ट्रंप-पुतिन की दोस्‍ती के क्‍या हैं गहरे राज, जानें- इसमें क्‍या है ट्राइएंगल का फैक्‍टर

वाशिंगटन [ एजेंसी ]। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बनने के बाद ही डोनाल्‍ड ट्रंप पर रूस से सांठगांठ करने का आरोप लगता रहा है। दोनों नेताओं की अकेले में हुई पिछली पांच मुलाकातों के यह शक और गहरा गया है। एक बार फ‍िर रूसी राष्‍ट्रपति ब्‍लादिमीर पुतिन के साथ ट्रंप के संबंधों को लेकर सवालों के घेरे में हैं। भले ही इन दोनों नेताओं की मुलाकात पर अमेरिका में सियासत गरमा गई है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति की पुतिन से मुलाकात को शक की नजरों से देखा जा रहा है। लेकिन इन मुलाकातों का एक उजला पक्ष भी है। आइए हम आपको बताते हैं उन अनछुए पहलुओं के बारे में।

गोपनीय मुलाकात से विपक्ष ने ट्रंप को घेरा

ट्रंप ने सबसे पहले जर्मनी में पुतिन से मुलाकात की थी। वार्ता के बाद उन्‍होंने अनुवादक को कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं करने को कहा था। उसी दिन दोनों नेता डिनर भी मिले थे। यहां कोई भी अन्‍य अमेरिकी अधिकारी मौजूद नहीं था। इसके बाद वियतनाम व फ‍िनलैंड में हुई बैठक में भी यही स्थिति थी। दोनों नेता यहां एक दूसरे से मिले, लेकिन यहां कोई भी अमेरिकी अधिकारी मौजूद नहीं रहा। इसके बाद ट्रंप अर्जेंटीना में पुतिन से मिले थे। तब रूस को आक्रामक बताते हुए उन्‍होंने पुतिन से दुबारा ना मिलने की बात कही थी।

दोनों नेताओं की इन गोपनिय मुलाकातों ने 2016 के राष्‍ट्रपति चुनाव में रूस व ट्रंप के बीच गठजोड़ के अारोपों की जांच कर रहे राबर्ट मूलर का ध्‍यान खींचा है। ट्रंप प्रशासन व पार्टी के भी कई लोग उन पर शक कर रहे हैं। पूर्व राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन के सलाहकार रह चुके एंड्रयू एस वीस ने कहा, पुतिन के साथ मुलाकात के दौरान ट्रंप किसी भी मंत्रालय या ह्वाइट हाउस के अधिकारियों की उपस्थिति नहीं चाहते थे। उन्‍होंने कहा कि इसका मतलब है कि वह देशहित की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि बहुत कुछ गड़बड़ चल रहा था। हाल ही में सामने आया था कि ट्रंप और रूस के संबंधों को लेकर संघीय जांच एजेंसी (एफबीआइ) भी जांच कर रही है। हालांकि ट्रंप हमेशा से ही इन आरोपों को बेबुनियाद और इनकार करते आए हैं।

शक्ति संतुलन साधने की रणनीति में जुटे ट्रंप

पुतिन के बढ़ते प्रभाव का असर : नाटो के सबसे शक्तिसाली देश जर्मनी से पुतिन की नजदकियां अमेरिका को कभी रास नहीं आईं। नाटो में आर्थिक रूप से सबसे मजबूत देश जर्मनी पर पुतिन का खासा प्रभाव है।  इसके साथ ही यूरोपियन यूनियन में मौजूद अमेरिका के पुराने सहयोगियों पर भी पुतिन का वर्चस्‍व बढ़ रहा है। नाटो के आर्थिक रूप से सबसे ताकतवर देश जर्मनी पर पुतिन का खासा प्रभाव है। इसलिए ट्रंप बड़ी चतुराई से पुतिन को साधने में लगे हैं। इसके अलावा अगर अमेरिकी राष्‍ट्रपति, पुतिन को साथ लेकर नहीं चलते, तो इससे अंतरराष्‍ट्रीय शक्ति संतुलन रूस के पास चला जाएगा।

भारत-रूस-चीन फैक्‍टर पर अमेरिकी नजर : अप्रैल, 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शी जिनपिंग और पुतिन से अनौपचारिक मुलाकात हुई थी। इससे मॉस्को, बीजिंग और नई दिल्ली का ट्राइएंगल कुछ मजबूत हुआ था। इससे अमेरिका परेशान है। ट्रंप किसी भी हाल में रूस से टकराव नहीं चाहते, क्योंकि पुतिन ने उन्हें चुनाव जिताने में मदद की थी। उनका मकसद ट्राइएंगल से रूस को अलग करना है। ट्रंप का मानना है कि अगर इन तीन देशों का गुट मजबूत हुआ तो उनके लिए चुनौती बन जाएगा और यूरेशिया से दक्षिण एशिया तक उनके लिए दीवार खड़ी हो जाएगी।

पूर्वी देशों बढ़ता रूसी दखल : पुतिन का पूर्वी देशों में दिलचस्‍पी और उनके मामलों में दखल से अमेरिका चिंतित है। पुतिन की पिवट टू एशिया (एशिया की ओर) नाम की नीति बनाई। इस नीति के जरिए रूस, जापान के पक्ष वाले पूर्वी एशिया के देशों की ओर अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करना चाहता है ताकि वह चीन से संतुलन कायम कर सके। हाल ही में चीन और रूस ने रणनीति बनाकर अमेरिका-उत्तर कोरिया की वार्ता कराई। यहां भी रूसी प्रभावी नजर आ रहा है। ऐसे में अमेरिका उसे अपने पाले में करना चाहता है।

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