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मुक्ति धाम में भी नहीं खत्म हो रहा इंतजार

मुक्ति धाम में भी नहीं खत्म हो रहा इंतजार

रोहित लखेड़ा, कोटद्वार: कोरोना से हो रही मौतों के मामलों में सरकारी आंकड़े भले ही कुछ और कहानी बयां कर

JagranSun, 16 May 2021 03:00 AM (IST)

रोहित लखेड़ा, कोटद्वार: कोरोना से हो रही मौतों के मामलों में सरकारी आंकड़े भले ही कुछ और कहानी बयां कर रहे हों। लेकिन, खोह नदी के तट पर बना मुक्तिधाम इन दिनों हकीकत का गवाह बना हुआ है। जिस मुक्तिधाम में इक्का-दुक्का दाह संस्कार हो रहे थे, आज वहां दाह संस्कार के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। मुक्तिधाम में प्रतिदिन 10-15 शवों का अंतिम संस्कार इन दिनों हो रहा है।

सरकारी आंकड़ों की मानें तो जिले में कोरोना संक्रमण के चलते अभी तक 144 मौतें हुई हैं। लेकिन, धरातलीय आंकड़ों की बात करें तो सिर्फ कोटद्वार क्षेत्र में पिछले चार दिनों में 39 व्यक्तियों की मौत हुई है। इनमें से छह की मौत कोरोना वार्ड में हुई, जबकि अन्य की मौत बेस चिकित्सालय के अन्य वार्डों में हुई। सभी को पहले बुखार आया, फिर आक्सीजन लेवल कम हुआ और बाद में मौत हो गई। सिस्टम ने इन्हें कोविड से हुई मौत की श्रेणी में इसलिए नहीं रखा, क्योंकि ये कोविड वार्ड में भर्ती नहीं थे। कुछ का मौत के बाद एंटीजन टेस्ट भी किया गया, जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई। जबकि, चिकित्सक स्वयं मानते हैं कि कोविड टेस्टिग में एंटीजन की विश्वसनीयता नहीं होती। इसी कारण चिकित्सक आरटीपीसीआर टेस्ट की ही सलाह देते हैं। लेकिन, मृतक का आरटीपीसीआर टेस्ट संभव ही नहीं। ऐसे में एंटीजन टेस्ट के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाती है। मुक्ति धाम में मौजूद जन स्वयं बताते हैं कि प्रत्येक आधे-पौन घंटे में शव आने का सिलसिला पिछले करीब एक माह से बदस्तूर जारी है। मुक्तिधाम में मौजूद सातों चबूतरों पर चिता जलने के बाद कई मर्तबा आसपास पड़ी खाली भूमि पर चिताएं जलानी पड़ रही हैं। हालात यह हैं कि एक चिता की राख ठंडी भी नहीं होती कि वहां दूसरी चिता जलने लगती है।

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रात को भी धधक रही चिताएं

सनातन धर्म में रात्रि के समय अंतिम संस्कार शुभ नहीं माना जाता। लेकिन, कोरोना के इस काल में मुक्तिधाम में रात नौ-दस बजे के बाद भी चिताएं धधक रही हैं। इसे कोरोना संक्रमण का खौफ ही कहा जाए कि स्वजन अपनों की मृत्यु के बाद शव को घर ले जाने में भी कतरा रहे हैं।

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अस्थियां भी नहीं हो रही नसीब

कोरोना की दूसरी लहर में अपनों को खोने के बाद स्वजन को उनके फूल (दाह संस्कार के बाद राख के ढेर में मौजूद अस्थियां) भी नसीब नहीं हो रही। दरअसल, जब शव दाह करने के अगले दिन जब स्वजन चिता पर पहुंचते हैं तो वहां दूसरा शव जलता रहा होता है। नतीजा स्वजन मायूस होकर वापस लौट रहे हैं।

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