जानें, अफगानिस्‍तान में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व पर क्‍यों बढ़ी भारत की चिंता, क्‍या है पाक की दोहरी चाल

अफगानिस्‍तान में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व को देखते हुए भारत की चिंता बढ़ गई है। भारत को इस बात का भय सता रहा है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्‍तान में भारत की चल रही परियोजनाओं पर संकट आ सकता है।

Ramesh MishraWed, 23 Jun 2021 03:43 PM (IST)
अफगानिस्‍तान में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व पर क्‍यों बढ़ी भारत की चिंता। फाइल फोटो।

नई दिल्‍ली/काबुल, एजेंसी। अफगानिस्‍तान में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व को देखते हुए भारत की चिंता बढ़ गई है। भारत को इस बात का भय सता रहा है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्‍तान में भारत की चल रही परियोजनाओं पर संकट आ सकता है। खास बात यह है कि पूर्व में जब तालिबान ने अफगानिस्तान में सत्ता हथियाई थी तो भारत को काफी नुकसान हुआ था। वहां 550 छोटी-बड़ी परियोजनाओं में भारत तीन अरब डॉलर से ज्यादा राशि लगा चुका है। अफगानिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए और उसे अंतरराष्ट्रीय कारोबार में स्थापित करने के लिए भी भारत ने काफी कुछ किया है। दूसरी तरफ पाकिस्तान समर्थन वाले तालिबान के आने से इन सभी परियोजनाओं पर पानी फिर सकता है। पाकिस्तान तालिबान का इस्तेमाल कर भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है।

देश के 50 से ज्यादा जिलों पर तालिबान का कब्जा

अफगानिस्तान में तालिबान के आतंकियों ने मई के बाद से अब तक देश के 50 से ज्यादा जिलों पर कब्जा कर लिया है। देश से अमेरिकी सेना की वापसी कि घोषणा के बाद से तालिबान का आतंक एक बार फिर से बढ़ने लगा है। अफगानिस्‍तान के जिन जिलों को प्रांतीय राजधानियों से तालिबान को खदेड़ा गया था, उन्हें तालिबान फिर से वापस लेने की कोशिश कर रहा है। वह बस इस इंतजार में है कि, एक बार विदेशी सेना पूरी तरह से वापस चली जाएं। बता दें कि अफगानिस्तान में 20 सालों तक चले युद्ध के बाद अब अमेरिका ने अपने सैनिक वापस बुलाने शुरू कर दिए हैं, जो की 11 सितंबर तक देश से पूरी तरह से बाहर हो जाएंगे। वहीं नाटो देशों के लगभग सात हजार गैर-अमेरिकी कर्मचारी, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जॉर्जिया के लोग शामिल हैं। वह भी तय तारीख तक अफगानिस्तान से बाहर जाने की योजना बना रहे हैं।

पाकिस्तान ने तालिबान की तरफदारी की

हालांकि उधर, पाकिस्तान का रवैया पूरी तरह से बदला दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अफगानिस्तान में जारी हिंसा के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहराने से साफ इन्कार कर दिया है, जबकि स्वयं तालिबान की तरफ से कई शहरों में अफगानिस्तान के सैनिकों पर हमला करने की जम्मेदारी ली जा रही है। मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान के हालात पर एक खास चर्चा में पाकिस्‍तान ने तालिबान संगठन की तरफदारी किया। सनद रहे कि इस बैठक में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मुहम्मद हनीफ अतमार ने भी यही मांग रखी है कि यूएनएससी की अगुआई में सीजफायर की घोषणा हो।

संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत ने रखा पक्ष

विदेश मंत्री जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए वहां आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले संगठनों के सुरक्षित ठिकानों को शीघ्रता से ध्वस्त करना बेहद जरूरी है। सीमा पार से आतंक को बढ़ावा देने वाले समेत हर तरह के आतंक को लेकर जीरो-टालरेंस की नीति अपनाने की जरूरत है। यह बहुत जरूरी है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी तरह के आतंकी वारदातों के लिए न हो, जो लोग वहां आतंकियों को बढ़ावा देते हैं या उन्हें धन उपलब्ध कराते हैं, उन पर लगाम लगाना भी उतना ही जरूरी है। विदेश मंत्री ने अफगानिस्तान की आर्थिक प्रगति की जरूरत पर जोर दिया और इसके लिए उसे बंदरगाहों तक पहुंच देने की वकालत की और कहा कि अफगानिस्तान को समुद्री मार्ग से जोड़ने में जो बाधाएं खड़ी की गई हैं उन्हें जल्द से जल्द दूर किया जाना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि अफगानिस्तान को सामान की आपूर्ति करने की गारंटी होनी चाहिए। जयशंकर ने यह मुद्दा भी पाकिस्तान के संदर्भ में ही उठाया जिसने भारत से अफगानिस्तान को सड़क मार्ग से वस्तु पहुंचाने में कई तरह की बाधाएं खड़ी कर दी हैं। पाकिस्तान की वजह से भारत अफगानिस्तान तक माल पहुंचाने में ईरान के चाबहार पोर्ट का इस्तेमाल करता है।

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