स्तनपान कराने से बढ़ती है महिलाओं की दिमागी तंदुरुस्ती, कई बीमारियों का खतरा भी हो जाता है कम

अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका हेलेन लावरेत्स्की ने बताया कि हम जानते हैं कि स्तनपान कराने से टाइप 2 डायबिटीज तथा हार्ट डिजीज जैसे रोगों का खतरा कम होता है और ये बीमारियां अल्जाइमर के उच्चतर जोखिम से जुड़ी हुई हैं।

Neel RajputMon, 25 Oct 2021 02:12 PM (IST)
50 साल की उम्र के बाद भी संज्ञानात्मक प्रदर्शन बना रहता है बेहतर

वाशिंगटन, एएनआइ। स्तनपान से बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक असर के बारे में कई अलग-अलग शोध हुए हैं। अब यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया, लास एंजिलिस (यूसीएलए) के शोधकर्ताओं ने एक नए शोध में बताया है कि जो महिलाएं अपने बच्चों को स्तनपान कराती हैं, उनकी दिमागी तंदुरुस्ती 50 साल की उम्र के बाद भी उन महिलाओं से बेहतर रहती है, जो अपने बच्चों को बिल्कुल भी स्तनपान नहीं कराती हैं। स्तनपान कराने वाली महिलाओं का संज्ञानात्मक स्तर ज्यादा होता है।

यह शोध निष्कर्ष इवोल्यूशन, मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि स्तनपान कराने से रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं का संज्ञानात्मक प्रदर्शन उम्दा रहता है तथा उनके मस्तिष्क को दीर्घावधिक फायदा होता है।

यूसीएलए में मानव विज्ञान तथा व्यावहारिक मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर व इस शोध की लेखिका मौली फाक्स ने बताया कि कई सारे शोधों में पाया गया है कि स्तनपान कराने से लंबे समय तक बच्चों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर होता है, लेकिन हमारा शोध उन कुछेक में से एक है, जिसमें स्तनपान कराने से महिलाओं को होने वाले फायदे के बारे अध्ययन किया गया है। स्तनपान कराना बाद की जिंदगी में न्यूरोप्रोटेक्टिव (तंत्रिका संरक्षी) साबित होता है। संज्ञानात्मक स्वास्थ्य अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसे रोगों का संकेतक माना जाता है।

अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका हेलेन लावरेत्स्की ने बताया कि हम जानते हैं कि स्तनपान कराने से टाइप 2 डायबिटीज तथा हार्ट डिजीज जैसे रोगों का खतरा कम होता है और ये बीमारियां अल्जाइमर के उच्चतर जोखिम से जुड़ी हुई हैं।

फाक्स के मुताबिक, चूंकि स्तनपान कराने से बच्चों के साथ भावनात्मक बंधन मजबूत होता है और प्रसवोत्तर तनाव या अवसाद का जोखिम भी कम होता है, इसलिए उसका न्यूरोकाग्निटिव फायदा भी मिलता है, जिससे लंबे समय तक माताओं का संज्ञानात्मक प्रदर्शन बेहतर रहता है।

शोध का स्वरूप

अध्ययन के लिए चयनित 115 महिलाओं में से 64 को अवसादग्रस्त तथा 51 को सामान्य या गैर अवसादग्रस्त पाया गया। इन सभी प्रतिभागियों का लर्निग, विलंबित याददाश्त, एग्जीक्यूटिव फंक्शनिंग और प्रोसेसिंग स्पीड को मापने के लिए व्यापक मनोवैज्ञानिक जांच की गई। उनसे प्रजनन संबंधी पृष्ठभूमि की जानकारी लेने के लिए कई सवालों वाली प्रश्नावली भरवाई गई। उसमें कितनी उम्र में मासिक धर्म शुरू हुआ, कितने बार गर्भधारण किया, प्रत्येक बच्चे को कितने समय तक स्तनपान कराया और कितनी उम्र में रजोनिवृत्ति हुई- जैसे सवालों के जवाब से आंकड़े जुटाए गए।

आंकड़ा विश्लेषण का निष्कर्ष

प्रश्नावली से जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया 65 प्रतिशत गैर-अवसादग्रस्त महिलाओं ने स्तनपान कराया था। जबकि अवसादग्रस्त महिलाओं में 44 प्रतिशत ने ही स्तनपान कराया था। सभी गैर अवसादग्रस्त महिलाओं ने कम से एक प्रेग्नेंसी पूरी की थी, जबकि अवसादग्रस्त महिलाओं में यह आंकड़ा महज 57.8 प्रतिशत ही था।

इसके अलावा संज्ञानात्मक जांच (काग्निटिव टेस्ट) में यह भी सामने आया कि गैर अवसादग्रस्त या अवसादग्रस्त- दोनों ही समूहों की महिलाओं में जिन्होंने अपने बच्चों को स्तनपान कराया था, उनका प्रदर्शन लर्निग, विलंबित याददाश्त, एग्जीक्यूटिव फंक्शनिंग और सूचनाओं की प्रोसेसिंग स्पीड- जैसे मानकों पर बेहतर था।

एक अन्य विश्लेषण से यह निष्कर्ष भी निकला कि जिन गैर अवसादग्रस्त महिलाओं का प्रदर्शन काग्निटिव टेस्ट के चारों मानकों में बेहतर था, उन सभी का स्तनपान कराने से उल्लेखनीय संबंध था। जबकि अवसादग्रस्त महिलाओं में सिर्फ एग्जीक्यूटिव फंक्शनिंग और प्रोसेसिंग स्पीड का जुड़ाव स्तनपान कराने से था। इतना ही नहीं, यह भी पाया गया कि जिन महिलाओं ने ज्यादा समय (12 महीने से अधिक) तक स्तनपान कराया उनका संज्ञानात्मक प्रदर्शन बेहतर था।

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