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स्मार्टफोन में क्या है DRE टेक्नोलॉजी और कैसे करता है यह काम

यह एक ऐसी तकनीक है जो फोन के इंटरनल स्टोरेज को वर्चुअल रैम में बदल देती है। वर्चुअल रैम वास्तव में फोन के इंटरनल स्टोरेज को अस्थायी रैम के रूप में उपयोग करती है। इसका मुख्य काम मेमोरी मैनेजमेंट को बेहतर बनाना है।

Saurabh VermaFri, 03 Dec 2021 07:27 AM (IST)
स्मार्टफोन में क्या है DRE टेक्नोलॉजी और कैसे करता है यह काम

नई दिल्ली, ब्रांड डेस्क। आज स्मार्टफोन हर तरह की सुविधा दे रहा है, इसलिए यूजर्स इस पर ज्यादा समय भी बिता रहे हैं। आपको पेमेंट करना हो या फिर फिर अपना मनोरंजन, शॉपिंग करना हो या फिर कुछ प्रोडक्टिव काम, आपके फोन में वो सभी ऐप्स हैं, जो ये सभी काम करते हैं और आपके जीवन को आसान बनाते हैं। लेकिन कई बार ये फोन में जगह भी घेरते हैं, और सीमित मेमोरी की वजह से मल्टीटास्किंग में दिक्कत आती है। इससे रैम की कमी महसूस होती है। हालांकि, आधुनिक टेक्नोलॉजी ने इसका भी उपाय खोज लिया है। इसका नाम है Dynamic RAM Expansion यानी DRE टेक्नोलॉजी।

क्या है DRE टेक्नोलॉजी

पिछले कुछ महीनों से आप भी DRE टेक्नोलॉजी के बारे में जरूर सुन रहे होंगे। इसे हम वर्चुअल रैम एक्सपेंशन के नाम से भी जानते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है, जो फोन के इंटरनल स्टोरेज को वर्चुअल रैम में बदल देती है। वर्चुअल रैम वास्तव में फोन के इंटरनल स्टोरेज को अस्थायी रैम के रूप में उपयोग करती है। इसका मुख्य काम मेमोरी मैनेजमेंट को बेहतर बनाना है। यह फिजिकल रैम की तुलना में मेमोरी में अधिक ऐप्स रखने में मदद करती है। आज realme के कई फोन में आप इस बेहतरीन टेक्नोलॉजी को एक्सपीरियंस कर सकते हैं। इसमें realme 8 5G, realme Narzo 30 5G, realme X7 Max 5G, realme GT Master Edition, realme GT, realme 8s 5G, realme 8i और realme GT Neo 2 शामिल हैं।

DRE टेक्नोलॉजी की क्यों है जरूरत

जिस तरह से गेम्स वाले ऐप्स और दूसरे ऐप्स की साइज बढ़ रही है, वहां पर DRE टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे जरूरत बनती जा रही है। हमारे फोन में रैम कई सारे काम करती है। यह डेटा को स्टोर करती है, मल्टीटास्किंग में मदद करती है और फोन की स्पीड को भी बढ़ाती है। लेकिन हमारे पास जो एंड्रॉयड फोन है, उसमें सीमित रैम होता है। ऐसे में फोन में मल्टीटास्किंग की जरूरतों को देखते हुए आज फिजिकल रैम काफी नहीं है। स्मार्टफोन की क्षमताओं का विस्तार करने और बेहतर मल्टीटास्किंग के लिए, वर्चुअल रैम या DRE कुछ स्टोरेज को रैम के रूप में इस्तेमाल करके रैम को बढ़ाने में मदद करती है, ताकि ज्यादा एक्टिव ऐप्स को स्टोर किया जा सके।

DRE टेक्नोलॉजी कैसे करता है काम

हर बार जब आप किसी ऐप पर टैप करते हैं, तो MMU यानी मेमोरी मैनेजमेंट यूनिट को यह तय करना होता है कि ऐप रैम में कहां जाएगा। जब आप फिर से एक नया ऐप खोलते हैं, तो MMU रैम में नए ऐप के साथ-साथ पुराने ऐप के लिए जगह की योजना बनाती है। जब आप अलग-अलग ऐप खोलते हैं, तो वे रैम में इकट्ठा हो जाते हैं, लेकिन जब रैम में स्पेस नहीं होता है और आप एक नया ऐप खोलना चाहते हैं, तो सिस्टम स्पेस बनाने के लिए आपके द्वारा खोले गए सबसे पुराने ऐप को हटा देगा। इसका मतलब यह है कि अगली बार जब आप उस पुराने ऐप को खोलेंगे, तो यह शुरुआत से शुरू होगा न कि जहां आपने इसे छोड़ा था। अगर फोन में वर्चुअल रैम या DRE टेक्नोलॉजी है, तो रैम न होने की स्थिति में नया ऐप खोलते समय सिस्टम सबसे पुराने ऐप को हटाने के बजाय वर्चुअल मेमोरी में शिफ्ट कर देगा। वर्चुअल रैम को OTA अपडेट के जरिए बढ़ाया जा सकता है|

उदाहरण के साथ समझें

जब आप अपने स्मार्टफोन पर वर्चुअल मेमोरी फीचर का इस्तेमाल करते हैं, तो फोन आपके द्वारा वर्चुअल के रूप में चुनी गई मेमोरी की मात्रा ऐलोकेट करता है, लेकिन इंटरनल स्टोरेज में स्पेस ऐलोकेट करने के लिए, आपको फोन को रीस्टार्ट करना होगा। उदाहरण के लिए, realme 8s 5G का 6GB कॉन्फिगरेशन 5GB के एक्स्टेंशन का सपोर्ट करता है, कुल मिलाकर 11GB तक। अगर आप रैम बढ़ाते हैं, तो आपको सिस्टम द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली रैम की मात्रा में कोई बढ़ोतरी दिखाई नहीं देगी - जबकि स्टोरेज वर्चुअल रैम को ऐलोकेट किया गया है, आपकी फिजिकल रैम समान क्षमता की होगी। मिसाल के तौर पर, यदि आपके एंड्रॉयड स्मार्टफोन पर 10 ऐप्स खुले हैं और फोन की रैम में अधिक जगह नहीं है, तो एंड्रॉयड उन ऐप्स को बंद कर देता है, जो बैकग्राउंड में नहीं चल रहे हैं या बैकग्राउंड में कोई कार्य नहीं कर रहे हैं, या सिस्टम केवल उस ऐप को बंद कर देता है जिसकी प्राथमिकता सबसे कम है और जो दस ऐप्स में सबसे पुराना ऐप है।

आसान भाषा में समझे तो वर्चुअल रैम उन सभी ऐप्स को मैनेज करता है, जिनके बैकग्राउंड में कोई डायनेमिक फंक्शन नहीं है और ऐसे ऐप्स को लंबे समय तक मेमोरी में रखेगा। एंड्रॉयड सिस्टम ध्यान रखेगा और प्राथमिकता देगा कि कौन से ऐप्स को वर्चुअल मेमोरी में स्टोर किया जाना चाहिए और कौन सा नहीं। वर्चुअल रैम का इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब फिजिकल रैम प्रोसेस को संभालने के लिए अपनी सीमा से बाहर हो रही हो। वर्चुअल मेमोरी फीचर का उपयोग करके, अधिक ऐप्स लंबे समय तक बैकग्राउंड में रह सकते हैं।

लेखक: शक्ति सिंह

Note:- यह आर्टिकल ब्रांड डेस्क द्वारा लिखा गया है।

Edited By: Saurabh Verma