बिना चीर-फाड़ के होगी ब्रेन सर्जरी, मिर्गी जैसे रोगों का इलाज होगा आसान, वैज्ञानिकों ने विकसित किया सुरक्षित तरीका

यूनिवर्सिटी आफ वर्जीनिया स्कूल आफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सुरक्षित तरीका विकसित किया है जिससे बिना चीर-फाड़ के ही ब्रेन से खराब सर्किट को हटाया जा सकेगा। इससे डाक्टर बिना चीर-फाड़ वाली सर्जरी के तंत्रिका संबंधी कई बीमारियों का इलाज कर सकेंगे।

Krishna Bihari SinghSat, 04 Dec 2021 08:30 PM (IST)
शोधकर्ताओं ने एक ऐसा तरीका विकसित किया है जिससे बिना चीर-फाड़ के ब्रेन से खराब सर्किट को हटाया जा सकेगा।

वर्जीनिया (अमेरिका)। ब्रेन की सर्जरी काफी जोखिम वाली मानी जाती है। इसलिए लोग उससे बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन यूनिवर्सिटी आफ वर्जीनिया स्कूल आफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सुरक्षित तरीका विकसित किया है, जिससे बिना चीर-फाड़ के ही ब्रेन से खराब सर्किट को हटाया जा सकेगा। इससे डाक्टर बिना चीर-फाड़ वाली सर्जरी के तंत्रिका संबंधी कई बीमारियों का इलाज कर सकेंगे। यह शोध 'जर्नल आफ न्यूरोसर्जरी' में प्रकाशित हुआ है।

इलाज में क्रांतिकारी उपलब्धि

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उनके द्वारा विकसित इस पद्धति को यदि आपरेशन रूम में सफलतापूर्वक अपनाया जा सका तो यह तंत्रिकाओं से जुड़ी जटिल बीमारियों के इलाज में क्रांतिकारी उपलब्धि होगी। इससे मिर्गी और मूवमेंट डिसआर्डर समेत कई अन्य बीमारियों का इलाज आसान हो जाएगा।

क्या है नई पद्धति

इस नई पद्धति में माइक्रोबबल्स के साथ कम तीव्रता वाले अल्ट्रासाउंड वेव का इस्तेमाल किया गया है। यह थोड़े समय के लिए ब्रेन की प्राकृतिक सुरक्षा को भेदता है, जिससे कि न्यूरोटाक्सिन को लक्षित स्थान तक पहुंचाया जा सकता है। यह न्यूरोटाक्सिन खराब या रोगी ब्रेन सेल्स को मारता है। इस प्रक्रिया में न तो स्वस्थ कोशिकाओं को और न ही ब्रेन की संरचना को कोई नुकसान पहुंचता है।

बिना चीर-फाड़ के बीमार कोशिकाएं की जा सकेंगी खत्‍म

यूनिवर्सिटी आफ वर्जीनिया के न्यूरोसाइंस एंड न्यूरोसर्जरी विभाग के शोधकर्ता केविन एस. ली ने बताया कि सर्जरी की इस नई रणनीति में न्यूरोलाजिकल रोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली मौजूदा न्यूरोसर्जिकल प्रक्रियाओं को बदलने की क्षमता है, खासकर उन मामलों में जब दवा का असर नहीं होता है। ली ने बताया कि इस नए तरीके से खोपड़ी की चीर-फाड़ किए बिना ही मस्तिष्क की बीमार कोशिकाओं को खत्म किया जा सक ता है। इसमें आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान भी नहीं होता है।

यह दिया गया नाम 

इस नई पद्धति को पीआइएनजी (पिंग) नाम दिया गया है और प्रयोगशाला अध्ययन में इसकी क्षमता और दक्षता प्रदर्शित की जा चुकी है। इसका इस्तेमाल मिर्गी के उन मामलों में किया जा सकता है, जब कि दवाओं का असर नहीं होता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, मिर्गी के लगभग एक तिहाई रोगियों में एंटी सीज्यूर ड्रग का असर नहीं होता है और उनमें से कुछेक में सर्जरी के जरिये सीज्यूर को कम या खत्म किया जाता सकता है।

मिर्गी के इलाज के लिए कारगर

ली और उनके सहयोगियों की टीम मिर्गी के दो शोध माडलों में यह दर्शाने में कामयाब हुए हैं कि पिंग से सीज्यूर को कम किया जा सकता है या उसे खत्म किया जा सकता है। इसके निष्कर्ष ने यह संभावना जगाई है कि मिर्गी का इलाज पारंपरिक चीर-फाड़ वाली ब्रेन सर्जरी के बिना लक्षित तरीके से किया जा सकता है। इससे मिर्गी के वैसे रोगी भी इलाज के लिए प्रोत्साहित होंगे, जो पारंपरिक सर्जरी के बचने के लिए इलाज कराने के इच्छुक नहीं होते हैं।

स्‍वस्‍थ कोशिकाएं रहेंगी सुरक्षित

शोध टीम को पिंग के जरिये यह भी दर्शाया है कि इसमें स्थानिक तौर पर न्यूरान सेल्स को खत्म किया जा सकता है और आसपास की गैर-लक्षित कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं, जबकि मौजूदा सर्जरी की पद्धति में उस खास क्षेत्र की सभी कोशिकाओं को नुकसान होता है। इसलिए इस नई पद्धति की खासियत सटीकता है।

एमआरआइ की ली गई मदद

इसमें मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआइ) की मदद ली गई, जिससे कि खोपड़ी के भीतर साउंड वेव को बिल्कुल सटीक तरीके से सही जगह पहुंचाने में मदद मिलती है और जहां जरूरी होती है, वहीं ब्लड-ब्रेन बैरियर की प्राकृतिक सुरक्षा को भेदना संभव हो पाता है। यह बैरियर इस तरह बना होता है, जो नुकसान पहुंचाने वाली कोशिकाओं और मालीक्यूल्स को ब्रेन से बाहर रखता है। लेकिन, इसके साथ ही यह इलाज में भी बाधक बनता है।

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