जानिए पौराणिक कथा, गौतम ऋषि ने क्यों दिया था इंद्र को श्राप

एक बार की बात है। जब ऋषि गौतम किसी कार्य हेतु अपने आश्रम से बाहर गए। उस वक्त इंद्र ने माया के जरिए ऋषि गौतम का रूप धारण कर आश्रम में प्रवेश कर गए। अहिल्या राजा इंद्र को पहचान नहीं पाई और अपने पति समान इंद्र से बातचीत करने लगे।

Umanath SinghPublish: Tue, 18 Jan 2022 09:05 PM (IST)Updated: Wed, 26 Jan 2022 09:00 AM (IST)
जानिए पौराणिक कथा, गौतम ऋषि ने क्यों दिया था इंद्र को श्राप

सनातन धर्म में युगों को चार भागों में विभक्त किया गया है। ये युग क्रमशः सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग हैं। सतयुग की सत्य कथा आज भी प्रासंगिक हैं। भजन-कीर्तन समेत सतसंग में सतयुग की सत्य कथाओं की व्याख्या की जाती है। इनमें एक कथा गौतम ऋषि और स्वर्ग नरेश इंद्र की है। गौतम ऋषि ईश्वर के उपासक थे। उन्होंने कठिन भक्ति कर त्रिदेव को प्रसन्न कर दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था। देवता भी उन्हें पूज्य मानते थे। वहीं, गौतम ऋषि की अर्धांगनी बेहद खूबसूरत थी। उनकी खूबसूरती की चर्चा आकाश, पाताल और पृथ्वी लोक में थी। स्वंय स्वर्ग नरेश इंद्र भी गौतम ऋषि की धर्मपत्नी अहिल्या पर आकर्षित हो गए थे। इसके बाद इंद्र हमेशा गौतम ऋषि की धर्मपत्नी से मिलने की ताक में लगे रहते थे।

एक बार की बात है। जब ऋषि गौतम किसी कार्य हेतु अपने आश्रम से बाहर गए। उस वक्त इंद्र ने माया के जरिए ऋषि गौतम का रूप धारण कर आश्रम में प्रवेश कर गए। अहिल्या राजा इंद्र को पहचान नहीं पाई और अपने पति समान इंद्र से बातचीत करने लगे। तभी इंद्र ने छल के जरिए अहिल्या से प्रेम भाव प्रस्तुत किया। अहिल्या राजा इंद्र पर मोहित हो गई और प्रेम भाव में डूब गई। राजा इंद्र और अहिल्या प्रेम प्रसंग में थी।

तभी अचानक से गौतम ऋषि आश्रम आ पहुंचे। आश्रम में हूबहू गौतम ऋषि देखकर समझ गए। यह कोई मायावी है। उसी वक्त गौतम ऋषि ने क्रोध में मायावी इंद्र को नपुंसक होने का श्राप दे दिया। साथ ही धर्मपत्नी अहिल्या को पत्थर रूप में परिवर्तित कर दिया। गौतम ऋषि के श्राप से स्वर्ग के देवता चिंतित हो उठे। गौतम ऋषि की धर्मपत्नी अहिल्या ने क्षमा याचना की। तब गौतम ऋषि ने कहा-त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम आकर अपने चरणों से तुम्हें स्पर्श करेगा। तब जाकर तुम्हें मुक्ति मिलेगी। त्रेता युग में श्रीराम के चरणों के स्पर्श करने से अहिल्या को सजीव रूप प्राप्त हुआ।

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Edited By Umanath Singh

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