डॉक्टर श्यामा प्रसाद के बंगाल को बचाने सड़क पर उतरेंगी भाजपा

-लगातार हो रही हिंसा समेत अन्य मागों के समर्थन में 23 जून बलिदान दिवस पर होगा प्रदर्शन -अंतर्राष्ट्रीय

JagranSun, 20 Jun 2021 07:04 PM (IST)
डॉक्टर श्यामा प्रसाद के बंगाल को बचाने सड़क पर उतरेंगी भाजपा

-लगातार हो रही हिंसा समेत अन्य मागों के समर्थन में 23 जून बलिदान दिवस पर होगा प्रदर्शन

-अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर बूथ स्तर कार्यकर्ताओं को भरा जाएगा जोश

जागरण संवाददाता, सिलीगुड़ी: डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल को बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी प्रत्येक प्रखंड स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगी। यह कार्यक्रम 23 जून को श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में धरना प्रदर्शन के साथ अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके लिए बूथ स्तरीय तैयारी जोरों पर है। भाजपा के इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए विधायक सासद अपने अपने क्षेत्र में इसकी कमान संभालेंगे। इसको लेकर रविवार को जिला कार्यालय में बैठक की गयी। बैठक में सांसद राजू बिष्ट, प्रदेश भाजपा महासचिव सायंतन बसु, विधायक शंकर घोष, आनंदमय बर्मन, दुर्गा मूर्मू शिखा चटर्जी, जिलाध्यक्ष प्रवीण अग्रवाल समेत अन्य नेता मौजूद थे। बैठक के बाद भाजपा नेताओं का कहना है कि वर्तमान में बंगाल में जैसे हालात हैं, वह लोकतंत्र के लिए खतरा है। एक जिम्मेदार पार्टी होने के नाते भाजपा का दायित्व है कि वह बंगाल के बिगड़ते वातावरण की सच्चाई से देशवासियों को अवगत कराए जाएंगे, ताकि जम्मू-कश्मीर जैसी परिस्थिति बंगाल में न हों।

डॉक्टर मुखर्जी ने बंगाल को बचाया था

भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रखर राष्ट्रवाद के अगुआ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बाग्ला बचाओ के लिए काम किया था। भाजपा के लोग मुखर्जी के कार्यो को आगे बढ़ाते हुए बंगाल को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। भाजपा एक जिम्मेदार पार्टी होने के नाते बंगाल की संस्कृति, भाषा और क्रातिकारियों के बंगाल की मिठास को कमजोर नहीं होने देगी। उन्होंने कहा कि बंगाल की धरती से आनंद मठ बाग्ला, वंदेमातरम, जन गण मन जैसे नारे व गीत राष्ट्र को मिले हैं। वहा की भाषा राष्ट्रभक्ति से आज भी नए जोश को धार देती है। ऐसी महान धरती के निवासियों के साथ अन्याय किया जा रहा है और सताने का काम किया जा रहा है। भाजपा इसके खिलाफ लड़ती आई और आगे भी लड़ेगी। इतिहास में जाकर देखें तो भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत 1937 में संपन्न हुए प्रातीय चुनावों में बंगाल में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। यह चुनाव ही डॉ. मुखर्जी के राजनीति का प्रवेश काल था। काग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी और मुस्लिम लीग एवं कृषक प्रजा पार्टी को भी ठीक सीटें मिली थीं। बंगाल में लीगी सरकार का गठन हो गया। लीगी सरकार के गठन के साथ ही अंग्रेज हुकूमत अपनी मंशा में कामयाब हो चुकी थी।

बंगाल विभाजन के दौरान भारत के हितों के पक्षधर: बंगाल विभाजन के दौरान हिंदू अस्मिता की रक्षा में भी डॉ. मुखर्जी का योगदान बेहद अहम माना जाता है। हिंदुओं की ताकत को एकजुट करके डॉ. मुखर्जी ने पूर्वी पाकिस्तान में बंगाल का पूरा हिस्सा जाने से रोक लिया था। अगर डॉ मुखर्जी नहीं होते तो आज पश्चिम बंगाल भी पूर्वी पाकिस्तान (उस दौरान का) का ही हिस्सा होता। लेकिन हिंदुओं के अधिकारों को लेकर वे अपनी माग और आदोलन पर अडिग रहे, लिहाजा बंगाल विभाजन संभव हो सका। बंगाल में उनके नेतृत्व कौशल ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर ला दिया था। साल 1944 में डॉ. मुखर्जी हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने और पूरे देश में हिंदुओं की सशक्त आवाज बनकर उभरे।।डॉ. मुखर्जी को हिंदू महासभा का अध्यक्ष चुने जाने पर स्वयं महात्मा गाधी ने खुशी जाहिर करते हुए कहा था कि पंडित मालवीय के बाद हिंदुओं को एक सही नेता की जरूरत थी। डॉ. मुखर्जी के रूप में उन्हें एक मजबूत नेता मिला है।

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