किताब घर में पढ़िए खंडित स्वप्नों की साझी जमीन का मोहभंग और मयूर पंख में सहजता और नि:संगता का निवेश

हम लगातार किताबों के संग्रह से कुछ ऐसी चुनीदा किताबों की समीक्षा आपके समक्ष लेकर आते है। जो आपको जानकारी तो देती ही है। साथ ही आपको रोचकता से परिपूर्ण करती हैं। आज भी हम आपके सामने दो उपन्यास लेकर हाजिर हुए हैं।

Abhishek AgnihotriPublish: Sat, 02 Jul 2022 05:04 PM (IST)Updated: Sat, 02 Jul 2022 05:04 PM (IST)
किताब घर में पढ़िए खंडित स्वप्नों की साझी जमीन का मोहभंग और मयूर पंख में सहजता और नि:संगता का निवेश

किताबघर : खंडित स्वप्नों की साझी जमीन का मोहभंग

गाइड

आर.के. नारायण

उपन्यास

अनुवाद: शिवदान सिंह चौहान/विजय चौहान

पहला संस्करण, 1958

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2020

राजपाल एंड संज, दिल्ली

मूल्य: 235 रुपए

समीक्षा : यतीन्द्र मिश्र

भारत में ब्रितानी औपनिवेशिकता ने भले ही हमारी संस्कृति के ढेरों पक्षों को गलत तरीके से प्रभावित किया, मगर अंग्रेजी भाषा के आगमन ने कुछ ऐसी चीजें भी विरासत में मुहैया कराई हैं, जो हमारी भाषायी संस्कृति को कुछ अलग और अनूठा रंग देती हैंर्। ंहदी कवि कुंवर नारायण की ये काव्य पंक्तियां अंग्रेजी के संदर्भ में हमेशा याद आती हैं- ‘अंग्रेजों से नफरत करना चाहता/जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया/तो शेक्सपियर आड़े आ जाते/जिनके मुझ पर न जाने कितने अहसान हैं...’ अंग्रेजी में पिछले 75 सालों में जिन बौद्धिकों ने बेहतरीन काम से सृजनात्मकता का फलक विस्तृत किया, उसमें आर. के. नारायण का नाम आदर से लिया जाता है। भारतीय अंग्रेजी कथा साहित्य को हम मुल्कराज आनंद, राजा राव और आर. के. नारायण की दृष्टियों से भी समझते हैं। स्वाधीनता के हीरक जयंती वर्ष में नारायण के ‘गाइड’ उपन्यास को अंग्रेजी कथा साहित्य के एक प्रतिनिधि उदाहरण के तौर पर याद किया जा सकता है, जो अपने आधुनिक कथानक और बोल्डनेस के लिए सार्वकालिक महत्व का बन पड़ा है। इस उपन्यास की महत्ता इस रूप में भी देखनी चाहिए कि फिल्म निर्देशक विजय आनंद ने जब इस पर आधारित फिल्म बनाई, तब उसके अंग्रेजी संस्करण के लिए ‘द गुड अर्थ’ से चर्चित प्रख्यात लेखिका पर्ल एस. बक ने पटकथा लिखी थीर्। ंहदी में वहीदा रहमान, देव आनंद अभिनीत यह फिल्म अपनी कलात्मकता के लिए याद की जाती है। ‘गाइड’ के बहाने पिछली शताब्दी के छठवें दशक में उभरते उस नए समय की आहट को इशारों में देखा जा सकता है, जिसने 21वीं शताब्दी तक आते हुए उन्हीं संकेतों को पूरी ताकत से समाज में पसार दिया है।

‘गाइड’ की कहानी एक भ्रष्ट टूरिस्ट गाइड राजू, नृत्य में करियर बनाने के लिए उत्सुक नर्तकी रोजी और उसके पुरातत्ववेत्ता पति मार्को के संबंधों पर आधारित है। रिश्तों की जटिलताएं, पति-पत्नी के तनाव भरे रिश्ते, एक गाइड का हर तरह से सफल होने की युक्ति के बीच तिकड़मबाज बने रहने की कोशिश और कथा विस्तार में कई पेचोंखम के साथ गाइड और नर्तकी का प्रेम में पड़कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना- ऐसा आधुनिक और चौंकाने वाला कथानक रहा, जिससे गुजरते हुए भारत में टूटती हुई मर्यादाओं और आधुनिकता की दस्तक को उस दौर में पढ़ा जा सकता है। आर. के. नारायण स्त्री के मनोविज्ञान और समाज के बनाए नियम कानूनों को आपस में ताश के पत्तों की तरह फेंटते हुए कई परतों वाला सत्य उकेरते हैं, जो आज के युग में सहज और जानी पहचानी बात लगती है। एक जटिल कथानक को तीनों किरदारों के परिप्रेक्ष्य से देखते हुए उपन्यासकार ने कुछ ऐसे रास्ते भी खोले हैं, जो दुविधा, अंतद्र्वंद्व, आत्म पलायन और छलना में अपनी निष्पत्ति पाते हैं। कहना गलत न होगा, आधुनिक समाज की बनती नई-नई तस्वीर का पुराकथन है ‘गाइड’, जिसका अनुमान रचनाकार वर्ष 1958 में ही कर लेता है। दक्षिण भारत के एक काल्पनिक गांव ‘मालगुड़ी’ में स्थापित यह कथा अपने अंत तक आते हुए ऐसे गांव ‘मंगल’ तक जाती है, जहां अकाल आता है और पानी बरसाने के लिए गांव वाले 11 दिन का उपवास रखते हैं। आर. के. नारायण अपनी सहज शैली में व्यंग्य और हास्य के बहाने समाज का वह विद्रूप दिखाते हैं, जिसके लिए राजू का किरदार कतई तैयार नहीं है। राजू गाइड, जो धोखाधड़ी के इल्जाम में दो साल की कैद काटकर जेल से बाहर आया है, गांव वाले उसे पहुंचा हुआ कोई संत समझ लेते हैं। आयरनी और इंपैथी के समावेश से जटिलता बुनने में कारगर उपन्यासकार की युक्ति, उपन्यास के अंत तक आते हुए प्रखरता से चमकती है। 11 दिन बाद दूर पहाड़ियों पर पानी बरसने का आभास मिलता है। आर. के. नारायण उपन्यास की समाप्ति पर फैसलाकुन नहीं होते कि वाकई पानी बरसा या राजू की मृत्यु हुई? इस प्रश्न के साथ ‘गाइड’ की अंतर्कथा को कई विचार सरणियों से गुजरते हुए समझा जा सकता है। इसमें भारत की बदलती हुई तस्वीर, मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्विरोध और लोक और शास्त्र का अपना बहाव, जिसमें आस्था और विश्वास की पूंजी कभी छीजती नहीं।

ऐसे खूबसूरत घुमाओं से जूझता हुआ यह उपन्यास एक अपराधी मन, प्रसिद्धि को तरसती एक महत्वाकांक्षा तथा जुनून के स्तर तक अपने काम में डूबे व्यक्ति के खंडित स्वप्नों की साझी जमीन है। इसमें मानवीय सरोकारों को समझने के साथ देश, काल, परिस्थिति के हिसाब से उन्हें न्यायोचित ठहराने की कवायद शामिल है। आज ऐसे ढेरों सीमांत बनते हुए देखे जा सकते हैं, जहां हर पल आगे निकलने की होड़ में शामिल राजू अपनी परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाती सपने संजोए हुई रोजी और काम के नशे में डूबा मार्को यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। आर. के. नारायण की तुलना इस अर्थ में विलियम फाकनर से की जा सकती है, जो काल्पनिक कस्बों के निर्माण में जीवन की जटिलताएं बुनने के चितेरे थे। ‘गाइड’ समाज में व्याप्त मानवीय कमजोरी, नैतिक दुर्बलता और इन सबसे परे उठकर वीतरागी होने के भाव की कठिन यात्रा है, जहां यह पता नहीं होता कि इस मुकाम से यात्रिक को आगे किधर जाना है।

मयूरपंख : सहजता और नि:संगता का निवेश

सुनीता

जैनेंद्र कुमार

उपन्यास

पहला संस्करण, 1935

पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2018

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

मूल्य: 120 रुपए

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में मनोयोग से जुड़े रहे साहित्यकार जैनेंद्र कुमार ने हिंदी उपन्यासों की जमीन पर कुछ नए प्रयोग किए। प्रसिद्ध है कि प्रेमचंद से भिन्न, उनके उपन्यास सामाजिक समस्याओं से इतर निजी या वैचारिक समस्याओं को केंद्र में रखकर अपना कथानक निर्मित करते थे। ‘सुनीता’ (1935) जैसे उपन्यास में विशिष्ट उपस्थितियों के अंतर्गत ऐसे चरित्र चित्रण सामने आते हैं, जिनमें सामाजिक, पारिवारिक और यौन समस्याओं को गुंफित किया गया है। ऐसे जटिल चरित्रों की विकृति और सामाजिक पक्षधरता के पाठ के लिए हम ‘सुनीता’ को एक आदर्श उपन्यास मान सकते हैं। उपन्यास की भूमिका में भी जैनेंद्र कुमार यह लक्ष्य करते हैं कि थोड़े में समग्रता दिखाई जा सकती है।

‘सुनीता’, जैनेंद्र की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि और घटनाओं के माध्यम से चरित्रों के अंतरंग को खोलने की कोशिश है, जिसमें नि:संगता का स्पर्श शामिल है। मात्र चार-पांच किरदारों से बुना गया यह उपन्यास प्रकाशन के नौ दशक बाद भी अपने सजीव चित्रण, निरलंकार शैली, सहज वाक्य विन्यास और निर्भीक कथानक के लिए जाना जाता है। -(यतीन्द्र मिश्र)

Edited By Abhishek Agnihotri

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