पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था, आइएमएफ ने किया आगाह, जानें क्‍या कहा

हथियार के बल पर सत्ता हथियाने वाले तालिबान के राज में अफगानिस्तान की बुरी तरह चरमरा चुकी है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बद से बदतर हो चुकी है और समय दूर नहीं जब वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।

Krishna Bihari SinghSun, 28 Nov 2021 04:18 PM (IST)
हथियार के बल पर सत्ता हथियाने वाले तालिबान के राज में अफगानिस्तान की बुरी तरह चरमरा चुकी है।

काबुल, एएनआइ। हथियार के बल पर तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन उसके लिए दुनिया के आर्थिक दरवाजे बंद हो गए। इसका प्रतिकूल असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा, जो अब बुरी तरह चरमरा चुकी है। एशिया टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बद से बदतर हो चुकी है और समय दूर नहीं जब वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाए।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में साल दर साल 30 फीसद या उससे ज्यादा की गिरावट आ सकती है और इसकी वजह से देश में भुखमरी के भयंकर हालात पैदा हो सकते हैं। अफगानिस्तान को वित्तीय सहायता देने वाली एजेंसियों ने अगस्त में ही मौजूदा हालात की चेतावनी दे दी थी, क्योंकि अमेरिका व उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के देशों ने अपने सैनिकों की वापसी का एलान किया था।

तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तब अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद हक्कानी नेटवर्क ने गृह समेत ज्यादातर शक्तिशाली मंत्रालयों को नियंत्रण में ले लिया। इसके कारण तालिबान सरकार के लिए विदेशी मदद के द्वार खुद ही बंद हो गए। एशिया टाइम्स के अनुसार, आइएमएफ, विश्व बैंक, यूरोपीय यूनियन, अमेरिका व अन्य विदेशी फंडिंग एजेंसियों ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगा दी।

अमेरिका ने अपने बैंकों और वित्तीय संस्थानों में जमा अफगानिस्तान की 9.5 अरब डालर की राशि से प्रतिबंध हटाने से भी इन्कार कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अफगानिस्तान की बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी दी थी कि अफगानिस्तान के किसानों और पशुपालकों के ऊपर तबाही और भुखमरी की तलवार लटकी हुई है। शीत ऋतु की शुरुआत के साथ ही उनकी स्थिति और बदतर होती जा रही है। जरूरी सामानों की आसमान छूती कीमतें लोगों की पहुंच से दूर जा रही हैं। किसानों की फसलें तबाह हो चुकी हैं जिसके चलते वे अपने पशुओं को बेचने पर मजबूर हैं।

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