नेपाल की राष्‍ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- सर्वोच्‍च न्‍यायालय नहीं पलट सकता है मेरा फैसला

नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रतिनिधिसभा को संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक ही भंग किया गया है। उन्‍होंने यह भी कहा कि सर्वोच्‍च न्यायालय इस मामले में उनके फैसले को पलट नहीं सकता है।

Krishna Bihari SinghFri, 18 Jun 2021 04:54 PM (IST)
नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने कहा कि प्रतिनिधिसभा को संवैधानिक प्रावधानों के तहत भंग किया गया है।

काठमांडू, पीटीआइ। नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रतिनिधिसभा को संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक ही भंग किया गया है। उन्‍होंने यह भी कहा कि सर्वोच्‍च न्यायालय इस मामले में उनके फैसले को पलट नहीं सकता है ता तो उनके आदेश की न्यायिक समीक्षा ही कर सकता है।  

उल्‍लेखनीय है कि राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) ने 22 मई को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सिफारिश पर पांच महीने में दूसरी बार प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया था। साथ ही 12 और 19 नवंबर को मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की थी। मौजूदा वक्‍त में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत हारने के बाद अल्पमत सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं।

काठमांडू पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष अग्नि सपकोटा ने सरकार के 21 मई के फैसले के बारे में सुप्रीम कोर्ट में लिखित बयान दाखिल किए हैं। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने बीते नौ जून को इनसे लिखित स्पष्टीकरण देने को कहा था।

सुप्रीम कोर्ट को दिए स्‍पष्‍टीकरण में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने फैसलों का बचाव किया है। वहीं प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष ने इसको असंवैधानिक कदम बताया है। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति के फैसले की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है।

राष्ट्रपति की ओर से स्पष्टीकरण में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद-76 के तहत राष्ट्रपति का कोई भी कदम याचिका का विषय नहीं बन सकता है। यह न्यायिक समीक्षा का मसला भी नहीं बन सकता है। इसके साथ ही राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति को पारितोषिक एवं लाभ अधिनियम 2017 के अनुच्छेद-16 का हवाला दिया गया। इसमें प्रविधान है कि राष्ट्रपति के किसी भी कदम को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

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