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पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ रही गुलदार की आबादी

जागरण संवाददाता, कोटद्वार : जयहरीखाल प्रखंड के अंर्तगत ग्राम अंगणी में गुलदार के हमले में हुए पूर्व सैनिक की मौत के बाद मानव-वन्य जीव संघर्ष को लेकर उठ रहे तमाम सवालों को एक बार फिर सुलगा दिया है। दरअसल, पर्वतीय क्षेत्रों में गुलदार की लगातार बढ़ रही तादाद से पहाड़वासी न सिर्फ दहशत में है, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष में ग्रामीणों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में मानव व पालतू पशुओं पर गुलदार के हमलों में इजाफा हुआ है। यह पहाड़ की ऐसी हकीकत है, जिसे शायद वन महकमा भी नहीं झुठला सकता। आलम यह है कि गांव की गलियां छोड़िए, अब तो शहर में भी गुलदार का आना आम बात हो गई है। हालात यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में गांवों के आसपास गुलदार घुमते नजर आते हैं। गुलदारों की लगातार बढ़ रही तादाद मानव-गुलदार संघर्ष को बढ़ावा दे रही है। बंजर खेत बन रहे गुलदार का ठिकाना पलायन की बात करें तो पौड़ी जनपद ने पलायन की सर्वाधिक मार झेली है। जिले में कई गांव खाली हो गए हैं व जिन गांवों को आबाद की श्रेणी में रखा गया है, वहां से भी बड़ी संख्या में लोग पलायन कर चुके हैं। पलायन हुआ तो गांवों के साथ ही खेत भी खाली होते चले गए और जिस तेजी से खेत बंजर हुए, गुलदार गांव के उतने ही निकट आते चले गए। बंजर खेतों में उग रही लैंटाना सहित अन्य झाड़ियां जहां गुलदारों को छिपने के लिए मुफीद साबित हो रही है, वहीं इन झाड़ियों में छिपकर वे हमले कर रहे हैं। जनपद पौड़ी की बात करें तो जिले में पौड़ी, पाबौ, पोखड़ा, एकेश्वर व कोट विकासखंडों में गुलदार के हमले की अधिक घटनाएं हुई हैं। एक वर्ष में गुलदार के हमलों की प्रमुख घटनाएं

जनपद पौड़ी में लैंसडौन वन प्रभाग, गढ़वाल वन प्रभाग व कालागढ़ टाइगर रिजर्व शामिल हैं। गुलदार के हमलों की बात करें तो वर्ष 2019 में गुलदार के हमलों की सर्वाधिक घटनाएं गढ़वाल वन प्रभाग में हुई, जहां 2019 में छह ग्रामीणों की गुलदार ने जान ले ली, जबकि दस ग्रामीण गुलदार के हमले में घायल हुए। लैंसडौन वन प्रभाग में 2019 में गुलदार के हमले में कोई जान तो नहीं गई, जबकि दो महिलाएं घायल हुई। कालागढ़ टाइगर रिजर्व की बात करें तो 2019 में इस वन प्रभाग में गुलदार के हमले की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई। लेकिन, आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर बाघ के हमले में दो वनकर्मियों की मौत हुई।

मानव-वन्य जीव संघर्ष को लेकर सरकार बेहद गंभीर है। मानव-वन्य जीव संघर्ष रोकने के लिए बृहद योजना बनाई जा रही है। साथ ही लोगों को गांवों के रास्तों के किनारे उगी झाड़ियों को साफ करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।

डॉ. हरक सिंह रावत, वन एवं पर्यावरण मंत्री, उत्तराखंड

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