दुनिया पर 226 ट्रिलियन डालर का कर्ज, जानिए भारत पर कितना?

आइएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राजकोषीय दृष्टिकोण के लिए जोखिम बढ़ गया है। टीके के उत्पादन और वितरण में वृद्धि विशेष रूप से उभरते बाजारों और कम आय वाले विकासशील देशों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस तरह की दिक्कतें नुकसानदायक हैं।

Nitin AroraThu, 14 Oct 2021 07:56 AM (IST)
दुनिया पर 226 ट्रिलियन डालर का कर्ज, जानिए भारत पर कितना?

वाशिंगटन, प्रेट्र। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने बुधवार को कहा कि वैश्विक कर्ज 226 ट्रिलियन डालर के उच्चस्तर पर पहुंच गया है। भारत का कर्ज 2016 में उसके सकल घरेलू उत्पाद के 68.9 प्रतिशत से बढ़कर 2020 में 89.6 प्रतिशत हो गया है। इसके 2021 में 90.6 प्रतिशत और फिर 2022 में घटकर 88.8 प्रतिशत होने का अनुमान है। वहीं, 2026 में 85.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। वैश्विक ऋण की भरपाई के लिए चीन ने 90 प्रतिशत का योगदान दिया है जबकि शेष उभरती अर्थव्यवस्थाओं और कम आय वाले विकासशील देशों ने लगभग सात प्रतिशत का योगदान दिया। आइएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राजकोषीय दृष्टिकोण के लिए जोखिम बढ़ गया है। टीके के उत्पादन और वितरण में वृद्धि, विशेष रूप से उभरते बाजारों और कम आय वाले विकासशील देशों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस तरह की दिक्कतें नुकसानदायक हैं।

वहीं, भारत के संदर्भ में आइएमएफ ने कहा कि भारत इस वित्त वर्ष (Fy 2021-22) में 9.5 फीसदी और अगले वित्त वर्ष में 8.5 फीसदी की वृद्धि दर के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। भारत के जुलाई में किए गए सकल घरेलू उत्पाद विकास के अनुमानों को सामने रखा गया, जिसकी कोविड-पस्त अर्थव्यवस्था पिछले वित्त वर्ष में 7.3 फीसद तक सिकुड़ गई थी।

इसके अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2021 में 5.9 फीसद और 2022 में 4.9 फीसद बढ़ने का अनुमान है – जुलाई के पूवार्नुमान की तुलना में 2021 के लिए 0.1 फीसद कम। आईएमएफ की मुख्य आर्थिक विशेषज्ञ गीता गोपीनाथ ने डब्ल्यूईओ(IMF World Economic Outlook) को भेजे अपने प्रस्ताव में कहा, 'वैश्विक सुधार जारी है, लेकिन महामारी की वजह से गति कमजोर हो गई है।' उन्होंने कहा कि अत्यधिक पारगम्य डेल्टा वेरिएंट के कारण रिकार्ड किए गए वैश्विक कोविड-19 की मौत का आंकड़ा 50 लाख के करीब पहुंच गया है और स्वास्थ्य जोखिम बना हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुल मिलाकर, आर्थिक संभावनाओं के लिए जोखिम बढ़ गए हैं और नीतिगत व्यापार अधिक जटिल हो गए हैं।

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