West Bengal Assembly Election 2021: यहां सत्ताधारी दल का स्वभाव बन चुका है आयोग का विरोध

केंद्रीय चुनाव आयोग का विरोध करना बंगाल की सत्ताधारी पार्टियों का स्वभाव बन चुका है।

West Bengal Assembly Election 2021 आज से करीब 10 वर्ष पीछे चलते हैं विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाती है और बंगाल में पहली बार चुनाव आयोग पुलिस पर्यवेक्षक तैनात करने की घोषणा की थी। राज्य में कानून-व्यवस्था की जांच के लिए विशेष पर्यवेक्षकों की टीम भेजी थी।

Sanjay PokhriyalWed, 21 Apr 2021 02:50 PM (IST)

जयकृष्ण वाजपेयी, कोलकाता। विधानसभा चुनाव की घोषणा से लेकर पांच चरणों के मतदान संपन्न होने और उसके बाद निर्वाचन आयोग ने जो भी कदम उठाए हैं उसे लेकर जो कुछ हुआ वह अचानक या त्वरित प्रतिक्रिया नहीं है। यदि बंगाल के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा असल में राज्य या केंद्रीय चुनाव आयोग का विरोध करना बंगाल की सत्ताधारी पार्टियों का स्वभाव बन चुका है।

इस विवाद व टकराव की जद में चाहे कुछ भी क्यों न हो, लेकिन पाला बदलते ही विरोध व समर्थन करने वाली सियासी पाíटयों के रंग-रूप बदल जाते हैं। इसे यूं कहें कि विरोधी दल होने पर आयोग बड़े अच्छे लगते हैं और सत्ता मिलते ही सबसे बुरे हो जाते हैं।

पांच चरणों के मतदान से लेकर अब तक मुख्यमंत्री व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ही नहीं उनके पार्टी नेताओं की जो प्रतिक्रिया आई है वह यह बताने को काफी है कि उनकी नजर में आयोग क्या है। वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव हो या फिर 2011 का विधानसभा चुनाव। यही ममता बनर्जी चुनाव आयोग की प्रशंसा में कसीदे पढ़ा करती थीं। आयोग के हर कदम का पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत करती थीं।

राष्ट्रपति शासन लगाकर हर बूथ पर केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग करती थी। वहीं उस वक्त के शासक दल वाममोर्चा और खासकर माकपा नेताओं के निशाने पर आयोग हुआ करता था जैसा आज दिख रहा है। पिछले एक दशक में ऐसा क्या हो गया कि सत्ता में आते ही तृणमूल के लिए आयोग दुश्मन, केंद्रीय बल पक्षपाती हो गए और विपक्ष में जो दल है उन्हें आयोग के निर्णय अच्छे लग रहे हैं। इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख आयोग को खुली चुनौती दे रही हैं।

2011 तक ममता आयोग की जमकर करती थी प्रशंसा: आज से करीब 10 वर्ष पीछे चलते हैं, विधानसभा चुनाव की घोषणा हो जाती है और बंगाल में पहली बार चुनाव आयोग पुलिस पर्यवेक्षक तैनात करने की घोषणा की थी। राज्य में कानून-व्यवस्था व अन्य पहलुओं की जांच के लिए विशेष पर्यवेक्षकों की टीम भेजी थी। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी अपनी पूरी टीम के साथ दो दिवसीय दौरे पर बंगाल आए थे। उन्होंने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों व सूबे के आलाधिकारियों और डीएम-एसपी के साथ बैठक की थी और सबको निष्पक्ष रहने की हिदायत दी।

यह सामान्य प्रक्रिया था, लेकिन पुलिस पर्यवेक्षक की तैनाती भारत के चुनावी इतिहास में प्रथम मौका था। उस वक्त माकपा के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है, वह कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है। वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बोस भी लगातार चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रखा था। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो विमान बोस आयोग के विशेष पर्यवेक्षक को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। उस वक्त यही ममता ने आयोग को निष्पक्ष व निर्बाध चुनाव संपन्न कराने के लिए सब तरह के कदम उठाने का अनुरोध करते हुए आयोग की जमकर प्रशंसा की थी। परंतु, अब जब वह सत्ता में है तो आयोग बुरे, और पक्षपात करने वाला हो चुका है।

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