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तालिबान में भी एक धड़ा है पाकिस्‍तान विरोधी, जानें- इसको कैसे साध सकता है भारत- एक्‍सपर्ट व्‍यू

अफगानिस्‍तान में चल रही तालिबान और सरकार के बीच चल रही वार्ता की राह आसान नहीं है। भारत का भी तालिबान के साथ काफी कड़वा अनुभव रहा है। तालिबान को खत्‍म करने की सभी कोशिशें अब तक नाकाम ही रही हैं।

Kamal VermaTue, 08 Dec 2020 10:23 AM (IST)
तालिबान में भी एक धड़ा है पाकिस्‍तान विरोधी, जानें- इसको कैसे साध सकता है भारत- एक्‍सपर्ट व्‍यू

पवन चौरसिया। राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले और एशिया का हृदय कहे जाने वाले अफगानिस्तान को इतिहासकारों ने साम्राज्यों के कब्रगाह की संज्ञा दी है। चाहे 19वीं सदी में ब्रिटिश राज हो, 20वीं सदी में सोवियत संघ हो या 21वीं सदी में अमेरिका, किसी भी विदेशी महाशक्ति को आज तक अफगानिस्तान में उस तरह की राजनीतिक सफलता नहीं मिल पाई, जिसकी मंशा से वो अपनी सैन्य शक्ति के साथ अफगानिस्तान में घुसे थे। गौरतलब है कि तालिबान और अल-कायदा को खत्म करने के लिए लगभग दो दशकों से अफगानिस्तान में चला आ रहा संघर्ष अमेरिकी इतिहास में सबसे लंबा सैन्य संघर्ष है, जिसमें हजारों अफगान नागरिकों के साथ-साथ ढाई हजार से अधिक अमेरिकी सैनिक भी मारे जा चुके हैं, लेकिन फिर भी उसे कोई निर्णायक विजय नहीं मिल सकी है।

आतंकवाद पर अमेरिका के नेतृत्व वाले युद्ध के बावजूद अफगानिस्तान के पड़ोसी देश पाकिस्तान से मिले समर्थन और रणनीतिक सहयोग के कारण तालिबान आज तक बचा हुआ है। हाल ही में संपन्न हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जो बाइडन को मिली जीत से अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने के मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय पर क्या असर पड़ेगा, बाइडन के किसी आधिकारिक बयान के अभाव में इसको लेकर अभी महज कयास ही लगाए जा सकते हैं। वैचारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो जो बाइडन जिस उदार अंतरराष्ट्रीयवाद की विचारधारा के समर्थक हैं, वो संप्रभु देश में अपनी सेना को वहां रखने को अपने मूल सिद्धांतों के विरुद्ध मानती है। इस अनिश्चितता का एक दूसरा कारण यह भी है कि पिछले कुछ चुनावों से उलट इस बार के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार और डिबेट में अफगानिस्तान मुद्दा लगभग गायब रहा।

लगभग 11 वर्ष पहले जब ओबामा प्रशासन के कई लोग राष्ट्रपति से अफगानिस्तान में सेना बढ़ाने का आग्रह कर रहे थे, तब उप-राष्ट्रपति के तौर पर बाइडन इसके विरोध में खड़े थे। उन्होंने यह सलाह दी थी कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना को घटाते हुए उसे सिर्फ आतंकवाद विरोधी प्रयासों के लिए सीमित कर दिया जाना चाहिए। साल की शुरुआत में एक पत्रिका में बाइडन ने लिखा था कि वह अमेरिका के सदा से चले आ रहे युद्धों को समाप्त करना चाहते हैं, लेकिन वह अफगानिस्तान से सेना की पूर्ण वापसी के बजाय अमेरिकी सेना को अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट को हराने के लिए प्रतिबद्ध करना चाहते हैं। वैसे अफगानिस्तान को लेकर उनकी अंतिम नीति क्या होगी, यह कुछ हद तक इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अमेरिका के विदेश मंत्री, सेना प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में आधिकारिक रूप से वह किसे नियुक्त करते हैं। यह भी संभव है कि यदि बाइडन के सैन्य सलाहकार उन्हें यह सलाह देते हैं कि अफगानिस्तान से सेना को कम करने से वहां बाकी बचे हुए सैनिकों के लिए खतरा बढ़ सकता है, तो शायद वो अफगानिस्तान में सेना घटाने के बजाय वहां और सैनिक भेजने का निर्णय लेने पर विवश हो जाएं।

शांति वार्ता की जटिलता : अफगान शांति वार्ता वैसे तो आधिकारिक तौर पर सितंबर के मध्य में शुरू की गई थी, लेकिन संदर्भ की शर्तो को लेकर उत्पन्न हुए मतभेदों के कारण इसको तुरंत ही रोक दिया गया था। असहमति का एक मुद्दा यह भी था कि विवादों के मामले में इस्लामी न्यायशास्त्र के किस स्कूल का इस्तेमाल संदर्भ के लिए किया जाना चाहिए। वार्ता में अफगान सरकार ने एक ऐसी प्रणाली पर जोर दिया है जिसमें देश के धाíमक और जनजातीय अल्पसंख्यकों, जिसमें सिखों और हिंदुओं व शियाओं की आबादी शामिल है। वार्ता की विशेषता यह भी थी कि इसमें महिलाओं ने भी भाग लिया था और अफगान सरकार के दोनों धड़ों के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल थे। तालिबान चाहता था कि फरवरी में उसके अमेरिका के साथ हुए समझौते को वार्ता के लिए शुरुआती बिंदु माना जाए, जबकि अफगान सरकार वार्ता के लिए अधिक लोकतांत्रिक और घरेलू आधार की मान्यता चाहती थी। फरवरी में हुए समझौते में अफगान सरकार पक्षकार नहीं थी। वार्ता के दो प्रमुख लक्ष्य थे- अफगान सरकार और तालिबान के बीच शक्ति-बंटवारे को लेकर समझौता करना और तालिबान से पूर्ण युद्धविराम की प्रतिबद्धता प्राप्त करना।

हाल के वर्षो में धाíमक दिवसों पर कई संक्षिप्त संघर्ष विराम तो हुए हैं, लेकिन तालिबान ने लड़ाई रोकने के लिए व्यापक संघर्ष विराम को मानने से इन्कार कर दिया है। तालिबानी नेताओं को यह बखूबी पता है कि खून-खराबा करने की उनकी क्षमता ने ही उनके दुश्मनों को बातचीत करने के लिए बाध्य किया है और अमेरिका ने भी अपने सैनिकों को जल्द वापस बुलाने के चक्कर में उनके द्वारा अफगानिस्तान में किए जा रहे आतंकी हमलों से मुंह फेर लिया है। ऐसे में उनके पास हिंसा को कम करने की कोई ठोस वजह नहीं है। हालांकि कुछ दिन पहले अफगान सरकार और तालिबान ने शांति प्रक्रिया के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण बातचीत के लिए एक साथ आगे बढ़ने के

लिए सहमति व्यक्त की है। दावा किया जा रहा है कि बातचीत की प्रस्तावना सहित प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया है और वार्ता भी अपने एजेंडे के अनुकूल शुरू होगी।

भारत साफ कर चुका है अपनी मंशा : इसी साल सितंबर में जब तालिबान और अफगान सरकार के बीच दोहा में महत्वपूर्ण अंतर-अफगान वार्ता शुरू हुई, अफगान-अमेरिका कूटनीतिज्ञ खलीलजाद ने उसी दौरान अपने दो वर्षो के कार्यकाल में नई दिल्ली की अपनी पांचवीं यात्र की थी। खलीलजाद की यात्र भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से अंतर-अफगान वार्ता बैठक के उद्घाटन को संबोधित करने के कुछ ही दिनों बाद हुई है। जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा था कि भारत चाहता है कि शांति प्रक्रिया अफगान के नेतृत्व वाली, अफगान के स्वामित्व वाली और अफगान नियंत्रित, राष्ट्रीय संप्रभुता और उसकी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने वाली व मानव अधिकारों और लोकतंत्र को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। इसका यह मतलब निकाला जा रहा है कि भारत इस शांति वार्ता से अपेक्षा रखता है कि अफगानिस्तान में सिख अल्पसंख्यकों पर हमले बंद होने चाहिए और अफगानिस्तान की धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ-साथ भारतीय हितों, जिसमें भारतीय दूतावास और अफगानिस्तान में भारतीय कंपनियां और श्रमिक शामिल हैं, उन्हें भी संरक्षित किया जाना चाहिए।

वह भारत की इस चिंता को दर्शाना चाह रहे थे कि पिछले 19 वर्षो में अफगानिस्तान में जो संवैधानिक ढांचा और लोकतंत्र विकसित हुआ है, उसको अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए, न कि उसे ध्वस्त किया जाना चाहिए। इसके अलावा अक्टूबर में अफगानिस्तान में राष्ट्रीय सुलह के लिए बनाए गए उच्च परिषद के अध्यक्ष अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह अफगान शांति वार्ता को लेकर क्षेत्रीय आम सहमति बनाने की मंशा से भारत आए थे। उन्होंने भारत को आश्वासन दिया है कि तालिबान के साथ चल रही अंतर-अफगान शांति वार्ता के संभावित परिणाम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और उसके राष्ट्रीय हितों के लिए हानिकारक नहीं होंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अक्टूबर में यह दावा किया था क्रिसमस तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया जाएगा। हालांकि अब वह कह रहे हैं कि एक छोटे आतंकवाद विरोधी बल को अफगानिस्तान में ही रहने देंगे। इसका मतलब यह भी होगा कि सैद्धांतिक तौर पर शेष सेना तालिबान और उससे संबंधित जिहादियों, जैसे अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के खिलाफ, आतंकवाद विरोधी अभियान जारी रखेगी। लेकिन यह क्षेत्र में अफगान बलों को प्रशिक्षित करने की क्षमता को भी गंभीर रूप से कम कर देगा

ज्ञात रहे कि पूर्व में तालिबान हर उस विचार और आदर्श का विरोधाभासी रहा है जो भारत की आंतरिक और विदेश नीति का अभिन्न अंग रहे हैं, फिर चाहे वो लोकतांत्रिक मूल्य हों, धाíमक सहिष्णुता हो, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकार हों या संप्रभुता का सिद्धांत। तालिबान का सबसे बड़ा समर्थक मुल्क पाकिस्तान ही रहा है जो यह नहीं चाहता कि भारत किसी भी रूप में अफगानिस्तान में उपस्थित रहे। तालिबान के संबंध जम्मू कश्मीर में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले संगठनों से भी रहे हैं।

भारत ने कभी भी तालिबान को मान्यता नहीं दी और उसके साथ पुराने अनुभवों की वजह से दिल्ली में तालिबान को लेकर कोई विशेष सकारात्मकता नहीं दिखाई देती है। पिछली सदी के आखिरी दशक में भारत तालिबान शासन के विरोध में मुखर था और इसके खिलाफ उसने रूस और ईरान के साथ अफगानिस्तान के उत्तरी गठबंधन का समर्थन किया था। वर्ष 1999 में कंधार विमान अपहरण कांड की याद आज भी ताजा है, जिसमें भारत को पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहे तालिबान द्वारा करवाई जा रही बातचीत में अपहर्ताओं की मांगों को स्वीकार करना पड़ा था। ऐसे में भारत के लिए तालिबान से एक ही मेज पर बैठ कर वार्ता करना आसान नहीं है।

नई दिल्ली ने स्वीकार तो किया है कि उसे अफगानिस्तान में तेजी से बदलते हुए परिवेश में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी। लेकिन भूमिका की रूप-रेखा को लेकर कशमकश बनी हुई है। भले ही तालिबान के पाकिस्तान-पोषित हक्कानी नेटवर्क और आइएस के साथ संबंध बढ़ रहे हैं, लेकिन निश्चित रूप से अब भारत को तालिबान के साथ संवाद स्थापित करने की दिशा में कदम उठाना पड़ेगा। भारत के पास इस समय विकल्प बहुत सीमित हैं और उसे इन्हीं विकल्पों के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत अफगानिस्तान में कराए गए अपने विकास और मानवीय कार्यो के कारण अफगान लोगों के बीच बहुत सद्भावना रखता है, जिसका और विस्तार करने से उसको लाभ मिल सकता है।

भारत ईरान और रूस के साथ मिल कर अपने सहयोग का विस्तार कर सकता है। इसके अलावा, तालिबान भी एक अखंड इकाई नहीं, बल्कि कई पश्तून जनजातियों और गुटों का एक समूह है, जिसके किसी एक धड़े को साधा जा सकता है। वास्तव में, तालिबान के भीतर भी कई लोग ऐसे हैं जो अपने आप को पाकिस्तान की कठपुतली नहीं बनने देना चाहते हैं। इसलिए नई दिल्ली को चाहिए कि तालिबान के भीतर उन तत्वों तक पहुंचने का प्रयास करे जो उसके साथ काम करने के लिए तैयार हैं। यह अफगानिस्तान में भारतीय हितों की रक्षा करते हुए तालिबान के उदारवादी धड़े को मुख्य धारा में लाने के लिए भी मददगार साबित हो सकता है। 

(शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)

Edited By: Kamal Verma