उभरती वैश्विक चुनौतियों के बीच संबंधों को नई दिशा दे गया पीएम मोदी का यूरोप दौरा

उभरती वैश्विक चुनौतियों के बीच PM मोदी की यूरोप यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने में मूल्यवान मानी जा सकती है बल्कि इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने जो स्टैंड लिया वह सर्वथा उचित है।

Sanjay PokhriyalPublish: Mon, 09 May 2022 10:36 AM (IST)Updated: Tue, 10 May 2022 06:23 AM (IST)
उभरती वैश्विक चुनौतियों के बीच संबंधों को नई दिशा दे गया पीएम मोदी का यूरोप दौरा

डा. रहीस सिंह। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूरोप की यात्र ऐसे समय में संपन्न हुई जब विश्व व्यवस्था का संक्रांति काल है और दुनिया नई चुनौतियों का सामना कर रही है। कोविड-19 महामारी अभी खत्म नहीं हुई है। इसके प्रभाव अभी लंबे समय तक रहने हैं। लिहाजा अभी दुनिया को एकजुट होकर इसकी चुनौतियों को हराते हुए शांति, समृद्धि और सुरक्षा के लिए काम करने की आवश्यकता थी, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध ने इसे नेपथ्य की ओर धकेलकर नई तरह की चुनौतियों को आगे कर दिया है। यह युद्ध एक ऐसी विभाजक रेखा का निर्माण कर रहा है, जहां से फिर ‘नियो कोल्डवार’ (नव शीतयुद्ध) की शुरुआत हो सकती है, युद्ध के परिणाम चाहे जो रहें। गौर से देखें तो भारत ने न केवल इन परिस्थितियों को ठीक से समझा, बल्कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध पर तटस्थता की एक महीन रेखा पर बड़ी सावधानी से चला।

यह भारतीय विदेश नीति की खूबसूरती भी है और संभवत: दुनिया की जरूरत भी। प्रधानमंत्री मोदी को इस यात्र के दौरान जर्मनी की नव-वाणिज्यवादी नीतियों के साथ संगतता बैठाते हुए दोनों देशों के बीच स्थापित ‘संबंधों को रीबूट’ करना था, नार्डिक देशों के साथ ‘हरित रणनीतिक साङोदारी’ की प्रगति की समीक्षा करते हुए उसमें वैल्यू एडीशन के साङो उपाय खोजने थे तथा फ्रांस के साथ स्थापित ‘दुर्जेयता’ और ‘अनुकूलता’ आधारित रिश्तों को आगे की ओर ले जाने की रणनीति बनानी थी। यूक्रेन युद्ध को लेकर यूरोप के थोड़े से बदले हुए मिजाज के बीच आगे की राह बनाना सामान्य स्थितियों के मुकाबले कुछ भिन्न चुनौती वाला भी था।

निर्णायक शक्ति बनता भारत: दरअसल रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच दुनिया के बीच एक विभाजन रेखा खिंचती हुई दिखी, लेकिन वह विभाजक रेखा सीधी और सरल नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक, भू-सामरिक और भू-आर्थिक है। वह कमोबेश यह दर्शाने में सफल हुई है कि नाटो और रूस-चीन कमोबेश दो ध्रुव होने का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रैगन-बियर (ब्रिक अवधारणा में चीन-रूस की अर्थव्यवस्थाओं के संकेतक) और रेनमिनबी-रूबल केमिस्ट्री परिणामी दिशा में अग्रसर हो चुकी है। आने वाले समय में संभव है कि यह केमिस्ट्री डालर-यूरो बांडिंग पर भारी पड़ जाए। भारत इनके बीच एक निर्णायक शक्ति बनता हुआ दिख रहा है।

यही वजह है कि दोनों ही भारत की ओर देख रहे हैं। अमेरिका और यूरोप के देश चाहते हैं कि भारत इस युद्ध में तटस्थ न रहे, लेकिन भारत ‘भारत केंद्रित कूटनीति’ के साथ आगे बढ़ रहा है। इसलिए भारत प्रत्येक निर्णय देश के हितों को केंद्र में रखकर ले रहा है। भारत यह भी जानता है कि किसी भी एक खेमे की ओर झुकाव या शामिल होना युद्ध को और जटिल बना देगा, जिससे शांति की राह और कठिन हो जाएगी। वैसे यह बात तो अमेरिका और यूरोपीय देश भी जानते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य दूसरे हैं। कुछ विश्लेषक और राजनयिक भारतीय नीतियों की आलोचना कर सकते हैं या भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जैसा कि होता दिखाई भी दे रहा है। वे यह तर्क भी दे सकते हैं कि अब निरपेक्षता का युग विदा हो चुका है, इसलिए आपको कोई एक पक्ष चुनना होगा।

सिर्फ मोहरा है यूक्रेन : यह सच है कि निरपेक्षता का युग समाप्त हो चुका है, लेकिन आज भी वैश्विक भू-राजनीतिक फलक पर खिंची बहुत-सी आड़ी-तिरछी विभाजक रेखाओं को पाटने की आवश्यकता है। बजाय इसके कि किसी एक पक्ष में शामिल होकर उन्हें और गहरा या चौड़ा करने की। भारत यही कर भी रहा है। अमेरिका और यूरोप की समस्या यह है कि वे बहुत-सी वास्तविकताओं पर पर्दा डालते हुए यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश कर रहे हैं कि इस युद्ध के लिए सिर्फ और सिर्फ रूस जिम्मेदार है। इसलिए भारत को रूस की निंदा करनी चाहिए, लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से ही भारत ने रूसी कार्रवाइयों की निंदा से खुद को दूर रखा। यही नहीं भारत ने सस्ते रूसी तेल की खरीदारी भी बढ़ा दी।

यह यूरोप को अखर रहा है, क्योंकि यूरोप इस लिहाज से बिल्कुल उल्टी दिशा में है। वह अमेरिका के साथ मिलकर रूस के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय विरोध को मजबूत कर रहा है और ऊर्जा की खरीदारी में कटौती। इसी वजह से कुछ यूरोपीय देश दबे स्वर में भारत की आलोचना कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यूरोपीय देश वास्तव में उचित कदम उठा रहे हैं? यदि ऐसा होता तो युद्ध कब का समाप्त हो चुका होता। दरअसल वे सिर्फ रूस का विरोध कर रहे हैं। इसके पीछे सीधा और सरल-सा कारण यह है कि वे रूस को एक शक्ति के रूप में देखना या स्वीकारना नहीं चाहते। वैसे भी वे तो पिछली सदी के आखिरी दशक में ही ‘एंड आफ द हिस्ट्री’ (इतिहास का अंत) की थ्योरी तैयार कर रणनीतिक प्रचार-प्रसार कर चुके हैं।

ऐसे में रूस को एक शक्ति के रूप में दिखना या दिखने की कोशिश करना उन्हें स्वीकार नहीं हो सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि रूस-यूक्रेन के बीच लड़े जा रहे युद्ध का असल क्षेत्र कहीं और है। सही मायने में यह युद्ध पूर्वी यूरोप, दक्षिणी काकेशस और यूरेशिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रूस और नाटो शक्तियों के बीच लड़ा जाने वाला युद्ध है। इन क्षेत्रों पर वही दबदबा कायम करेगा, जो इस युद्ध में विजयी होगा, फिर वह चाहे रूस हो या नाटो देश। यूक्रेन तो सिर्फ मोहरा है या फिर यूं कहें कि इस नई भू-राजनीतिक लड़ाई के लिए यूक्रेन सिर्फ एक मैदान भर है। सही अर्थो में यूक्रेन केवल लूजर हो सकता है लाभार्थी नहीं।

भारत और जर्मनी के रिश्तों में नए विचारों का उभार : फिलहाल भारत अपने स्टैंड पर कायम रहा और इसी के साथ प्रधानमंत्री की यूरोपीय यात्र संपन्न हुई। एंजेला मर्केल युग में भारत-जर्मनी के रिश्ते स्वाभाविक एवं सामरिक साङोदारी तक पहुंच चुके थे। ओलाफ शुल्ज को उसी प्रतिबद्धता का परिचय देना है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नए जर्मन चांसलर की प्राथमिकताएं क्या रहने वाली हैं। मर्केल के काल में ही भारत और जर्मनी के रिश्तों में नए विचारों का उभार हुआ और इसमें अंतर-सरकारी सलाह व्यवस्था (आइजीसी) ने मुख्य भूमिका निभाई।

उल्लेखनीय है कि दोनों देशों के बीच यह सीधे संवाद के लिए स्थापित प्लेटफार्म है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी। हालांकि भारत और जर्मनी के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने की बहुत-सी संभावनाएं हैं, लेकिन अभी भी वे रिश्तों को नई ऊंचाई देने के एक मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं। हालांकि जर्मनी यह मानने में गुरेज नहीं कर रहा है कि कोई बड़ी समस्या भारत के बगैर हल नहीं हो सकती (भारत यात्र के दौरान जर्मनी विदेश मंत्रलय में जूनियर मंत्री तोबियास लिंडनर का बयान)। मंत्री ने रायसीना डायलाग के समय यह भी कहा था कि हम तकनीक, शिक्षा, सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर भारत के साथ सहयोग करना चाहते हैं। भारत एक बहुत अहम सहयोगी है। इस यात्र के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और कैबिनेट सदस्यों के साथ बैठक में जर्मन चांसलर ओलाफ शुल्ज ने आने वाले सालों में भारत के साथ सहयोग पर 10 अरब यूरो खर्च करने की घोषणा की। इस दौरान जर्मनी और भारत ने आपसी सहयोग के 14 करारों पर दस्तखत किए। इनमें टिकाऊ विकास और क्लीन एनर्जी पर खासा ध्यान दिया गया है। वास्तव में प्रधानमंत्री को यह दौरा भारत जर्मन रिश्तों को रीबूट करने के अवसर के तौर पर देखा जा सकता है।

अगले चरण में भारत-डेनमार्क संबंध : यात्रा के अगले चरण में प्रधानमंत्री डेनमार्क पहुंचे। उल्लेखनीय है कि भारत और डेनमार्क के बीच राजनयिक संबंधों की नींव वर्ष 1957 में रखी गई थी। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डेनमार्क का दौरा किया था। दोनों देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, एनर्जी और रिसर्च क्षेत्र में सहयोग के साथ सौहार्दपूर्ण और मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। सितंबर 2020 में भारत और डेनमार्क ने दूरगामी लक्ष्यों वाली ‘हरित रणनीतिक साङोदारी’ के रूप में एक नए युग की शुरुआत की थी। चूंकि यह समय जलवायु परिवर्तन एवं अन्य वैश्विक समस्याओं से संबंधित स्थायी समाधान तलाशने का है। इस दृष्टि से भारत-डेनमार्क (भारत-नार्डिक) संबंधों को निर्णायक माना जा सकता है। प्रधानमंत्री ने कोपेनहेगन से यह संदेश भी दिया है कि दोनों देश लोकतंत्र और कानून के शासन जैसे मूल्यों को तो साझा करते ही हैं, साथ में हम दोनों की पूरक ताकत भी हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और डेनिश प्रधानमंत्री के बीच जबरदस्त केमिस्ट्री देखने को मिली, जो भारत-डेनमार्क संबंधों को आगे ले जाने में सहायक सिद्ध होगी।

पेरिस के सामरिक समीकरण में नई दिल्ली का विशेष स्थान : जहां तक भारत-फ्रांस संबंधों का प्रश्न है तो यूरोपीय महाद्वीप में फ्रांस भारत का प्रमुख सामरिक साङोदार है। दोनों देशों के बीच सामरिक साङोदारी की शुरुआत 1998 से हुई थी। तब से लेकर अब तक निरंतरता के साथ इसमें कई आयाम जुड़ चुके हैं। भारत-फ्रांस के बीच स्थापित बहुआयामी संबंधों की विशेषता यह है कि जहां एक तरफ पेरिस के सामरिक समीकरण में नई दिल्ली का विशेष स्थान है वहीं दूसरी तरफ एक-दूसरे के साथ में दुर्लभ सामरिक सहजता की विशेषता की अनुभूति भी है।

बहरहाल उभरती वैश्विक चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूरोप यात्र न केवल द्विपक्षीय संबंधों की रीबूटिंग और बहुपक्षीय संबंधों में संतुलन बनाने के लिहाज से मूल्यवान मानी जा सकती है, बल्कि इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा सकती है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत ने जो स्टैंड लिया वह सर्वथा उचित है।

भारत की रक्षा जरूरतें पूरी करता रूस : यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस ने भारतीय वायु सेना को अत्याधुनिक एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की तीसरी खेप अगले महीने देने का निर्णय लिया है। रूस से भारतीय वायु सेना को कुल पांच एस-400 रक्षा प्रणाली आगामी वर्ष तक मिलनी हैं। रूस ने यूक्रेन संघर्ष के बीच ही पिछले माह इसकी दूसरी खेप भारत को दी थी। रूस से मिली पहली एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की खेप को भारत ने पंजाब में तैनात किया है। मालूम हो कि भारत के रक्षा बेड़े में शामिल हो रही इस रूसी मिसाइल रक्षा प्रणाली से पूरी दुनिया खौफ खाती है। सतह से हवा में लंबी दूरी तक मार करने वाली इस मिसाइल रक्षा प्रणाली की आपूर्ति होने से भारत को चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों का सामने करने में आसानी होगी। यह मिसाइल रक्षा प्रणाली एक साथ कई लक्ष्यों को निशाना बनाकर दुश्मन के लड़ाकू विमान और हेलीकाप्टर आदि को नष्ट कर सकती है। यह मिसाइल सिस्टम करीब चार सौ किलोमीटर तक मार कर सकता है। इसकी रफ्तार आवाज की गति से भी तेज है।

Edited By Sanjay Pokhriyal

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