत भी हो चुकी है। जप-तप, नियम-संयम के साथ प्रभु की भक्ति में डूब जाने को कल्पवासियों ने भी डेरा डालना शुरू कर दिया है। इनमें कोई सांसारिक माया से दूर भगवान की भक्ती में लीन होने का संकल्प लेकर, तो कोई गुरु के संकल्प को पूरा करने के लिए संगम किनारे पहुंच रहा है।

आत्‍म नियंत्रण की साधना है कल्‍पवास

कल्पवास बहुत ही मुश्किल साधना है। इसमें तमाम तरह के नियंत्रण की जरूरत होती है। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु परनिंदा त्याग, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन आदि का कड़ाई से पालन करते हैं। कल्पवास में ब्रह्मचर्य, व्रत एवं उपवास, देव पूजन, सत्संग व दान का बहुत ही महत्व है। श्रद्धालु नियमपूर्वक तीन समय गंगा स्नान, भजन-कीर्तन, प्रभु चर्चा और प्रभु लीला का दर्शन आदि में लीन रहते हैं। पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु कल्पवास करते हैं।

जानें, क्‍या कहते हैं कल्‍पवासी

प्रतापगढ़ के अमित सिंह कहते हैं कि हम पिछले आठ वर्षों से कल्पवास के लिए आते रहे हैं। हमें और हमारे परिवार को गुरु ज्ञान यहीं मिला। यहां कल्पवास के दौरान सिर्फ गुरू और भगवान की ही चर्चा होती है, जो मन को शांति देती है और अध्‍यात्‍म का बोध कराती है। प्रतापगढ़ के रानीगंज निवासी मनोज सिंह ने कहा कि हमारे गुरु का संकल्प था, जिसको पूरा करने के लिए हम और हमारा परिवार पिछले 10 सालों से कल्पवास को आ रहे हैं। कोरोना के कारण कुछ दिक्कतें लग रहीं थी, लेकिन गुरु की महिमा के आगे सब फीका है।

इनका भी जानें कल्‍पवास का अनुभव

प्रतापगढ़ की सुमन देवी बोलीं कि मेरे पति ने संकल्प लिया था, जिसको पूरा करने के लिए वे सात वर्षों से कल्पवास के लिए संगम किनारे आ रही हैं। भजन-किर्तन में दिन कैसे गुजर जाता है पता ही नहीं चलता है। यह आस्था ही है कि जहां लोग घरों ने निकलने को कतरा रहे हैं वहां इतने बड़े मेले का आयोजन हो रहा है।

Edited By Brijesh Srivastava

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