कश्मीर में रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के विरोध के बावजूद पांच सहेलियों ने छेड़ी सूफी संगीत की तान

बांडीपोरा जिला इल्म (ज्ञान) अदब (शालीनता) और पानी की मीठी झील बुल्लर के लिए मशहूर है। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर गनसतान गांव की रहने वाली पांच सहेलियों में दो बहनों इरफाना यूसुफ रिहाना यूसुफ के अलावा गुलशन लतीफ शबनम बशीर और साइमा हमीद शामिल हैं।

Arun Kumar SinghPublish: Thu, 26 Aug 2021 05:19 PM (IST)Updated: Thu, 26 Aug 2021 10:45 PM (IST)
कश्मीर में रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के विरोध के बावजूद पांच सहेलियों ने छेड़ी सूफी संगीत की तान

रजिया नूर, श्रीनगर। जहां कभी आतंकी हमलों का खौफ हुआ करता था, उस कश्मीर की फिजां में अब सूफी संगीत की धुन दिलों को सुकून दे रही है। समाज के ताने, रिश्तेदारों के विरोध और परिवार की नाराजगी के बावजूद कश्मीर में दम तोड़ चुके सूफियाना संगीत में नई रूह फूंकने में जुटी हैं उत्तरी कश्मीर के बांडीपोरा जिले के छोटे से गांव गनसतान की पांच सहेलियां। कश्मीर में विशेष अवसरों, दरगाहों या जियारतों में गाए जाने वाले सूफियाना संगीत में अब भी लड़कियों का शामिल होना अच्छा नहीं समझा जाता। बावजूद इसके इन सहेलियों ने हालात के आगे घुटने नहीं टेके और अब यह कश्मीर की नई पहचान बनकर उभर रही हैं। देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी तारीफ पा चुकीं इन सहेलियों का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करना चाहती हैं। दावा किया कि कश्मीर में लड़कियों के सूफी संगीत का यह पहला समूह है।

दो युवतियों ने की शुरुआत

बांडीपोरा जिला इल्म (ज्ञान), अदब (शालीनता) और पानी की मीठी झील बुल्लर के लिए मशहूर है। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर गनसतान गांव की रहने वाली पांच सहेलियों में दो बहनों इरफाना यूसुफ, रिहाना यूसुफ के अलावा गुलशन लतीफ, शबनम बशीर और साइमा हमीद शामिल हैं। इन सहेलियों ने अपने समूह का नाम यमबरजल रखा है। कश्मीर में जब बहार आती है तो सबसे पहले खिलने वाले छोटे-छोटे पीले रंग के फूलों को यमबरजल कहा जाता है। यमबरजल संगीत समूह की शुरुआत इरफाना व रिहाना ने की। 23 वर्षीय इरफाना इस संगीत में सबसे अहम माना जाने वाला यंत्र संतूर बजाती हैं। अन्य सहेलियां तबला, सितार, साज-ए-कश्मीर बजाती हैं।

कहते थे, ये लड़कियों के बस की बात नहीं

इरफाना ने कहा कि घर में संगीत का पहले से माहौल था। मेरे पिता मुहम्मद यूसुफ बीते 22 वर्षों से सूफियाना संगीत से जुड़े हैं। वह संतूर वादक भी हैं। वह अक्सर अभ्यास करते थे और हम दोनों बहनें उन्हें देखतीं थीं। धीरे-धीरे हमारी भी दिलचस्पी बढ़ी। अब्बू के पास सूफियाना संगीत सीखने कई लड़के आते थे, लेकिन लड़की कोई नहीं। हम दोनों बहनों ने इसे सीखने का फैसला किया। अपनी इस इच्छा का जिक्र अपने अब्बा से किया तो वह राजी हो गए। यह वर्ष 2013 की बात है। हालांकि हमारी मां और बाकी रिश्तेदारों ने नाराजगी जताई। पड़ोसियों व समाज के अन्य लोगों ने भी आपत्ति जताई। उनका मानना था कि सूफियाना संगीत सूफियों व संतों का कलाम है। इसके लिए विशेष महफिलें आयोजित करनी पड़ती हैं, लिहाजा यह औरतों के बस की बात नहीं। हमने घुटने नहीं टेके और ऐसे हमारा संगीतमय सफर शुरू हुआ।

सूफियाना संगीत में तलाश रहीं भविष्य

रिहाना ने कहा कि हमारे पिता ने हमें पहले अपने उस्ताद मुहम्मद याकूब शेख के पास भेजा। याकूब साहब ने हमें वाद्य यंत्रों के बारे में बताया। हमें देख हमारी बचपन की तीन सहेलियां शबनम, साइमा और गुलशन भी जुड़ गईं। उन्हें भी अपने परिवारवालों की आपत्ति का सामना करना पड़ा। तब वह स्कूल में सातवीं और आठवीं कक्षा में पढ़ती थीं। अब पांचों कालेज में हैं और सूफियाना संगीत में अपना भविष्य तलाश रही हैं।

भोपाल में सराहना से काफी हौसला मिला

तबला बजाने में माहिर शबनम ने कहा, 2017 में हमें भोपाल में अपनी कला दर्शाने का मौका मिला। वहां हमें खूब सराहना मिली। उससे हमें काफी हौसला मिला। इसके अलावा एक बार दिल्ली में भी कार्यक्रम किया। शबनम ने कहा, सूफियाना संगीत ऐसा संगीत है, जो अमूमन दरगाहों व जियारतों और सूफी महफिलों में ही गाया जाता है। हम हर जगह नहीं जा पाते। दरगाहों व जियारतों पर तो बिल्कुल नहीं। सूफी महफिलों में भी हमें बहुत कम अवसर मिलता है क्योंकि अभी भी इस श्रेणी में लड़कियों का होना अच्छा नहीं समझा जाता। जब भी हमें मौका मिलता है, हम बेहतर प्रदर्शन करने की पूरी कोशिश करती हैं। शबनम ने कहा कि आल इंडिया रेडियो श्रीनगर के हम आभारी हैं कि वहां हमें समय-समय पर प्रदर्शन करने का मौका मिलता है।

नई फिल्म नीति से हैं काफी उम्मीदें

इस ग्रुप को नई फिल्म नीति से काफी उम्मीदें हैं। वाद्य यंत्र साज-ए कश्मीर बजाने वाली साइमा ने कहा, हालांकि यह संगीत पारंपरिक संगीत से बिल्कुल अलग है और लोगों की बड़ी संख्या इसे पसंद करती है, लेकिन ध्यान न देने के चलते यह दम तोड़ रहा है। हम समझते हैं कि फिल्म पालिसी इसे फिर से जीवित करने में एक अहम भूमिका निभा सकती है।

उम्मीद है परगाश राक बैंड जैसा हश्र अब नहीं होगा

वर्ष 2012 में भी श्रीनगर की तीन से चार लड़कियों ने परगाश राक बैंड तैयार किया था। उन्होंने छोटे-बड़े कुछ कार्यक्रम भी किए, लेकिन इससे पहले कि यह बैंड बुलंदिया छू पाता, अलगाववादियों ने इसे इस्लाम के खिलाफ बताते हुए फतवे जारी कर दिए। नतीजा यह हुआ कि श्रीनगर की इन लड़कियों की प्रतिभा उभरने से पहले ही दम तोड़ गई और वर्ष 2013 में यह राक बैंड बंद कर दिया गया। अब अनुच्छेद 370 और 35ए हटने के बाद नए कश्मीर का उदय हो चुका है। पूरी उम्मीद है कि 'यमबरजल ग्रुप' का हश्र परगाश राक बैंड जैसा नहीं होगा।

Edited By Arun Kumar Singh

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