उत्सव मनाते रहे डॉक्टर, दम तोड़ते रहे मरीज

-जूनियर व इंटर्न के हवाले छोड़ दिया सब कुछ -एक हफ्ते में गई 118 रोगियों की जान जागरण सं

JagranSat, 16 Oct 2021 08:17 PM (IST)
उत्सव मनाते रहे डॉक्टर, दम तोड़ते रहे मरीज

-जूनियर व इंटर्न के हवाले छोड़ दिया सब कुछ

-एक हफ्ते में गई 118 रोगियों की जान जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी : कहते हैं कि डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप होता है। मगर, यहा नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एनबीएमसीएच) के डॉक्टरों विशेष कर सीनियर डॉक्टरों की बातें करें तो मामला उलटा ही है। गत सप्ताह भर सीनियर डॉक्टर दुर्गोत्सव मनाते रहे और उसी दौरान इधर एनबीएमसीएच में 118 रोगियों की जान चली गई। दुर्गा पूजा की षष्ठी से पूर्व के दो दिन की बात करें तो 9 अक्टूबर को 16 व 10 अक्टूबर को 13 रोगियों की मौत हुई। षष्ठी के दिन 11 अक्टूबर को 19, सप्तमी के दिन 12 अक्टूबर को 20, अष्टमी के दिन 13 अक्टूबर को 21, नवमी के दिन 14 अक्टूबर को 15, एवं दशमी के दिन 15 अक्टूबर को 14 रोगियों ने दम तोड़ा। इस प्रकार बीते एख सप्ताह में कुल 118 रोगियों की मौत हुई। औसतन प्रतिदिन 17 रोगी मरे।

इसकी वजह एनबीएमसीएच के रोगियों व कई परिजनों ने यह बताई है कि दुर्गोत्सव के दौरान सीनियर डॉक्टरों के नदारद रहने और बेहतर चिकित्सा व्यवस्था नहीं हो पाने के चलते ही ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार दुर्गोत्सव के दौरान एनबएमसीएच में डॉक्टरों की ड्यूटी का अल्टरनेट रोस्टर बनता है। उसी के अनुरूप डॉक्टर ड्यूटी देते हैं। मगर, इस मामले में रोस्टर के अनुसार सीनियर डॉक्टरों में जिनकी उपस्थिति रहने की बात थी वह भी अनुपस्थित रहे। एनबीएमसीएच के रोगियों व परिजनों ने आरोप लगाया है कि इधर पूजा के दौरान सप्ताह भर चिकित्सा व्यवस्था एकदम लचर रही। सीनियर डॉक्टर नदारद रहे। सब कुछ जूनियर डॉक्टर एवं इंटर्न के हवाले छोड़ दिया। उसी के लिए सारी समस्याएं उत्पन्न हुईं।

वहीं, एनबीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. संजय मल्लिक ने इन आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि एनबीएमसीएच में पूरे उत्तर बंगाल से रोगी आते हैं। यहा रोगियों की जितनी ज्यादा संख्या है उस अनुपात में इस तरह रोगियों की मौत का औसत सामान्य है। उन्होंने पिछले महीने की रिपोर्ट का हवाला भी दिया जिसके अनुसार औसतन प्रतिदिन रोगियों की मृत्यु की संख्या 19 थी। इन सबके बावजूद एनबीएमसीएच के बारे में लोगों ने सवाल उठाया है कि हर साल आखिर दुर्गोत्सव के समय ही इस प्रकार रोगियों की मौत में वृद्धि क्यों हो जाती है?

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