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हटाई लैंटाना, उगाया बांज का जंगल

अजय खंतवाल, कोटद्वार

चौंदकोट क्षेत्र के अंतर्गत गढ़ वीरांगना तीलू रौतेली के वंशजों के गांव गुराड़ व मलेथा। इसी मलेथा गांव में करीब डेढ़ दशक पूर्व तक प्राकृतिक जल के चार स्त्रोत हुआ करते थे। लैंटाना ने गांव के आसपास राज करना शुरू किया और देखते ही देखते तमाम जगह लैंटाना फैल गया। गांवों के नजदीक पहुंची लैंटाना गुलदार के लिए भी बेहतर पनाहगाह साबित हुई और शांत गांवों में गुलदारों का आतंक पसरने लगा। मलेथा गांव भी ऐसे ही गांवों में एक हैं, जहां लैंटाना ने ग्रामीणों का पानी के साथ ही चैन भी छीन लिया। ऐसे में दिल्ली में एक पत्रिका में एसोसिएट आर्ट डायरेक्टर मलेथा निवासी चंद्रमोहन ज्योति ने ग्रामीणों की समस्याओं का निदान करने का संकल्प लिया।

वर्ष 2014 में चंद्रमोहन ने ग्रामीणों के साथ बैठक की और तय किया कि गांव के चारों ओर लैंटाना हटाकर सामूहिक सहभागिता से बांज, बुरांस व काफल का जंगल विकसित किया जाएगा। निर्णय लेने के तत्काल बाद चंद्रमोहन स्वयं के खर्च पर बांज की पांच सौ पौध लेकर गांव में पहुंच गए। सामूहिक सहभागिता से पौधों का रोपण शुरू कर दिया गया व अगले तीन वर्षों में गांवों के एक किलोमीटर की परिधि में बांज के तीन हजार पौधों का रोपण कर दिया गया। चंद्रमोहन बताते हैं कि वर्तमान में इन तीन हजार पौधों में से सात सौ पौधे बचे हुए हैं व पेड़ बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं। चंद्रमोहन की मानें तो अगले एक दशक में गांव के चारों ओर बांज का अच्छा जंगल विकसित हो जाएगा।

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'लैंटाना ने पहाड़ को पूरी तरह बरबाद कर दिया है। हैरत की बात यह है कि लैंटाना के उन्मूलन को आज तक कोई ठोस योजना नहीं बन पाई है। लैंटाना को हटाकर यदि बांज सहित अन्य पौधों का रोपण किया जाए तो पहाड़ की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। बांज का पौधरोपण प्राकृतिक जल स्त्रोतों को जीवित करने में लाभकारी साबित होगा।

सच्चिदानंद भारती, प्रणेता, पाणी राखो आंदोलन'

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