By-Election Result: 'M-Y' की नींव पर खड़े आजमगढ़ व रामपुर के सपाई किले भरभराकर ढहे, भाजपा ने मार लिया मैदान

UP By-Polls Result 2022 रामपुर और आजमगढ़ सीट पर समीकरण यही बनते दिख रहे थे कि सपा ही यहां फिर जीतेगी क्योंकि दोनों सीटों पर निर्णायक भूमिका में वही मुस्लिम-यादव गठजोड़ निर्णायक भूमिका में था। इसके बावजूद भाजपा ने पूरी ताकत लगाई और जीत हासिल की।

Umesh TiwariPublish: Sun, 26 Jun 2022 07:44 PM (IST)Updated: Mon, 27 Jun 2022 05:09 PM (IST)
By-Election Result: 'M-Y' की नींव पर खड़े आजमगढ़ व रामपुर के सपाई किले भरभराकर ढहे, भाजपा ने मार लिया मैदान

लखनऊ [जितेंद्र शर्मा]। रामपुर में भाजपा जीत गई? आजम खां के रामपुर में सपा हार गई? लोकसभा उपचुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद यह सबसे बड़ी सनसनी थी, सबसे बड़ा आश्चर्य और सबसे बड़ा प्रश्न भी था। जो भी इसका कारण टटोलने चला, अगले ही पल उसका सामना एक और बड़े प्रश्न से हुआ, जहां लगभग 55 प्रतिशत की मुस्लिम आबादी ही हार-जीत तय करती है, वहां कैसे भाजपा जीत गई?

बस, इसका जो जवाब है, वही सपा की रामपुर और आजमगढ़ सीट पर हार की कहानी है। इस चुनाव ने आजम और सपा मुखिया अखिलेश यादव को आईना दिखा दिया है कि मुसलमान अब उनकी मुट्ठी में नहीं है। आजमगढ़ में विकल्प मिला तो बसपा के शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली के साथ जा खड़ा हुआ और रामपुर में मतदान से मुंह मोड़ लिया।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के विधायक बनने से आजमगढ़ और पार्टी के कद्दावर नेता आजम खां के विधानसभा चुनाव जीतने से रामपुर लोकसभा सीट रिक्त हुई। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के हिस्से में रही इन सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की नजर थी और उसने दमखम से चुनाव लड़ा भी। रामपुर से पूर्व एमएलसी घनश्याम लोधी को लड़ाया और आजमगढ़ से भोजपुरी कलाकार व अखिलेश के खिलाफ 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ चुके दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' पर दांव लगाया।

अखिलेश ने आजमगढ़ से अपने भाई धर्मेंद्र यादव को उतारा, जबकि रामपुर में आजम की चली और उन्होंने अपने करीबी आसिम राजा को प्रत्याशी बनाया। बसपा ने पूर्व विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को मैदान में उतार दिया। सपा को वाकओवर देने के लिए कांग्रेस ने चुनाव ही नहीं लड़ा। इस तरह समीकरण यह बनते दिख रहे थे कि सपा ही यहां फिर जीतेगी, क्योंकि दोनों सीटों पर निर्णायक भूमिका में वही मुस्लिम-यादव गठजोड़ निर्णायक भूमिका में था, जो समाजवादी पार्टी का मूल आधार माना जाता है।

इसके बावजूद भाजपा ने पूरी ताकत लगाई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर पार्टी के लगभग सभी मंत्री, वरिष्ठ नेता प्रचार के लिए उतरे। मगर, सिर्फ संघर्ष सफलता की गारंटी नहीं देता। राजनीति में विरोधियों की ताकत और कमजोरी भी परिणाम को प्रभावित करती है।

सबसे पहले रामपुर की बात करते हैं। यहां लगभग 55 प्रतिशत मुसलमान, 42 प्रतिशत हिंदू और तीन प्रतिशत में सिख और बौद्ध समाज की हिस्सेदारी है। स्पष्ट तौर पर मुस्लिम के मतों पर ही चुनाव मुख्यत: टिका है। यही कारण है कि 1991, 1998 और 2014 के अलावा कभी भाजपा यहां जीत नहीं सकी थी। अब यहां भाजपा की जीत और भी मुश्किल लगती थी, क्योंकि यह सपा के सबसे बड़े मुस्लिम नेता आजम खां का क्षेत्र है।

यहां आजम ही सपा हैं। फिर जिस तरह से भाजपा के खिलाफ सपा को एकमात्र सपा को विकल्प मानकर प्रदेशभर में मुस्लिमों ने एकतरफा सपा को वोट दिया और अपने खिलाफ हुई कार्रवाई को दो साल बाद जेल से निकले आजम खां उत्पीड़न बताकर कौम को डरा रहे थे, आगाह कर रहे थे, इमोशनल कार्ड खेल रहे थे, उससे लगता था कि मुस्लिम का एकजुट वोट सपा को मिलेगा। वहां के अन्य जाति वर्ग के बीच भी आजम के प्रति संवेदना की लहर उठ सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

बताया जा रहा है कि आजम ने बिना किसी की रायशुमारी के अपने करीबी आसिम को प्रत्याशी घोषित कर दिया। नवाब खानदान के लिए भी काफी अपशब्द बोले। इससे मुस्लिम नाराज थे। वह भाजपा को वोट नहीं दे सकते थे, इसलिए उपचुनाव में रुचि नहीं ली और वोट प्रतिशत 41.71 प्रतिशत पर सिमट गया। बाकी समुदाय ने योगी सरकार पर भरोसे की मुहर लगाकर घनश्याम लोधी को दिल्ली के दरबार में भेज दिया।

इसी तरह उस आजमगढ़ की सीट पर भी मुस्लिमों की नाराजगी ने परिणाम बदले, जहां सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और उनके बाद लगातार अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव जीते। सर्वाधिक लगभग 30 प्रतिशत यादव और 12 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक वाली इस सीट पर अखिलेश को विश्वास था कि एम-वाई फैक्टर उनके लिए पर्याप्त है। मगर, हुआ इसके उलट।

विधानसभा चुनाव की तरह मुस्लिम ने सपा के लिए 'जिहाद' नहीं किया। यहां बसपा के गुड्डू जमाली को मुस्लिमों ने सपा का विकल्प माना, जिससे मुस्लिम मतों में बिखराव हो गया। निरहुआ ने न सिर्फ यादव वोट में सेंध लगाई, बल्कि 24 प्रतिशत अनुसूचित जाति के वोट का बड़ा हिस्सा उन्हें मोदी-योगी सरकार की नीतियों ने दिला दिया। परिणामस्वरूप इस सीट पर 2009 के बाद फिर कमल खिल गया।

इन परिणामों ने एक बड़ा संदेश यह दिया है कि उत्तर प्रदेश में फिलहाल बसपा को बीता हुआ कल न माना जाए। भाजपा के खिलाफ सपा के विकल्प के रूप में बसपा एक बार फिर खड़ी होती नजर आ रही है और 2024 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस न भी खड़ी हुई तो मुस्लिम मतों के दो बड़े हिस्सेदार तय हैं। भाजपा के लिए यह शुभ संकेत है।

नुकसानदेह रहा अखिलेश का अंदाज और आत्मविश्वास : राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि अखिलेश यादव का अंदाज और आत्मविश्वास उनके लिए नुकसानदेह रहा। अंदाज ऐसा कि विधानसभा चुनाव में बसपा से बगावत कर सपा की ओर गए गुड्डू जमाली को टहलाते रहे, लेकिन टिकट नहीं दिया। इसी तरह मुस्लिम समाज में गहरी पैठ रखने वाले दीदारगंज के पूर्व विधायक आदिल शेख को भी विधानसभा चुनाव में आश्वासन के बावजूद टिकट नहीं दिया। इससे मुस्लिमों में नाराजगी थी। इधर, उलमा कौंसिल ने फतवा जारी कर बसपा को समर्थन की घोषणा कर दी, लेकिन इससे भी बेफिक्र अखिलेश न आजमगढ़ और न रामपुर, कहीं भी प्रचार के लिए नहीं गए।

मुस्लिमों का बिरादरीवाद भी वजह : रामपुर में सपा की हार की एक वजह मुस्लिमों में बढ़ता बिरादरीवाद भी माना जा रहा है। आसिम राजा शम्सी बिरादरी से हैं, जबकि यहां बहुतायत में पठान हैं, जो खुद को बड़ा मुसलमान मानते हैं। वह आसिम को प्रत्याशी बनाए जाने से खुश नहीं थे।

आर्यमगढ़ का योगी-अस्त्र : मुस्लिम मतों के बिखराव के साथ ही अधिकांश हिंदू मतों को भाजपा के पक्ष में जुटाने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक अस्त्र को भी माना जा रहा है। उन्होंने आजमगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि यह आजमगढ़ को आर्यमगढ़ बनाने का भी मौका है। इसके अलावा भाजपा ने सटीक रणनीति के साथ रामपुर में अपने अनुभवी संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना और कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही के नेतृत्व में आजमगढ़ में मंत्री-नेताओं की टीम लगाई।

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Edited By Umesh Tiwari

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