बेहद नाजुक दौर में सुरक्षा परिषद में शामिल हो रहा भारत, मतभेदों को दरकिनार करने की बताई जरूरत

संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदत के स्थायी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद में भारत की आगामी अध्यक्षता को लेकर कहा कि स्वतंत्र विदेश नीति वाले भारत जैसे विशाल देश का सुरक्षा परिषद में स्वागत हो रहा है ...

Krishna Bihari SinghSun, 25 Jul 2021 03:58 PM (IST)
यूएन में भारत के राजदूत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि भारत जिम्मेदारियां उठाने से नहीं घबराता है।

संयुक्त राष्ट्र, पीटीआइ। संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदत के स्थायी प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद में भारत की आगामी अध्यक्षता को लेकर कहा कि स्वतंत्र विदेश नीति वाले भारत जैसे विशाल देश का सुरक्षा परिषद में स्वागत हो रहा है। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों के बीच की खाई को पाटते हुए बेहतर संतुलन बनाए जाने की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि भारत जिम्मेदारियां उठाने से नहीं घबराता है। सुरक्षा परिषद के वीटो पावर वाले पांच स्थायी देशों (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका) के बीच आपसी तनावों और दरारों को कम करना होगा।

भारत को एक अगस्त को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी अध्यक्षता हासिल होगी। 15 देशों के संयुक्त राष्ट्र के संगठन में अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत की वर्ष 2021-22 के दौरान पहली अध्यक्षता है। दो साल के कार्यकाल में अगले साल दिसंबर में फिर भारत सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करेगा।

तिरुमूर्ति ने एक इंटरव्यू में कहा कि हम बहुत ही नाजुक दौर में सुरक्षा परिषद में शामिल हो रहे हैं। जब हम नासिर्फ वैश्विक महामारी कोविड-19 की विसंगतियों से जूझ रहे हैं, बल्कि सुरक्षा परिषद के अंदर और बाहर भी कई दरारों और रुकावटों का सामना कर रहे हैं। एकजुट होकर बड़े कदम उठाने होंगे ताकि इन दूरियों को कम किया जा सके। भारत इन खाइयों को पाटने के लिए पुल का काम करेगा। टीएस तिरुमूर्ति से पूछा गया था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों के बीच भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान कैसे मतभेदों और विभाजनों को दूर करेगा।

तिरुमूर्ति ने कहा कि म्यांमार और अफगानिस्तान में जारी गृह युद्ध को देखते हुए सुरक्षा परिषद गहन वार्ता के जरिये संवेदनशील मसलों को हल करेगी। तालिबान प्रतिबंध समिति की अध्यक्षता करते हुए भारत अपनी अहम भूमिका जारी रखेगा और लीबिया प्रतिबंध समिति के जरिये भी वहां की कलह को सुलझाने का प्रयास करेगा। अफ्रीका के मामले में भी भारत उसकी वरीयताओं को लेकर संवेदनशील रहेगा। स्थायी सदस्यों की ओर से उसे अवास्तविक लक्ष्य देने के बजाय उसकी उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश होगी।

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