मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभ को हासिल करने के लिए क्वाड को एक आर्थिक मंच साबित करना जरूरी

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि क्वाड का मतलब है-बिजनेस। उनके इस बात पर जोर देने की बड़ी वजह है। दरअसल रूस और चीन जैसे देश कहते रहे हैं कि क्वाड एक सैन्य गठजोड़ है जो कुछ देशों को टारगेट करने की मंशा से प्रेरित है।

Sanjay PokhriyalPublish: Wed, 25 May 2022 10:33 AM (IST)Updated: Wed, 25 May 2022 10:33 AM (IST)
मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभ को हासिल करने के लिए क्वाड को एक आर्थिक मंच साबित करना जरूरी

विवेक ओझा। जापान की राजधानी टोक्यो में क्वाड (क्वाडिलेटरल सिक्योरिटी डायलाग) शिखर बैठक ऐसे समय में हुई है जब दो देश रूस-यूक्रेन कुछ माह से लगातार लड़ रहे हैं, चीन ताइवान को स्वतंत्र संप्रभु देश न बनने देने के लिए युद्ध तक करने को आमादा है, तालिबान अफगानिस्तान को किसी भी तरह मानवाधिकार संरक्षण वाली सरकार नहीं दे पा रहा है, दक्षिण एशियाई देश आर्थिक चुनौतियों से घिरे हुए हैं, यूरोप एवं खासकर यूक्रेन का राजनीतिक साहस उनके आर्थिक क्षति का कारण बन रहा है और कोविड एवं जलवायु आपदाओं ने वैश्विक सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

क्वाड के सदस्य देशों में अमेरिका, भारत, जापान और आस्टेलिया शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टोक्यो में यूक्रेन पर रूस के हमले को स्पष्ट रूप से अनौचित्यपूर्ण माना है। उस पर क्वाड नेताओं से चर्चा भी की है। शोध-अनुसंधान, विकास और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने क्वाड फेलोशिप प्रोग्राम की शुरुआत की तारीफकी है, जिसके तहत क्वाड के देशों के 100 छात्रों को अमेरिका में अध्ययन के लिए फेलोशिप दी जाएगी। एक बड़े रिसर्च इकोलाजी की बात भी क्वाड नेताओं ने की है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत जैसे क्वाड देशों को भविष्य की क्षेत्रीय चुनौतियों का समाधान अपनी बौद्धिक क्षमता के साथ ही करना है। नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में कौशल भी प्राप्त करना है।

क्वाड में भारत के उभार की वजह : देखा जाए तो क्वाड देश भारत की बड़ी भूमिका को अपनाने में लगातार सहज हो रहे हैं। पिछले कुछ समय से अमेरिका भारत को आमंत्रित कर रहा था कि भारत उसके नेतृत्व वाले नए हंिदू प्रशांत आर्थिक फ्रेमवर्क (आइपीईएफ) में शामिल हो जाए। अब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने 13 सदस्य देशों वाले इस आइपीईएफ को लांच कर भी दिया है। वह ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (टीपीपी) को हटाकर इसे लाए हैं। इसमें भारत के अलावा अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम और रिपब्लिक आफ कोरिया शामिल हैं। इस नए संगठन का उद्देश्य इन राष्ट्रों और खासकर हिंद प्रशांत क्षेत्र का आर्थिक विकास और क्षेत्रीय चुनौतियों का सामूहिक स्तर पर सामना करना है।

भारत के लिए यह इसलिए भी खास है कि जब टीपीपी लांच किया जा रहा था तो चीन को भी उसका सदस्य बनाया जा रहा था। वहीं भारत को उसका सदस्य नहीं बनाया जा रहा था। अमेरिका ने उस समय कहा था कि भारत जैसे विकासशील देशों में बौद्धिक संपदा अधिकार संरक्षण का कोई ठोस कानूनी फ्रेमवर्क राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है। हालांकि धीरे-धीरे समय बीता, अमेरिका को भारत की ताकत का अंदाजा लगा। अमेरिका ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर भारत का मजबूत रुख देखा। गलवन में चीन को जवाब देने की मजबूत प्रवृत्ति देखी। विकसित अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक संगठनों को भारतीय हितों के लिए भारत की ‘न कहने’ की प्रवृत्ति देखी। सबसे प्रमुख कोविड काल में अमेरिका ने भारत की मेडिकल डिप्लोमेसी का लोहा माना। दुनिया के अन्य देशों ने भी भारत के मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रशंसा की।

दरअसल जब तक अमेरिका को यह लगता था कि भारत का नेतृत्व इस बात के लिए कमजोर है कि वह चीन, पाकिस्तान जैसे देशों को कठोर संदेश देकर कार्रवाई भी कर सकता है, तब तक उसने भारत की भूमिका को अभूतपूर्व नहीं माना। जैसा कि आज वह मान रहा है। अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया जैसे देशों को आज भरोसा हो चुका है कि भारत सागरीय सुरक्षा के लिए एक मजबूत ताकत के रूप में उभर रहा है। भारतीय नौसेना घातक युद्धपोतों, विध्वंसकों आदि की तैनाती में लगी हुई है। उदयगिरि और सूरत जैसे नए युद्धपोत इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

अमेरिका सहित क्वाड के सदस्यों ने इस बात को भी महसूस किया है कि भारत हंिदू प्रशांत के देशों के साथ एक शानदार आइलैंड कूटनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। क्वाड को इस बात का भरोसा है कि भारत जिस स्तर पर मारीशस, सेशेल्स सहित फिपिक देशों को अपने साथ जोड़ रहा है, उसके चलते ये देश चीन का प्लेइंग कार्ड नहीं बनेंगे और अपनी सागरीय संप्रभुता को चीन के सामने गिरवी नहीं रखेंगे। नवंबर 2014 में फिजी में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रशांत द्वीपीय देशों के संगठन फिपिक का गठन किया था। फोरम आफ इंडिया पैसिफिक आइलैंड्स कोआपरेशन में भारत के अलावा 14 प्रशांत द्वीपसमूह देश हैं। फिपिक देशों में फिजी, कुक द्वीपसमूह, मार्शल द्वीपसमूह, नौरू, नियू, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, समोआ, तुवालु, वानुआतु, किरिबाती, माइक्रोनेशिया, सोलोमन द्वीपसमूह और टोंगा शामिल हैं।

क्वाड का नया रूप : अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने साफ कर दिया है कि क्वाड केवल एक बीता हुआ उन्माद या सनक भर नहीं है, इसका मतलब है-बिजनेस। बाइडन के इस बात पर जोर देने के पीछे बड़ा कारण है। दरअसल दुनिया के कई ऐसे देश, जो चीन के मित्र हैं और कई ऐसे संगठन, जो भारत, अमेरिका, जापान मैत्री के विरोधी हैं, वे लगातार चीन के सुर में सुर मिलाकर कहते रहे हैं कि क्वाड एक सैन्य गठजोड़ है, जो कुछ देशों को टारगेट करने की मंशा से प्रेरित है। चीन और रूस इसे एशियन नाटो तक कह चुके हैं और क्वाड के खिलाफ माहौल बनाने की फिराक में रहते हैं। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लाभ को पाने के लिए क्वाड को एक आर्थिक मंच साबित करना जरूरी था। इसीलिए भी बाइडन ने क्वाड की दीर्घकालिक प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए आइपीईएफ को लांच किया है। हालांकि भारत जैसी उभरतीं बाजार अर्थव्यवस्थाओं को अपने व्यापारिक हितों को सुनिश्चित करने के लिहाज से क्वाड की वैधता के बिंदुओं को समय-समय देखते रहना होगा।

क्वाड बैठक में एक बड़ी सागरीय सुरक्षा पहल को भी आरंभ किया गया है। दरअसल क्वाड देशों ने मिलकर ‘इंडो पैसिफिक पार्टनरशिप फार मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस’ को लांच किया है जिससे ‘डार्क शिपिंग’ को हंिदू प्रशांत क्षेत्र में ट्रैक किया जा सके। चीन के समुद्री युद्धपोतों की संदिग्ध गतिविधियों के लिहाज से यह कदम जरूरी भी था। अब क्वाड सदस्य देश स्पेस बेस्ड सिविक अर्थ आब्जर्वेशन डाटा को भी स्वतंत्र, मुक्त और पूर्ण रूप से साझा करेंगे। इसी के साथ क्वाड साइबर सिक्योरिटी पार्टनरशिप को मजबूती देने की भी बात की गई है जिससे चारों देशों को साइबर हमलों से बचाया जा सके। साफ है इन बातों के साथ क्वाड के चरित्र, प्रकृति और पहचान को नई दिशा देने की कोशिश हो रही है।

[अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार]

Edited By Sanjay Pokhriyal

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept