भक्ति का मर्म, वास्तविक सुख पाने के लिए व्यक्ति साधना की ओर होता है प्रवृत्त

मन को वश में लाने का अभ्यास अनेक प्रकार का होता है। इन अभ्यासों को ही भक्ति यानी साधना कहा गया है। जिस व्यक्ति ने स्वयं को शांति-अशांति मान-अपमान और सुख-दुख से निर्लिप्त बना लिया है वही निर्विघ्न शांति में स्थित रह सकता है।

Sanjay PokhriyalPublish: Wed, 25 May 2022 04:29 PM (IST)Updated: Wed, 25 May 2022 04:29 PM (IST)
भक्ति का मर्म, वास्तविक सुख पाने के लिए व्यक्ति साधना की ओर होता है प्रवृत्त

ललित गर्ग। अधिकांश व्यक्ति आज भौतिक मूल्यों के उपासक बन गए हैं। इस कारण जीवन के धर्म एवं मर्म को भुला बैठे हैं। उनकी इस उपासना ने दुनिया के बाह्य जगत को बड़ा सुहावना, लुभावना और आकर्षक बना दिया है। जबकि वास्तविक सुख आंतरिक सौंदर्य, अंतर्जगत की जागृति एवं अंतर्यात्र से ही संभव है। भौतिक आकर्षण के पीछे मनुष्य दौड़ रहा है। यदि वह क्षण भर रुककर गंभीरता से सोचे तो उसे पता चलेगा कि यह सब भ्रम जाल है। जीवन वह नहीं, जिसे वह जी रहा है। संत एकनाथ ने कहा है कि धन जोड़कर भक्ति का दिखावा करने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि ऐसा करने से मन में वासना और भी बढ़ जाएगी और जिनका चित्त वासना में फंसा हुआ है, उन्हें अंतरात्मा के दर्शन कैसे हो सकते हैं।

वास्तविक सुख पाने के लिए व्यक्ति भक्ति यानी साधना की ओर प्रवृत्त होता है। स्थायी सुख की प्राप्ति भक्ति पर ही निर्भर है। भक्ति से मन को वश में करना है और मन को वश में करने का सरल उपाय है उसे परमात्मा के हेतु निरंतर भले कार्यो में लगाए रखना। महात्मा गांधी ने प्रेमा बहन के नाम लिखे पत्र में लिखा है-जो लोग कृष्ण-कृष्ण कहते हैं वे उसके पुजारी नहीं हैं। जो उनका काम करते हैं, वे ही पुजारी हैं। रोटी-रोटी कहने से पेट नहीं भरता, अपितु रोटी खाने से ही भरता है।

मन को वश में लाने का अभ्यास अनेक प्रकार का होता है। इन अभ्यासों को ही भक्ति यानी साधना कहा गया है। जिस व्यक्ति ने स्वयं को शांति-अशांति, मान-अपमान और सुख-दुख से निर्लिप्त बना लिया है, वही निर्विघ्न शांति में स्थित रह सकता है। जो व्यक्ति काम-क्रोध के वेगों को सह सकता है, वही वास्तव में सुखी है। वस्तुत: भक्ति ही वास्तविक सुख एवं आनंद का सही मार्ग है। उसमें भी निष्काम भक्ति ही सच्ची भक्ति है, जो परमात्मा और परमसुख से साक्षात्कार कराने में सक्षम है। हमें भक्ति के इसी मार्ग का अनुसरण कर उसकी शक्ति से जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

Edited By Sanjay Pokhriyal

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