इतिहास के पन्नों पर यूं दर्ज होते चले गए कत्ले-आम के किस्से, बंगाल को विरासत में मिली है खूनी सियासत

हुगली, उत्तर 24 परगना, बीरभूम और मुर्शिदाबाद सर्वाधिक हिंसा प्रभावित जिले

बंगाल में चुनाव ने दस्तक दे दी है। यहां वोट की स्याही के साथ ही जमीन पर खून के छींटे भी गिरते आए हैं। दरअसल बंगाल को खूनी सियासत विरासत में मिली है। 1959 के खाद्य आंदोलन से शुरू हुआ सियासी हिंसा का दौर छह दशक बाद भी जारी है।

Vijay KumarThu, 04 Mar 2021 10:06 PM (IST)

विशाल श्रेष्ठ, कोलकाता : बंगाल में चुनाव ने दस्तक दे दी है। हर आम व खास को पता है कि यहां वोट की स्याही के साथ ही जमीन पर खून के छींटे भी गिरेंगे, गिरते आए हैं। दरअसल, बंगाल को खूनी सियासत विरासत में मिली है। 1959 के खाद्य आंदोलन से शुरू हुआ सियासी हिंसा का दौर छह दशक बाद भी बदस्तूर जारी है। बदला है तो बस सत्ता परिवर्तन के साथ इसका स्वरूप और उद्देश्य।

ऐतिहासिक खाद्य आंदोलन के दौरान 80 लोगों का कत्ल, 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय सैकड़ों हत्याएं,  70 के दशक में फारवर्ड ब्लॉक नेता हेमंत बसु व अजीत कुमार विश्वास की नृशंस हत्या, 1979 में 'मरीचझापी द्वीप नरसंहार, 1990 में तत्कालीन कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी पर कोलकाता की सड़क पर माकपा समर्थकों का जानलेवा हमला, 1996 में ममता के नेतृत्व में राज्य सचिवालय राइटर्स अभियान के दौरान पुलिस फायरिंग में युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत, 2007 में नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की मौत...इतिहास के पन्नों पर न जाने ऐसे कितने काले अध्याय दर्ज हैं।

बंगाल में सियासी संघर्ष व राजनीतिक हत्याओं की बहुत लंबी फेहरिस्त है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने अपने 2019 के आंकड़ों में बंगाल को सियासी हिंसा के मामलों में शीर्ष पर यूं ही नहीं बताया था।

माकपा कार्यकर्ताओं के हमले में बुरी तरह जख्मी तत्कालीन कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी की फाइल फोटो।

आखिर क्या है बंगाल में सियासी हिंसा की वजह

बंगाल की सत्ता पर बैठने वाले के चेहरे और पार्टी का झंडा तो बदले लेकिन यहां का सियासी रक्तचरित्र नहीं बदला। आखिर बंगाल में इतनी सियासी हिंसा की वजह क्या है? सूबे की सियासत के जानकार प्रभात पांडेय कहते हैं कि बंगाल ने हिंसा का बेहद लंबा और अलग-अलग दौर देखा है। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में सियासी हिंसा की जद में सत्ता पक्ष की विपक्ष की आवाज को निर्ममता से दबाने की रणनीति थी। फिर वाममोर्चा के उत्थान के बाद राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इसका कारण बनी। 34 वर्षों के वामो शासन के अंत के बाद जब सूबे में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी तो सियासी वर्चस्व बरकरार रखने को लेकर खून-खराबा शुरू हो गया। अब सिंडिकेट राज इसकी जड़ है। सिंडिकेट चलाने के लिए इलाकों पर आधिपत्य की मानसिकता तेजी से पनपी, जिससे सत्ताधारी दल में गुटबाजी भी बढ़ी।

राजनीतिक विश्लेषक कंचन चंद्र ने कहा कि किसी पेशे में शुरुआती स्तर पर होने वाले फायदे की तुलना राजनीति में शुरुआती स्तर पर निर्वाचित पदों पर होने वाली आय बहुत ज्यादा है। विभिन्न विकास परियोजनाओं और केंद्रीय परियोजनाओं के मद में सालाना आवंटित हजारों करोड़ की रकम से मिलने वाले मोटे कमीशन के लालच ने राजनीति को आकर्षक पेशा बना दिया है। यही वजह है कि इसमें साम-दाम-दंड-भेद सबका सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में राजनीतिक हिंसा ही सबसे धारदार व असरदार हथियार साबित हो रही है।

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि राजनीतिक हिंसा के मामले में भले तमाम राजनीतिक दल बेदाग होने का दावा करें लेकिन कोई भी दूध का धुला नहीं है।

इतिहास के पन्नों पर यूं दर्ज होते चले गए कत्ले-आम के किस्से

नंदीग्राम में आंदोलनकारियों पर फायरिंग करती पुलिस की फाइल फोटो।

1959 में खाद्य सुरक्षा को लेकर जब आंदोलन शुरू हुआ था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ये रक्त की आहुतियां मांगेगा। खाद्य आंदोलन में 80 लोगों की जानें चली गईं। इसे वामपंथियों ने कांग्रेस की विपक्ष को रौंदकर अपना वर्चस्व कायम करने की कार्रवाई करार दिया था। 1967 में सत्ता पक्ष के खिलाफ नक्सलबाड़ी से शुरू हुए सशस्त्र आंदोलन में भी सैकड़ों जानें गई थीं। 1971 में जब कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रॉय मुख्यमंत्री बने तो बंगाल में राजनीतिक हत्याओं का और भी वीभत्स दौर शुरू हो गया।

कहा जाता है कि 1971 से 1977 तक कांग्रेस ने विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए हिंसा को हथियार बनाया था और यही हिंसा 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पतन और माकपा की अगुआई में वाममोर्चा के उत्थान की वजह बनी लेकिन 1977 में जबर्दस्त बहुमत से सत्ता में आने के बाद वामपंथियों ने भी हिंसा का ही रास्ता अख्तियार किया और अपना सियासी वर्चस्व कायम रखने के लिए हिंसा का 'संगठित तरीके से इस्तेमाल शुरू कर दिया। 1977 से 2011 तक वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासन में भी बंगाल की सियासी फिजां लहूलुहान होती रही। 1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस व माकपाइयों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों पर निर्मम अत्याचार किए, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।

इसे 'मरीचझापी द्वीप नरसंहारÓ के नाम से भी जाना जाता है। इसके बाद अप्रैल, 1982 में कोलकाता के बिजन सेतु के पास 17 आनंदमार्गियों को जिंदा जला दिया गया, जिसका आरोप माकपाइयों पर लगा। 2000 में बीरभूम के नानूर में अल्पसंख्यक समुदाय के 11 कांग्रेस समर्थकों की हत्या कर दी गई। माकपाइयों के खिलाफ आवाज उठाने पर केशपुर और खेजुरी में भी कई हत्याएं हुईं। 2006-07 में नंदीग्राम और सिंगुर में भी बहुत सी हत्याएं हुईं। यह वामपंथी शासन के अंत और तृणमूल के सत्ता के शिखर पर पहुंचने का दौर था।

2009 में झारग्राम के लालगढ़ में माओवादी समॢथत संगठन के माकपा व पुलिस के साथ हुए संघर्ष में एक महीने के अंदर 70 से अधिक लोग मारे गए। 2011 में ममता सरकार सत्ता में आई लेकिन सियासी हिंसा और हत्याओं का दौर बदस्तूर जारी रहा। 2013 और 2018 के पंचायत चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों के क्रमश: 39 और 29 लोग मारे गए।

हुगली, उत्तर 24 परगना, बीरभूम और मुर्शिदाबाद सर्वाधिक हिंसा प्रभावित जिले

हाल के वर्षों में हुगली, उत्तर 24 परगना, बीरभूम और मुर्शिदाबाद सर्वाधिक हिंसा प्रभावित जिले रहे हैं। इन जिलों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, इलाके पर आधिपत्य की मानसिकता चरम पर है। उत्तर 24 परगना जिले में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला बंगाल में सियासी हिंसा के मौजूदा हालात को बयां करता है।  इसी जिले में पिछले साल भाजपा नेता मनीष शुक्ला की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। बीरभूम जिले में तृणमूल-भाजपा में संघर्ष अब आम बात है। यही हाल हुगली व मुर्शिदाबाद जिलों का भी है।

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