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81 साल की उम्र में भी जवान हैं केपी दा

81 साल की उम्र में भी जवान हैं केपी दा
Publish Date:Thu, 13 Aug 2020 07:52 PM (IST) Author: Jagran

-कोरोना काल में लगातार कर रहे हैं लोगों की मदद

- अबतक 80 हजार लोगों की फ्री में दी इम्युनिटी बूस्टर दवा अशोक झा, सिलीगुड़ी: 81 वर्ष की उम्र में जहां लोग दूसरे के सहारे पर निर्भर होते हैं वहीं एक शख्स ऐसे भी हैं जो कोरोना काल में 80 हजार लोगों तक नि:शुल्क दवा पहुंचा चुके हैं। यह वह दवा है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में काम आती है। उनके द्वारा यह सिलसिला मार्च माह से ही अनवरत जारी है। यह शख्स कोई डॉक्टर नहीं हैं। ये हैं शहर के प्रतिष्ठित कारोबारियों में शामिल कुलक्षेत्र प्रसाद अग्रवाल यानि केपी दा । लोग उन्हें प्यार से केपी दा ही कहते हैं। वे किसी पहचान के मोहताज नहीं। पेट्रोल पंप,ऑटो मोबाइल समेत कई प्रकार के कारोबार से जुड़े है। कई सामाजिक संगठनों के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रह चुके है। इस उम्र में वे सेवक रोड स्थित अपने घर के नीचे ऑफिस में बैठकर सुबह 8 बजे से दिन के 2 बजे तक अपने हाथों दवाओं की पैकिंग करते है। किसी का एक फोन आने पर उनतक दवा पहुंचाकर ही शात बैठते हैं। उनका कहना है कि उन्हें संतुष्टि तब मिलेगी जब इस क्षेत्र का एक भी व्यक्ति कोरोना जैसी बीमारी से संक्रमित होकर मारा नहीं जाए।

कालिम्पोंग में गुजरा बचपन

उनका बचपन कालिम्पोंग मे गुजरा और जवानी सिलीगुड़ी में व्यापार करते। समाज सेवा के माध्यम से राष्ट्र सेवा का उनका इस उम्र में जनून है। कुलछेत्र प्रसाद का कहना है कि कोई भी किसी डाक्टर अथवा वैद्य या फिर किसी ज्योतिषी अथवा तात्रिक से सलाह लेने में कितनी भी धन राशि खर्च करने को तैयार रहता है,ताकि उन्हें आराम मिल सके। कोई भी अपने स्वास्थ्य की कीमत पर धन कमा सकता है लेकिन अपनी कमाई दौलत के बल पर स्वास्थ्य वापस प्राप्त नहीं कर सकता। जब किसी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता तो उसके लिए जीवन एक बोझ बन जाता है। यदि राहत मिलती नहीं नजर आती तो कई बार वह परमात्मा से मौत की दुआ भी मागने लगता है। हम सभी जानते हैं कि डाक्टर, वैद्य केवल रोगी का उपचार कर सकते हैं लेकिन यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा। हमें एक बच्चे की तरह जीवन जीना सीखना चाहिए,ताकि हम भी स्वस्थ विकसित हो सकें और अपनी सेहत को बनाए रख सकें।

लॉकडाउन में कोरोना मरीजों की खबर सुनकर हुए आहत

उन्होंने बताया कि कोरोना काल में मार्च माह से लोग घर में लॉक हो गए थे। समाचार पत्र, सोशल मीडिया और टीवी पर आ रही खबरें विचलित करती थी। अचानक मुम्बई के राहुल बजाज का एक पोस्ट हाथ लगा। जिसमे दूसरे का सहारा बनने की बात थी। इसी बीच आयुष मंत्रालय की एक रिपोर्ट पढ़ी आर्सेनिक एल्बम 30 के माध्यम से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की जानकारी दी गई थी। कुछ करने का मन बनाया। शहर से यह दवा मंगा ली। कुछ ही दिनों में यह स्टॉक खत्म हो गया। कोलकोता से दवा मंगायी। वहा भी स्टॉक खत्म हो गया। अभी कानपुर में रह रही बेटी के माध्यम से दवा मंगाकर लोगों तक पहुचा रहे हैं। इसे पेट्रोल पंप, सामाजिक संगठनों, धाíमक संगठनों और कुछ मीडिया के मित्रों के सहायता से लोगों तक शहर से गांव तक पहुंचाने में सफलता मिली है।

रोटी ,कपड़ा, मकान के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा पर देना होगा जोर

उन्होंने कहा कि आज भी चुनावी नारा रोटी कपड़ा और मकान को बनाया जाता है। जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर ध्यान देने की जरूरत है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बने, इसका उपाय करना होगा। क्योंकि स्वास्थ्य एक संतुलित जीवन पद्धति का नाम है। इसके लिए शारीरिक खेलकूद व योग पर सरकार को जोर देना होगा।

बचाव मानकों का रखना होगा ध्यान

कुलक्षेत्र प्रसाद का कहना है कि शहरों की बस्तियों में, गलियों में लोग बिना मास्क पहने खेलते नजर आते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर, सब्जी मंडियों में कोई शारीरिक दूरी का पालन नहीं हो रहा। सबसे बड़ी समस्या आबादी का घनत्व है। छोटे-छोटे घरों में परिवार रहते हैं। कोरोना की चुनौती काफी बड़ी है। जब तक लोग सामुदायिक सहयोग नहीं करेंगे तब तक महामारी पर काबू नहीं पाया जा सकता। मानव ही अपने समुदाय की रक्षा कर सकता है। इसके लिए उनके भीतर खुद को बचाने और दूसरों की जान बचाने की भावना होनी चाहिए। इसलिए लोगों को बचाव के सभी उपाय अपनाने होंगे। जब तक कोई वैक्सीन तैयार नहीं हो जाती तब तक सामूहिक प्रयासों से ही महामारी की प्रचंडता को कमजोर किया जा सकता है। इसलिए बेवजह घरों से बाहर नहीं निकलें और कोरोना बचाव के मानकों का पालन करें,स्वच्छता का ध्यान रखें। घरों को सैनिटाइज करें। एक न एक दिन तो कोरोना को हारना ही पड़ेगा।

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