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Bengal Assembly Elections 2021: बिमल गुरुंग फिर ममता के साथ, भाजपा के खिलाफ ठोंक रहे ताल

इस बार तीनों सीटों पर गोजमुमो के दोनों ही धड़ों ने अपने-अपने अलग उम्मीदवार खड़े करने की बात कही। फाइल

Bengal Assembly Elections 2021 गोजमुमो के दोनों धड़े के समर्थन से जहां तृणमूल गदगद है वहीं भाजपा कांग्रेस माकपा व अन्य दलों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। अंजाम क्या होगा वह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा। फाइल फोटो

Sanjay PokhriyalMon, 08 Mar 2021 03:13 PM (IST)

इरफान-ए-आजम, दार्जिलिंग। Bengal Assembly Elections 2021 यह साइंस का तथ्य है कि पहाड़ पर दाल नहीं गलती है। विश्वप्रसिद्ध दार्जिलिंग पहाड़ की बात करें तो यहां पॉलिटिकल साइंस का भी यही तथ्य है। अंतर यह है कि यहां पहाडि़यों की तो दाल गल जा रही है, लेकिन गैर पहाड़ियों का चूल्हा ठंडा पड़ा है। दार्जिलिंग पहाड़ यानी पार्वत्य क्षेत्र में सदी से भी ज्यादा पुराना एक सवाल है, वह है पहाडिय़ों (नेपाली भाषी गोरखाओं) की 'पहचान का सवाल। इसी से जुड़े अलग राज्य गोरखालैंड का मुद्दा गाहे-ब-गाहे यहां राजनीतिक तापमान बढ़ाएरहता है।

आजादी के बाद से 80 के दशक की शुरुआत तक, पहले कांग्रेस और फिर माकपा की दाल थोड़ी-थोड़ी गल जाया करती थी, लेकिन गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) बना कर 80 के दशक की शुरुआत में सुभाष घीसिंग ने नए सिरे से गोरखा लैंड आंदोलन छेड़ सारे समीकरण बदल दिए। तब से गैर-पहाड़ी दलों का चूल्हा ठंडा है।

अभी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (गोजमुमो) अकेली ऐसी पार्टी है जो पहाड़ पर दाल गलाने का माद्दा रखती है। इस दल को 2007 में सुभाष घीसिंग से अलग हो कर, कभी उनके ही करीबी रहे बिमल गुरुंग ने बनाया था। बाद में गोजमुमो दो टुकड़ों में बंट गया। हालात बदले तो 2017 में ममता बनर्जी काकोपभाजन बन कर बिमल गुरुंग को अपने साथी रौशन गिरि के साथ भूमिगत हो जाना पड़ा। उन पर देशद्रोह समेत 100 से अधिक मुकदमे दर्ज हो गए। उसी बीच उनके खासे करीबियों में से एक बिनय तामंग ने गोजमुमो को अपने नियंत्रण में ले लिया। बंगाल के सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस और राज्य सरकार से आशीर्वाद प्राप्त कर वह बिमल गुरुंग की गोरखालैंड टेरिटोरिअल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) की कुर्सी पर भी विराजमान हो गए थे।

बिमल गुरुंग फिर ममता के साथ, भाजपा के खिलाफ ठोंक रहे ताल: अब एक बार फिर बिमल गुरुंग को ममता बनर्जी का आशीर्वाद मिल जाने से समीकरण बदल गए हैं। गुरुंग अक्टूबर 2020 में सार्वजनिक जीवन में लौट आए और उन पर दर्ज ज्यादातर मुकदमे भी हटा दिए गए। इस चुनाव में वह भाजपा को धूल चटाने की बात कह रहे हैं, जबकि 2007 से 2020 तक लगातार वह ममता बनर्जी के धुर विरोधी और भाजपा के कट्टर समर्थक रहे थे। वहीं, बिनय तामंग भी ममता बनर्जी के ही साथ हैं। इसकी वजह यह भी बताई जा रही है कि उनके ऊपर लदे मुकदमे अभी नहीं हट पाए हैं।

तृणमूल ने छोड़ रखी हैं पार्वत्य क्षेत्र की तीनों सीटें: दार्जिलिंग पहाड़ पर पार्वत्य क्षेत्र में दार्जिलिंग, कर्सियांग व कालिम्पोंग कुल तीन विधानसभा सीटें हैं। दार्जिलिंग पहाड़ पर गोजमुमो के प्रभाव को इससे भी समझा जा सकता है कि तृणमूल ने राज्य की 294 में 291 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र की तीनों विधानसभा सीटों को खाली छोड़ दिया है। ये सीटें बिमल गुरुंग के गोजमुमो के लिए खाली छोड़ी गई हैं या बिनय तामांग के गोजमुमो के लिए, यह स्पष्ट नहीं है। इन सीटों पर एक-दो बार माकपा को छोड़ दें तो हमेशा अखिल भारतीय गोरखा लीग व गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट का ही कब्जा रहा। सुभाष घीसिंग के पतन और बिमल गुरुंग के उत्थान के बाद 2007 से अब तक ये सारी सीटें गोजमुमो के प्रभाव में हैं। 2011 व 2016 में ये तीनों ही सीटें गोजमुमो की ही झोली में गईं। सो, पहाड़ पर गोजमुमो के एकछत्र प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है।

बताया जाता है कि बिमल गुरुंग के समर्थन की बदौलत ही भाजपा उम्मीदवार के तौर पर 2009 में जसवंत सिंह, 2014 में एसएस अहलूवालिया व 2019 में राजू बिष्ट दार्जिलिंग से सांसद बने। 2016 में दार्जिलिंग से गोजमुमो के विधायक बने अमर सिंह राई जब 2019 में इस्तीफा दे कर तृणमूल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े तो यह विधानसभा सीट खाली हो गई। उस समय उप चुनाव में गोजमुमो के दूसरे धड़े के नेता बिनय तामांग ने जीटीए चीफ का पद त्याग कर चुनाव लड़ा था, लेकिन उपचुनाव में दार्जिलिंग से भाजपा के नीरज जिंबा चुनाव जीते, जिन्हें बिमल गुरुंग का समर्थन था।

2019 के लोकसभा चुनाव में भी बिमल गुरुंग भूमिगत रहने के बावजूद अपने प्रभाव से भाजपा प्रत्याशी राजू बिष्ट को विजय दिलाने में सफल रहे थे। इस बार तीनों सीटों पर गोजमुमो के दोनों ही धड़ों ने अपने-अपने अलग उम्मीदवार खड़े करने की बात कही है।

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