जेएनएन, चंडीगढ़। कोटकपूरा गोलीकांड के मामले पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि अपने लिखित बयान में कुंवर विजय ने यह निराधार व अजीब दावा किया कि प्रशासनिक तौर पर उनके कार्य की इस कोर्ट के दो जजों ने सराहना की है। आन रिकार्ड ऐसा कुछ नहीं है कि वे जज कौन थे और किस प्रशासनिक उद्देश्य के लिए उन्होंने कुंवर विजय से संपर्क किया था।
उन्होंने एक और षड्यंत्रकारी बयान भी लिखित में दिया कि कुछ ऐसा है जिसे वह इसलिए रिकार्ड में नहीं ला रहे, क्योंकि बेअदबी के मामले की पैरवी कर रहे दो वकीलों को इस कोर्ट के जजों के रूप में पदोन्नत किया गया है। अदालत को इस बयान की कोई प्रासंगिकता समझ नहीं आती। यह औचित्यहीन है, इसमें नाटकीयता है। अत: अदालत यह पाती है कि कुंवर विजय प्रताप ने अपने बनाए डिजाइन को सिद्ध करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया, ताकि उसका राजनीतिक लाभ ले सकें।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश को दी गलत जानकारी
कुंवर ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फरीदकोट को एक पत्र लिख कर कहा कि भविष्य में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने गोलीकांड और बेअदबी से जुड़ा कोई केस प्रस्तुत न किया जाए, क्योंकि उनके मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। हालांकि, इस पर कुंवर ने यह उल्लेख नहीं किया कि दोनों में क्या संबंध हैं। इसमें यह भी हैरानी वाली बात है कि जिन मामलों का कुंवर ने जिक्र किया, उनमें कई मामलों की वह जांच भी नहीं कर रहे थे।
प्रदर्शनकारियों के बयान दर्ज किए, पुलिसकर्मियों के नहीं
जस्टिस राजबीर सेहरावत ने कहा कि जांच में जनभावनाएं हावी नहीं होनी चाहिए, लेकिन रिपोर्ट इसी आधार पर तैयार की गई। प्रदर्शनकारियों के बयान दर्ज किए गए, लेकिन घायल पुलिसकॢमयों के बयान नहीं लिए गए।
कोटकपूरा गोलीकांड पर कुंवर की रिपोर्ट कल्पनाओं पर आधारित, जांच निष्पक्ष नहीं: हाई कोर्ट
बरगाड़ी बेअदबी मामले से जुड़े कोटकपूरा गोलीकांड की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) को रद कर जांच रिपोर्ट खारिज करने के बाद पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रिपोर्ट पर सख्त टिप्पणियां की हैं।हाई कोर्ट ने एसआइटी के वरिष्ठ सदस्य रहे कुंवर विजय प्रताप सिंह की जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पूरे मामले को देखने के बाद यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने जांच निष्पक्ष तरीके से की है। उनकी रिपोर्ट जल्दबाजी में तैयार की गई और कल्पनाओं पर आधारित प्रतीत होती है।
इस केस के तथ्य और सुबूतों को देखने के बाद यही लगता है कि यह पूरी जांच लापरवाह तरीके से की गई। केस के सुबूतों पर गौर करने के बजाय कल्पना का सहारा लेकर रिपोर्ट दायर कर दी गई। कुंवर ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान जांच का इस्तेमाल एक राजनीतिक दल के पक्ष में और दूसरी पार्टी के खिलाफ किया। उन्होंने राजनेताओं के खिलाफ आरोप तो लगाए, लेकिन चार्जशीट दायर नहीं की। कुंवर ने राजनीतिक हित साधने के लिए मीडिया में जाकर जानकारी दी। जांच में निष्पक्षता निहित है, लेकिन कुंवर की जांच द्वेष, तर्कहीनता और गैर बराबरी से ग्रस्त है।
गौरतलब है कि कोर्ट ने इससे पहले एसआइटी को रद करते हुए इसकी जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। इस पूरे मामले की जांच के लिए नई एसआइटी बनाने के आदेश दिए थे। साथ ही कहा था कि नई एसआइटी में कुंवर को शामिल न किया जाए। इसके बाद कुंवर ने पुलिस सेवा से स्वेच्छा से सेवामुक्ति ले ली थी। कोर्ट ने कहा कि नई एसआइटी पूरी तरह से राजनीतिक प्रभाव के बिना काम करेगी।
बादलों पर रिपोर्ट में आरोप लगाए, लेकिन चार्जशीट में शामिल नहीं किया
कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में बेहद रोचक बात यह है कि इसमें अभिनेता अक्षय कुमार की 'सिंह इज ब्लिंगÓ का जिक्र किया गया है। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख की माफी की बात को भी शामिल किया गया, ताकि वह पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल और डिप्टी सीएम सुखबीर बादल को इस षड्यंत्र में शामिल करने की अपनी कल्पना को पक्का कर सकें।
हाई कोर्ट ने कहा कि बड़ी हैरत की बात है कि इस षड्यंत्र में प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल पर आरोप लगाने के बावजूद दोनों एफआइआर की चार्जशीट में उनको नामजद नहीं किया गया। दोनों के नाम चार्जशीट में शामिल नहीं करने के पीछे यही कारण संभव हो सकता है कि उनके पास इन दोनों नेताओं के खिलाफ सुबूत नहीं होंगे। चुनाव के दौरान इसे मुद्दा बनाया गया और बयान दिए गए।
मुख्यमंत्री व डीजीपी की फोन काल से साजिश साबित नहीं होती
एसआइटी ने घटना के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल, डीजीपी सुमेध सैनी और अन्य पुलिस अधिकारियों के बीच हुई फोन काल्स के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए उनके साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए थे।
इन आरोपों पर हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह आरोप सुबूतों के आधार पर नाकाफी हैं, क्योंकि ऐसी घटना के समय मुख्यमंत्री और डीजीपी की अन्य संबंधित अथारिटी से फोन पर बात होती है। इससे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि किसी पर फायरिंग करने के आदेश दिए गए हों। कोर्ट ने पूछा- क्या ऐसे मौके पर मुख्यमंत्री का डीजीपी या अन्य पुलिस अधिकारियों से बात करना नहीं बनता था?
गवाहों को अपने अनुरूप डिजाइन किया
हाई कोर्ट सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कुंवर विजय प्रताप सिंह ने सुविधाजनक गवाहों को अपने अनुरूप डिजाइन किया। अदालत की राय है कि यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है, जहां न्याय को रोका नहीं जा सकता। इसके अलावा हाई कोर्ट ने कुंवर विजय प्रताप की जांच में कई खामियां गिनाते हुए नए सिरे से एसआइटी के गठन के आदेश दे दिए।
प्रदर्शनकारियों के बयान दर्ज किए, पुलिसकर्मियों के नहीं
जस्टिस राजबीर सेहरावत ने कहा कि जांच में जनभावनाएं हावी नहीं होनी चाहिए, लेकिन रिपोर्ट इसी आधार पर तैयार की गई। प्रदर्शनकारियों के बयान दर्ज किए गए, लेकिन घायल पुलिसकॢमयों के बयान नहीं लिए गए।
पंजाब सरकार के किसी अधिकारी को रिपोर्ट नहीं करेगी नई एसआइटी
बरगाड़ी बेअदबी मामले से जुड़े कोटकपूरा गोलीकांड की जांच पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस राजबीर सेहरावत ने 89 पेज के अपने आदेश में कहा है कि राज्य सरकार पंजाब के तीन वरिष्ठ आइपीएस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम का गठन करेगी, जिसमें कुंवर प्रताप सिंह शामिल नहीं होंगे। यह एसआइटी किसी भी राज्य के कार्यकारी या पुलिस प्राधिकरण को रिपोर्ट नहीं करेगी।
यह केवल संबंधित मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट करेगी। एसआइटी संयुक्त रूप से काम करेगी। एक बार गठित होने के बाद एसआइटी को सेवानिवृत्ति, संबंधित अधिकारी की अक्षमता या मृत्यु को छोड़कर किसी भी कारण से बदला नहीं जाएगा। जांच की अंतिम रिपोर्ट संयुक्त रूप से एक टीम के रूप में दर्ज की जाएगी, जिस पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर होंगे।
एसआइटी के सदस्य संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने से पहले जांच का कोई हिस्सा लीक नहीं करेंगे। वे मीडिया के साथ जांच के किसी भी पहलू को शेयर नहीं करेंगे। इन एफआइआर की जांच संभवत: एसआइटी के गठन की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर संपन्न होगी। हाई कोर्ट आशा व्यक्त करता है कि नई एसआइटी पूरी तरह से निष्पक्ष और निष्पक्ष तरीके से काम करेगी।
इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह ने सीनियर एडवोकेट आरएस चीमा के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि कुंवर विजय प्रताप सिंह इस पूरे मामले की जांच राजनीतिक संरक्षण में कर रहे हैं और उनका रवैया याचिकाकर्ता के प्रति भेदभावपूर्ण है। पहले जब याचिकाकर्ता ने इस मामले में दर्ज एफआइआर को रद किए जाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी तब भी कुंवर विजय प्रताप सिंह ने उन्हेें यह याचिका वापस लेने की धमकी दी थी। लिहाजा याचिकाकर्ता ने इस मामले की जांच कर रही एसआइटी से कुंवर विजय प्रताप सिंह का नाम हटाए जाने की मांग की थी।
इंस्पेक्टर गुरदीप सिंह के वकील आरएस चीमा ने आरोप लगाया कि हत्या और अन्य अपराधों के प्रयास के लिए सात अगस्त, 2018 को बाद में मामला दर्ज किया गया, जबकि घटना के दिन 14 अक्टूबर, 2015 को एक एफआइआर पहले ही दर्ज थी। लगभग तीन साल बाद के अंतराल के बाद नई एफआइआर दर्ज कर आरोप लगाए गए। जिस कारण यह जांच अवैध है और इसे रद करना आवश्यक है। 14 अक्टूबर, 2015 को जो मामला दर्ज किया गया, वह एक आरोपी अजीत सिंह के बयान पर आधारित था, जिसने पिछले साल अगस्त में बयान दर्ज कहा था कि उसने कभी भी किसी भी प्राधिकारी के समक्ष कोई शिकायत दर्ज नहीं की और उसे पुलिस अधिकारियों ने कभी तलब भी नहीं किया गया था।
याचिका में कहा, एफआइआर कानून के तय सिद्धांतों के खिलाफ
याचिका में कहा गया है कि कुंवर विजय प्रताप की ओर से दर्ज की गई नई एफआइआर कानून के तय सिद्धांतों के खिलाफ है। एसआइटी ने 2015 में दर्ज की गई एफआइआर को पूरी तरह से खारिज करते हुए 50 से अधिक पुलिसकॢमयों के घायल होने के तथ्य को अनदेखा किया गया था। इसके अलावा एक जांच रिपोर्ट पर कुंवर विजय प्रताप सिंह ने हस्ताक्षर उस समय किए जब वो एसआइटी सदस्य नहीं थे।
वकील बने कुंवर विजय प्रताप
भारतीय पुलिस सेवा से स्वेच्छा से सेवामुक्ति (वीआरएस) लेने वाले कुंवर विजय प्रताप सिंह अब वकील बन गए हैं। शुक्रवार को औपचारिक तौर पर उन्होंने बार काउंसिल चंडीगढ़ से अपने आप को सूचीबद्ध करवा लिया। माना जा रहा है कि अब बेअदबी मामलों में बतौर वकील ही सरकार की मदद करेंगे।
याद रहे कि कुंवर विजय प्रताप सिंह ने हाई कोर्ट की ओर से कोटकपूरा गोलीकांड की जांच के लिए गठित एसआइटी को रद करने के बाद वीआरएस ले ली थी। मुख्यमंत्री ने कुंवर विजय प्रताप सिंह की वीआरएस को मंजूर कर लिया है। वह लगातार इस मामले में एडवोकेट जनरल अतुल नंदा, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील एचएस फूलका पर बेअदबी मामले में सहयोग न देने के आरोप भी लगा रहे हैं।
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