धरती के लिए घातक संकेत, कार्बन और जलचक्र की क्षमता खो रहे वर्षावन

शोधकर्ताओं ने वर्षावनों की स्थिति का पता लगाने के लिए सेटेलाइट की मदद ली और धरती के प्रत्येक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र की जलवायु और वनस्पति का व्यवस्थित रूप से विश्लेषण किया। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वर्षावन कार्बन और पानी को चक्रित करने की अपनी क्षमता खो रहे हैं।

By Neel RajputEdited By: Publish:Thu, 09 Dec 2021 11:20 AM (IST) Updated:Thu, 09 Dec 2021 11:20 AM (IST)
धरती के लिए घातक संकेत, कार्बन और जलचक्र की क्षमता खो रहे वर्षावन
अमेरिकी विज्ञानियों ने खास संकेतक विकसित कर लगाया पता

डेलावेयर, एएनआइ। पर्यावरण संतुलन बनाए रखने की बात हो या जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने की, जंगल सबसे अहम हैं। विश्वभर में फैले वर्षावन जलवायु परिवर्तन से निपटने के साथ अन्य कई अहम कार्यों में मदद करते हैं। हालांकि, कई वजहों से ये वर्षावन कार्बन और जल चक्र की क्षमता खो रहे हैं, जो धरती के लिए घातक संकेत हैं। यह बात अमेरिकी विज्ञानियों के एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। दरअसल, विज्ञानियों ने एक ऐसा ट्रैकिंग सिस्टम विकसित कर लिया है, जो दुनिया भर के वर्षावनों की निगरानी कर सकता है। उसी के आधार पर विज्ञानियों ने यह चिंताजनक तस्वीर पेश की है।

वन अर्थ नामक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्षों में बताया गया है कि पानी साफ करने, कार्बन अवशोषित करने और वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में वर्षावन अहम योगदान देते हैं। इस प्रकार से ये वन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कुदरती रूप से एक शक्तिशाली घटक होते हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर भूमि-उपयोग में परिवर्तन जैसे कि कृषि योग्य भूमि में विस्तार, पेड़ों की कटाई आदि के कारण कई खतरे उत्पन्न हो रहे हैं।

वर्ष 2019 में डेलावेयर विश्वविद्यालय के रोडिगो वर्गास सहित चुनिंदा विज्ञानियों ने वर्षावनों के खतरों पर चर्चा के लिए वाशिंगटन, डीसी के नेशनल ज्योग्राफिक मुख्यालय में मुलाकात की थी। इस दौरान शोधकर्ताओं ने एक विश्वव्यापी ट्रैकिंग सिस्टम विकसित करने की आवश्यकता को इंगित किया था, जो भूमि क्षरण से लड़ने और संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद करने के रास्ता सुझा सके। अपने शोधपत्र में शोधकर्ताओं ने यूनिक ट्रापिकल रेनफारेस्ट इंडेक्स (उष्णकटिबंधीय वर्षावन सूचकांक, टीएफवीआइ) को प्रस्तुत किया, जो पूरे विश्व में वर्षावनों के लिए आधार रेखा है। इसका लक्ष्य वर्षावनों के लिए बढ़ते खतरों की पहचान करना और उन खतरों को कम करने के लिए उचित तरीकों की तलाश करना है। टीएफवीआइ इस दिशा में लंबे विश्लेषण के आधार पर विस्तृत परिदृश्य प्रस्तुत करता है, जिसकी शुरुआत 1982 में हुई थी।

ईकोसिस्टम ईकोलाजी एंड एनवायरमेंटल चेंज के प्रोफेसर रोडिगो वर्गास के मुताबिक, इस नए सूचकांक की वजह से अब हमारे पास न केवल वैश्विक कवरेज है, बल्कि एकरूपता भी है। इसके जरिये हम वर्षावनों की महत्वपूर्ण जानकारी संक्षेप में प्रस्तुत कर सकते हैं। यह हमें एक बेंचमार्क देता है और साथ ही भविष्य में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी भी प्रदान करता है।

यह आया सामने : शोधकर्ताओं ने वर्षावनों की स्थिति का पता लगाने के लिए सेटेलाइट की मदद ली और धरती के प्रत्येक उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (ट्रापिकल रीजन) की जलवायु और वनस्पति का व्यवस्थित रूप से विश्लेषण किया। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वर्षावन कार्बन और पानी को चक्रित करने की अपनी क्षमता खो रहे हैं। वर्गास के मुताबिक, हम जैव विविधता और कार्बन पूल के लिए प्रमुख आकर्षण के केंद्र खो रहे हैं। ये दुनिया भर में जमीन के छोटे टुकड़ो पर नहीं हैं, ये पृथ्वी की सतह के बड़े हिस्से हैं। अध्ययन के निष्कर्षो से यह भी संकेत मिलता है कि उष्णकटिबंधीय के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं। अफ्रीका के कांगो बेसिन जैसे कुछ क्षेत्र दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक लचीले हैं। अमेजन बेसिन वातावरण के सुखाने की स्थिति, लगातार सूखे और बड़े पैमाने पर भूमि-उपयोग में परिवर्तन के बारे में बताते हैं।

कोई एक समाधान नहीं

अपने इस अध्ययन के आधार पर वर्गास ने चिंता जताते हुए बताया कि इस समस्या से निपटने का कोई एकल समाधान नहीं है। अलग-अलग स्थान के अनुसार वहां इस समस्या का हल तलाशने की जरूरत है। चूंकि अब हमारे पास एक वैश्विक सूचकांक है, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि इस समस्या से निपटने के लिए उचित रणनीति तैयार की जा सकती है।

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