कम नींद से आती है संज्ञान में कमी, जानिए अल्जाइमर्स को लेकर और क्या कहता है ये शोध

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्लीप मेडिसिन सेंटर के निदेशक और न्यूरोलाजी की एसोसिएट प्रोफेसर ब्रेनडेन लूसी ने कहा कि यह स्थापित करना कठिन है कि नींद और अल्जाइमर्स के विभिन्न चरण आपस में कैसे जुड़े हुए हैं लेकिन यह एक-दूसरे को प्रभावित कैसे करते हैं यह स्पष्ट होने लगा है।

Dhyanendra Singh ChauhanThu, 21 Oct 2021 05:54 PM (IST)
मध्यम रेंज या मीठी नींद के उपक्रम में पहचानने की क्षमता लंबे समय तक रहती है स्थिर

वाशिंगटन, एएनआइ। कम नींद और अल्जाइमर्स का गहरा रिश्ता है। इसके कारण संज्ञान में कमी आती है। इन दोनों के एक-दूसरे पर प्रभाव को अलग करना चुनौतीपूर्ण है। बुजुर्गो के बड़े समूहों का कई सालों तक उनकी पहचानने की क्षमता का अध्ययन करने के बाद पाया गया कि वह बुजुर्ग जो कम या लंबी नींद लेते हैं उनमें अल्जाइमर्स के शुरुआती लक्षण देखे जा सकते हैं। जबकि मध्यम नींद लेने वालों में ऐसी कोई परेशानी नहीं होती है और उनकी पहचानने और याद रखने की क्षमता प्रभावित नहीं होती है।

'ब्रेन' में प्रकाशित इस शोध में अल्जाइमर्स से संबंधित प्रोटीनों और नींद के दौरान दिमाग की गतिविधियों को माप कर पता चला कि नींद, अल्जाइमर्स और पहचाननने की क्षमता का आपस में सीधा संबंध है।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्लीप मेडिसिन सेंटर के निदेशक और न्यूरोलाजी की एसोसिएट प्रोफेसर ब्रेनडेन लूसी ने कहा कि यह स्थापित करना कठिन है कि नींद और अल्जाइमर्स के विभिन्न चरण आपस में कैसे जुड़े हुए हैं लेकिन यह एक-दूसरे को प्रभावित कैसे करते हैं यह स्पष्ट होने लगा है।

लूसी ने बताया कि शोध में सुझाव दिया गया है कि मध्यम रेंज या मीठी नींद के उपक्रम में पहचानने की क्षमता लंबे समय तक स्थिर रहती है। पर्याप्त नींद पूरी नहीं होने के कारण हाई रिस्क अल्जाइमर्स के जेनेटिक वैरिएंट एपीओई4 के परीक्षण के लिए खून के नमूने की जांच की जाती है। इससे सालाना नैदानिक उपचार होता है और पहचानने की क्षमता का मूल्यांकन होता है।

आस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं को मिली बड़ी सफलता

वहीं, दूसरी ओर पिछले महीने आस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं को भूलने की बीमारी अल्जाइमर के कारण का पता लगाने में बड़ी सफलता मिली है। उनकी खोज से अल्जाइमर की रोकथाम संभव हो सकेगी। उन्होंने एक ऐसे 'ब्लड टू ब्रेन' मार्ग की पहचान की है, जो अल्जाइमर रोग का संभावित कारण हो सकता है। इससे इस बीमारी की रोकथाम और नए उपचारों के विकास की राह खुल सकती है।

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