तालिबान को मान्यता न मिलने पर तिलमिलाया पाक, वेट एंड वाच की नीति को बताया खतरनाक

तालिबान को मान्यता देने पर कई देशों ने वेट एंड वाच नीति अपनाई है। वैश्विक नेताओं का कहना है कि पहले वे देखेंगे कि तालिबान अपने शासन में मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किए गए अपने वादों को पूरा करता है या नहीं।

Manish PandeyThu, 16 Sep 2021 02:21 PM (IST)
पाक एनएसए ने अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मान्यता देने पर 'वेट एंड वाच' नीति की आलोचना की

इस्लामाबाद, पीटीआइ। अफगानिस्तान में तालिबान के शासन को दुनिया से अभी तक मान्यता नहीं मिलने पर पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ ने कहा है कि तालिबान शासन को मान्यता देने की 'वेट एंड वाच' नीति पूरी तरह से गलत है और इसके परिणामस्वरूप संघर्षग्रस्त देश का आर्थिक पतन हो सकता है।

अगस्त के मध्य में तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित अशरफ गनी सरकार को हटा दिया था। तालिबान द्वारा घोषित अंतरिम मंत्रिमंडल में विद्रोही समूह के हाई-प्रोफाइल सदस्य शामिल हैं। तालिबान को मान्यता देने पर कई देशों ने वेट एंड वाच नीति अपनाई है। वैश्विक नेताओं का कहना है कि पहले वे देखेंगे कि तालिबान अपने शासन में मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से किए गए अपने वादों को पूरा करता है या नहीं।

यूसुफ ने बुधवार को कहा कि अफगानिस्तान पर वेट एंड वाच का मतलब पतन है। उन्होंने कहा कि इसी तरह की गलती 1990 के दशक में की गई थी। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पश्चिमी नेताओं ने उस दौरान अपनी गलती स्वीकार की थी और इसे नहीं दोहराने का संकल्प लिया था। यूसुफ ने कहा कि दुनिया को अपनी चिंताओं पर सीधे तालिबान से बात करनी चाहिए, जिसमें आतंकवाद, मानवाधिकार, समावेशी सरकार या अन्य मुद्दे शामिल हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अफगानिस्तान को फिर अकेला छोड़ा गया तो इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। हो सकता है कि वह फिर से एक आतंकवाद के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन जाए। आप पहले से ही जानते हैं कि आइएसआइएस (आतंकवादी इस्लामिक स्टेट समूह) वहां पहले से मौजूद है, पाकिस्तानी तालिबान वहां है, अल कायदा वहां है।

इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान ने अपने खुफिया प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को काबुल भेजा था। इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) के महानिदेशक के नेतृत्व में वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल नई सरकार के गठन पर तालिबान के साथ चर्चा करने के लिए काबुल में रुका था, जिसमें खूंखार हक्कानी नेटवर्क के कई शीर्ष नेता शामिल थे।

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